बी के झा
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लखनऊ, 23 सितंबर
उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी खेमे की सबसे बड़ी पहेली अब सिर्फ बीजेपी के मुकाबले की रणनीति नहीं, बल्कि सपा-कांग्रेस के बीच सीटों का गणित बन गया है। गठबंधन को लेकर दोनों दल सार्वजनिक रूप से साथ चलने की बात कर रहे हैं, लेकिन सीट बंटवारे की प्रक्रिया और समय को लेकर खींचतान खुलकर सामने आने लगी है।इसी बीच कांग्रेस सांसद इमरान मसूद, सपा सांसद इकरा हसन, कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम और सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव के बयानों ने इस बहस को और हवा दे दी है।
सवाल यह है कि क्या ये बयान सिर्फ बातचीत की मेज पर अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाने की रणनीति हैं या दोनों दलों के बीच वास्तविक मतभेद गहराने लगे हैं?
इमरान मसूद ने उठाया जल्दी सीट बंटवारे का मुद्दा
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद लगातार यह मांग उठाते रहे हैं कि सीटों का बंटवारा समय रहते स्पष्ट होना चाहिए, ताकि संभावित उम्मीदवारों को तैयारी का पर्याप्त समय मिल सके। कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने भी इस तर्क का समर्थन किया।गौतम ने कहा कि इमरान मसूद ने गलत क्या कहा है और सीटों का बंटवारा सही समय पर हो जाना चाहिए, ताकि प्रत्याशियों को तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिल सके।दरअसल, कांग्रेस की रणनीति का एक अहम हिस्सा जल्दी सीटों की पहचान और संगठन को उन सीटों पर सक्रिय करना बताया जा रहा है। पार्टी पहले ही 403 विधानसभा सीटों पर संगठनात्मक तैयारी और सर्वे की बात कर चुकी है।
इकरा हसन के बयान से बढ़ी तल्खी
इमरान मसूद के रुख पर सपा सांसद इकरा हसन ने पलटवार करते हुए कांग्रेस की चुनावी क्षमता पर सवाल उठाया। इसके बाद कांग्रेस नेताओं ने भी जवाबी हमला किया।कांग्रेस प्रवक्ता असीम वकार ने इकरा हसन के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कांग्रेस के सहयोग के बिना सपा की राजनीतिक यात्रा को भी उसी तरह नहीं देखा जा सकता। उनके बयान का सीधा संकेत 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों के साथ आने और उसके बाद बने राजनीतिक समीकरणों की ओर था।यहीं से मामला केवल सीटों की संख्या का नहीं रह जाता। असली सवाल यह बन जाता है कि गठबंधन में किस दल की राजनीतिक हैसियत कितनी मानी जाएगी और कौन-सी सीट किसके हिस्से में जाएगी।
शिवपाल ने डाल दिया गेंद राष्ट्रीय नेतृत्व के पाले में
बयानों की इस जंग के बीच सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव ने पूरे विवाद को एक अलग दिशा दे दी। देवरिया दौरे पर उन्होंने कहा कि सीटों का अंतिम फैसला दूसरे नेताओं के बयानों से नहीं, बल्कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के स्तर पर होगा।यानी शिवपाल का संदेश साफ है—प्रदेश स्तर के नेताओं की बयानबाजी अपनी जगह है, लेकिन गठबंधन का वास्तविक फैसला शीर्ष नेतृत्व करेगा।इससे यह भी संकेत मिलता है कि दोनों दल फिलहाल सार्वजनिक बयानबाजी के बावजूद बातचीत के दरवाजे बंद नहीं करना चाहते।
असली पेंच कितनी सीटों का?
यही वह सवाल है, जिस पर आने वाले दिनों में सबसे ज्यादा सियासत होने वाली है।मीडिया रिपोर्टों में सीटों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक कांग्रेस लगभग 105 सीटों के आसपास हिस्सेदारी चाहती है, जबकि सपा की ओर से कम सीटों की पेशकश की चर्चा है।
हालांकि दोनों दलों की ओर से कोई अंतिम और आधिकारिक सीट-बंटवारा फार्मूला सार्वजनिक नहीं किया गया है।2017 का विधानसभा चुनाव भी दोनों दलों के लिए एक संदर्भ बिंदु बन गया है। उस चुनाव में कांग्रेस और सपा ने गठबंधन किया था, लेकिन वह प्रयोग अपेक्षित चुनावी परिणाम नहीं दे सका। इस बार दोनों पार्टियां 2017 के अनुभव, 2024 के लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन और मौजूदा संगठनात्मक ताकत को ध्यान में रखकर अपना-अपना दावा मजबूत करना चाहती हैं।
सपा की रणनीति: पहले संगठन, बाद में सीटों का समझौता?
सपा ने फिलहाल सभी 403 सीटों पर अपनी तैयारियां जारी रखी हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी ने बड़ी संख्या में सीटों पर संभावित उम्मीदवारों की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है और कई सीटों पर नामों को लेकर संगठनात्मक स्तर पर काम किया जा रहा है।यह रणनीति कांग्रेस पर दबाव बनाने का माध्यम भी हो सकती है—हालांकि इसे पार्टी की सामान्य चुनावी तैयारी के रूप में भी देखा जा सकता है। सपा का तर्क यह है कि गठबंधन हो या न हो, पार्टी को अपनी तैयारी रोकनी नहीं चाहिए।
दूसरी तरफ कांग्रेस जल्दी सीट बंटवारे की मांग इसलिए कर रही है ताकि जिन सीटों पर वह चुनाव लड़ना चाहती है, वहां संगठन और उम्मीदवारों को पर्याप्त समय मिल सके।यानी कांग्रेस की चिंता समय है और सपा की चिंता सीटों पर अपनी पकड़।
पश्चिमी यूपी से लेकर रायबरेली-अमेठी तक चुनौती
सीटों का विवाद केवल संख्या तक सीमित नहीं है। असली कठिनाई उन विधानसभा क्षेत्रों को लेकर होगी, जहां दोनों दल अपना राजनीतिक दावा रखते हैं।मीडिया रिपोर्टों में रायबरेली और अमेठी जैसे कांग्रेस के पारंपरिक प्रभाव वाले इलाकों का भी उल्लेख हुआ है। इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, जबकि सपा पूरे राज्य में अपने संगठन और सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।ऐसे में फॉर्मूला सिर्फ यह नहीं होगा कि कांग्रेस को कितनी और सपा को कितनी सीटें मिलीं।
असली लड़ाई होगी—कौन-सी सीट किसे मिली, वहां उसका संगठन कितना मजबूत है और उम्मीदवार कितना प्रभावी है।स्थानीय मतदाता क्या देख रहा है?
जमीनी स्तर पर गठबंधन की चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मतदाता है। शहरों से लेकर पश्चिमी यूपी, अवध, बुंदेलखंड और पूर्वांचल तक मतदाताओं के सामने सीटों की संख्या से ज्यादा यह सवाल महत्वपूर्ण होगा कि उनके क्षेत्र में गठबंधन का उम्मीदवार कौन होगा और स्थानीय मुद्दे क्या होंगे।
राजनीतिक विश्लेषणों में भी यह बात सामने आ रही है कि सपा अपने पारंपरिक आधार के साथ गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित समूहों तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है, जबकि कांग्रेस अपने संगठन को फिर से मजबूत करने और अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों को सुरक्षित रखने पर जोर दे रही है।स्थानीय राजनीतिक चर्चा में इसलिए तीन बातें महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं—उम्मीदवार की स्वीकार्यता, स्थानीय संगठन और गठबंधन का वोट ट्रांसफर।
क्योंकि केवल कागज पर गठबंधन होना और बूथ स्तर पर दोनों दलों के कार्यकर्ताओं का एक-दूसरे के उम्मीदवार के लिए काम करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
विपक्षी खेमे के सामने तीसरी चुनौती भी
सपा-कांग्रेस के बीच सीटों की बातचीत के समानांतर यूपी की राजनीति में अन्य विपक्षी दल भी अपनी जमीन तलाश रहे हैं। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने गठबंधन की संभावनाओं के लिए दरवाजा खुला रखने का संकेत दिया है। कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने इस पर चिंता जताई है कि अलग-अलग विपक्षी दलों के मैदान में उतरने से वोटों के बंटवारे की स्थिति बन सकती है।वहीं बहुजन समाज पार्टी के राजनीतिक आधार को लेकर भी अलग-अलग दलों की सक्रियता बढ़ी है। ऐसे में विपक्षी राजनीति का गणित केवल सपा बनाम कांग्रेस तक सीमित नहीं रहने वाला।
शिक्षाविदों और राजनीतिक विश्लेषकों के लिए बड़ा सवाल
चुनावी राजनीति का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों के सामने इस समय तीन प्रमुख सवाल हैं—पहला, क्या दोनों दल सीटों की संख्या के बजाय जीतने की संभावना और स्थानीय संगठन को आधार बनाकर समझौता कर सकते हैं?
दूसरा, क्या गठबंधन का फैसला इतना समय रहते होगा कि उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं को जमीनी स्तर पर समन्वय का मौका मिले?
तीसरा, क्या दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता एक-दूसरे के उम्मीदवार को उसी ऊर्जा से स्वीकार करेंगे, जिस ऊर्जा से अपने उम्मीदवार के लिए काम करते हैं?
यही तीसरा सवाल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि चुनावी गठबंधन का वास्तविक परीक्षण प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं, बल्कि बूथ पर होता है।
अब नजर राहुल गांधी और अखिलेश यादव पर
शिवपाल यादव के बयान के बाद फिलहाल गेंद दोनों दलों के राष्ट्रीय नेतृत्व के पाले में है। कांग्रेस जल्दी समझौते की दिशा में बढ़ना चाहती है, जबकि सपा अपनी संगठनात्मक तैयारियों को जारी रखते हुए बातचीत में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती दिख रही है।कांग्रेस और सपा के बीच 2024 के लोकसभा चुनाव का साथ अभी भी इस रिश्ते की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि है।
दोनों दल 2027 में भी साथ चुनाव लड़ने की बात कह चुके हैं, लेकिन 403 सीटों का बंटवारा और सीटों का चयन अभी सबसे कठिन अध्याय बना हुआ है।इसलिए आने वाले दिनों में हर बयान का राजनीतिक वजन बढ़ेगा।
इमरान मसूद का दबाव, इकरा हसन का पलटवार, राजेंद्र पाल गौतम का समर्थन और शिवपाल यादव का राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर इशारा—ये सभी संकेत दे रहे हैं कि गठबंधन की गाड़ी पटरी पर है, लेकिन सीटों का स्टेशन अभी दूर है।
2027 की चुनावी पटकथा में असली मोड़ तब आएगा, जब राहुल गांधी और अखिलेश यादव की बातचीत यह तय करेगी कि हाथ और साइकिल कितनी सीटों पर साथ-साथ दौड़ेंगे।
बी. के. झा , एन एस के
