बी के झा
NSK news Ind

कानपुर, 6 अक्टूबर
राजनीति में कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जिनमें संयोग और संगठन दोनों साथ चलते हैं। 25 साल पहले कानपुर की एक शाम ऐसी ही कहानी की गवाह बनी थी। उस समय नरेंद्र मोदी BJP के आज जैसे शीर्ष नेता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक प्रमुख प्रचारक के रूप में संगठन के काम में सक्रिय थे। दूसरी ओर गोपीकृष्ण पांडेय संघ और उससे जुड़े संगठनों में अपनी पहचान बना रहे थे।साल था 2001।कानपुर में संघ का एक बड़ा कार्यक्रम होना था। देशभर से प्रचारक कानपुर पहुंचे थे। इसी दौरान नरेंद्र मोदी का ठहरना गोपीकृष्ण पांडेय के आचार्य नगर स्थित घर में हुआ। उस समय दोनों के बीच संगठनात्मक परिचय पहले से था।और फिर इस राजनीतिक कहानी में बॉलीवुड की ‘गदर’ की एंट्री हुई।
जब प्रचारक मोदी और गोपी पांडेय साथ पहुंचे थे ‘गदर’ देखने
बताया जाता है कि अगले दिन संघ की बैठक थी और शाम का कुछ समय खाली था। उस दौर में सनी देओल और अमीषा पटेल अभिनीत फिल्म ‘गदर: एक प्रेम कथा’ देशभर में चर्चा का केंद्र बनी हुई थी।गोपीकृष्ण पांडेय के मुताबिक, नरेंद्र मोदी उनके साथ फिल्म देखने गए।उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि फिल्म देखने वाली वह शाम 25 साल बाद राजनीतिक किस्सा बन जाएगी।तब मोदी संघ के प्रचारक थे।आज वही मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं।और तब उनके साथ फिल्म देखने वाले गोपीकृष्ण पांडेय अब संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा की ओर बढ़ रहे हैं।यही वजह है कि BJP द्वारा राज्यसभा के लिए उनके नाम की घोषणा के बाद कानपुर में राजनीतिक चर्चाओं के साथ-साथ ‘गदर’ वाली वह पुरानी कहानी भी फिर से सुर्खियों में आ गई।
गोपीकृष्ण पांडेय ने इस पुराने प्रसंग की पुष्टि भी की है।—संघ से शुरू हुआ सफर, BJP की सीढ़ियों से राज्यसभा तक
गोपीकृष्ण पांडेय का राजनीतिक सफर अचानक राज्यसभा टिकट मिलने से शुरू नहीं हुआ।बताया जाता है कि वह महज 12 वर्ष की उम्र में संघ से स्वयंसेवक के रूप में जुड़ गए थे।इसके बाद बजरंग दल और हिंदू जागरण मंच जैसे संगठनों में उन्होंने काम किया। संगठन में सक्रियता बढ़ती गई और 1998 में उन्हें भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली।यानी राज्यसभा तक पहुंचने की उनकी यात्रा किसी एक चुनाव या अचानक मिले राजनीतिक अवसर की कहानी नहीं है।यह लगभग पांच दशक लंबे संगठनात्मक जुड़ाव का परिणाम है।
BJP की राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि पार्टी में संगठन के लिए लंबे समय तक काम करने वाले कार्यकर्ताओं का अपना महत्व होता है।गोपीकृष्ण पांडेय का चयन इसी परंपरा की ओर इशारा करता है।राज्यसभा का टिकट सिर्फ चेहरा देखकर नहीं, संगठन में निभाई गई भूमिका को देखकर भी दिया जाता है।
मोदी के साथ पुराना परिचय अब बना राजनीतिक चर्चा का विषय
गोपीकृष्ण पांडेय और नरेंद्र मोदी के पुराने परिचय की चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों का संबंध उस दौर का है जब मोदी का राजनीतिक जीवन आज की ऊंचाइयों पर नहीं पहुंचा था।यह वह समय था जब संघ के प्रचारक विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में संगठन का विस्तार करने के लिए लगातार यात्रा करते थे।गोपीकृष्ण पांडेय कानपुर में संगठन से जुड़े सक्रिय कार्यकर्ता थे।एक ही संगठन की जमीन पर दोनों का संपर्क हुआ।वक्त बदला।मोदी गुजरात पहुंचे, फिर मुख्यमंत्री बने और आगे चलकर देश के प्रधानमंत्री।गोपीकृष्ण पांडेय संगठन के रास्ते BJP में सक्रिय रहे।अब दोनों की राजनीतिक यात्राएं एक बार फिर संसद के संदर्भ में चर्चा में हैं।फर्क सिर्फ इतना है कि एक देश के प्रधानमंत्री हैं और दूसरे अब राज्यसभा के सदस्य बनने जा रहे हैं।
कानपुर से एक साथ तीन चेहरे—BJP का बड़ा सामाजिक संदेश
गोपीकृष्ण पांडेय की उम्मीदवारी को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि मानना भी अधूरा होगा।BJP ने इस बार कानपुर क्षेत्र से तीन ऐसे नाम सामने रखे हैं जिनके सामाजिक और संगठनात्मक आधार अलग-अलग हैं।
प्रकाश पाल—OBC चेहरा।
श्रुति गंगवार—OBC और महिला प्रतिनिधित्व।
गोपीकृष्ण पांडेय—सवर्ण/ब्राह्मण चेहरा।
कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र की बड़ी संख्या में विधानसभा सीटों पर इन सामाजिक समूहों का चुनावी प्रभाव है।इसलिए BJP का संदेश साफ पढ़ा जा सकता है—एक ही क्षेत्र, लेकिन सामाजिक प्रतिनिधित्व के कई आयाम।
2027 की जमीन पर अभी से सामाजिक इंजीनियरिंग?
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की राजनीतिक तैयारी शुरू हो चुकी है।समाजवादी पार्टी PDA यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक सामाजिक गठजोड़ को अपनी राजनीति का महत्वपूर्ण आधार बना रही है।BJP के सामने चुनौती है कि वह अपने पुराने सवर्ण आधार को मजबूत रखने के साथ-साथ OBC और दलित सामाजिक समूहों में भी अपनी पकड़ बनाए रखे। कानपुर-बुंदेलखंड में राज्यसभा के लिए तीन अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के चेहरों का चयन इसी व्यापक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।यह सिर्फ दिल्ली में आठ राज्यसभा सीटों का गणित नहीं है।यह 2027 के लिए सामाजिक संदेश देने की कवायद भी है।
गोपीकृष्ण पांडेय क्यों महत्वपूर्ण हैं?
गोपीकृष्ण पांडेय की सबसे बड़ी ताकत उनका संगठनात्मक अतीत है।उन्होंने चुनावी राजनीति से ज्यादा संगठनात्मक राजनीति में अपनी भूमिका बनाई।BJP में ऐसे कार्यकर्ताओं की एक पूरी पीढ़ी रही है जिसने पार्टी के विस्तार के दौर में बूथ से लेकर संगठन तक काम किया।राज्यसभा में ऐसे चेहरे भेजने का अर्थ है कि पार्टी अपने कैडर को यह संदेश दे रही है कि—लंबा संगठनात्मक संघर्ष राजनीतिक मंजिल तक पहुंचा सकता है।यह संदेश खासतौर पर उन कार्यकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है जो वर्षों तक चुनावी टिकट से दूर रहकर संगठन का काम करते हैं।
गोपीकृष्ण पांडेय ने कहा—कानपुर और यूपी के लिए रहूंगा उपलब्ध
राज्यसभा उम्मीदवार बनाए जाने के बाद गोपीकृष्ण पांडेय ने कहा कि BJP में संघर्ष और सेवा करने वालों को अवसर मिलता है।उन्होंने कहा कि यह अवसर मिलने के बाद वह कानपुर और उत्तर प्रदेश की जनता के लिए हमेशा उपलब्ध रहेंगे और विकास में योगदान देंगे।इस बयान में भी उनके राजनीतिक सफर की दिशा दिखाई देती है।वह अपने राज्यसभा टिकट को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि की तरह नहीं, बल्कि कानपुर और उत्तर प्रदेश की आवाज को उच्च सदन तक ले जाने के अवसर के रूप में पेश कर रहे हैं।
कानपुर की राजनीति में ‘गदर’ से ज्यादा बड़ा है संगठन का संदेश
‘गदर’ वाली कहानी सुनने में भले ज्यादा दिलचस्प हो, लेकिन गोपीकृष्ण पांडेय के राज्यसभा पहुंचने की असली कहानी उससे कहीं बड़ी है।एक तरफ 2001 की वह शाम है जब संघ के दो कार्यकर्ता कानपुर में साथ थे।दूसरी तरफ 2026 है, जब उनमें से एक देश का प्रधानमंत्री है और दूसरा उसी राजनीतिक परिवार की सबसे बड़ी संसदीय संस्थाओं में से एक में प्रवेश करने जा रहा है।यह बदलाव केवल समय का नहीं है।यह संगठन से सत्ता तक पहुंचने वाली BJP की राजनीतिक संरचना की कहानी भी है।
राजनीतिक विश्लेषण: BJP ने ‘स्टार’ नहीं, ‘सिपाही’ चुना
राजनीतिक विश्लेषकों के लिए इस चयन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि BJP ने गोपीकृष्ण पांडेय जैसे लंबे समय से संगठन में सक्रिय चेहरे को राज्यसभा के लिए चुना है।यह उस पार्टी मॉडल को दर्शाता है जिसमें संघ और संगठन से निकले कार्यकर्ताओं को धीरे-धीरे राजनीतिक जिम्मेदारियों के ऊंचे स्तर तक पहुंचाया जाता है।इस चयन का दूसरा संदेश सवर्ण समाज के लिए है।तीसरा संदेश संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं के लिए।और चौथा संदेश कानपुर क्षेत्र के लिए।यानी एक नाम से कई राजनीतिक संदेश साधने की कोशिश की गई है।
विपक्ष के सामने नई चुनौती
विपक्ष अगर BJP पर केवल सवर्ण राजनीति करने का आरोप लगाता है तो उसे कानपुर से चुने गए OBC और महिला चेहरों का भी जवाब देना होगा।वहीं BJP यदि PDA को सिर्फ जातीय समीकरण मानकर खारिज करती है तो उसे यह भी देखना होगा कि विपक्ष का सामाजिक संदेश जमीन पर कितना असर डाल रहा है।यही कारण है कि राज्यसभा के ये चयन आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले दोनों खेमों के लिए राजनीतिक संकेत बन गए हैं।
विपक्ष सामाजिक भागीदारी की बात कर रहा है।
BJP सामाजिक प्रतिनिधित्व के जरिए जवाब दे रही है।
अब फैसला जनता करेगी कि किसका सामाजिक संदेश ज्यादा प्रभावी साबित होता है।
NSK विश्लेषण:
‘गदर’ की वह शाम और संसद का आज
गोपीकृष्ण पांडेय की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह नहीं कि उन्होंने 25 साल पहले नरेंद्र मोदी के साथ एक फिल्म देखी थी।
असल दिलचस्पी इस बात में है कि राजनीति में लंबा सफर किस तरह छोटी-छोटी घटनाओं को इतिहास का हिस्सा बना देता है।
2001 में एक संघ प्रचारक और एक युवा संगठनकर्ता साथ बैठे थे।शाम को फिल्म देखने निकल गए।किसी को पता नहीं था कि अगले 25 वर्षों में उनकी राजनीतिक यात्राएं किस ऊंचाई तक जाएंगी।
आज नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं।और गोपीकृष्ण पांडेय राज्यसभा जाने की तैयारी में हैं।‘गदर’ उस दौर में सिनेमाघरों में हिट हुई थी।
लेकिन गोपीकृष्ण पांडेय के लिए असली ‘गदर’ शायद वह राजनीतिक सफर है, जो 12 साल की उम्र में संघ की शाखा से शुरू हुआ और अब संसद के उच्च सदन के दरवाजे तक पहुंच गया है।
सिनेमा की कहानी ढाई घंटे में खत्म हो जाती है, लेकिन संगठन की कहानी दशकों में लिखी जाती है।गोपीकृष्ण पांडेय की कहानी फिलहाल उसी दूसरी पटकथा का हिस्सा है।
