शेख हसीना की वापसी पर बड़ा कूटनीतिक खेल? ‘फुल सिक्योरिटी’ के दावे से दिल्ली-ढाका में हलचल; लेकिन भारत ने कहा- प्रत्यर्पण पर कानूनी प्रक्रिया जारी, कोई टाइमलाइन तय नहीं

बी. के. झा

NSK news India

ढाका/नई दिल्ली, 7 अक्टूबर

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की स्वदेश वापसी को लेकर एक बार फिर दिल्ली से ढाका तक कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। एक ओर बांग्लादेश के प्रशासनिक और राजनयिक सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि हसीना की सुरक्षित वापसी के लिए एक रोडमैप तैयार हो चुका है और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी बांग्लादेशी सेना उठा सकती है। दूसरी ओर भारत की ओर से अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है कि उनकी वापसी की तारीख या व्यवस्था अंतिम रूप ले चुकी है।यही विरोधाभास इस पूरे घटनाक्रम को महत्वपूर्ण बना रहा है।

Northeast News ने प्रभावशाली बांग्लादेशी सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि हसीना की वापसी को लेकर सुरक्षा संबंधी मुद्दा कई महीनों की बातचीत के बाद सुलझा लिया गया है और बांग्लादेश की सेना उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगी। हालांकि, रिपोर्ट में खुद यह कहा गया है कि वापसी की तारीख अभी तय नहीं हुई है।

लेकिन दिल्ली का आधिकारिक संकेत क्या है?

यहीं कहानी का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ आता है।बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने 3 अक्टूबर को ढाका में Bay of Bengal Conversation के दौरान कहा कि भारत को शेख हसीना के प्रत्यर्पण के लिए बांग्लादेश के अनुरोध पर कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा और वापसी की कोई समयसीमा बताना संभव नहीं है।उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 5 अगस्त 2024 को हसीना को भारत लाने में भारतीय वायुसेना या भारतीय सेना की कोई भूमिका नहीं थी। उनके मुताबिक हसीना उस समय भी बांग्लादेश की प्रधानमंत्री थीं और अचानक पैदा हुए हालात में भारत ने पड़ोसी देश होने के नाते उन्हें उतरने की अनुमति दी।इसका सीधा अर्थ यह है कि फिलहाल ‘वापसी फाइनल’ कहना जल्दबाजी होगी।

बांग्लादेश का दबाव क्यों बढ़ रहा है?

तारिक रहमान के नेतृत्व वाली सरकार लगातार भारत से हसीना के प्रत्यर्पण की मांग कर रही है। बांग्लादेश ने हाल में यह भी कहा कि केवल कानूनी प्रक्रिया पर्याप्त नहीं है, बल्कि इस मामले को आगे बढ़ाने के लिए भारत की राजनीतिक इच्छा भी जरूरी है।

ढाका की राजनीति में हसीना का मुद्दा सिर्फ एक पूर्व प्रधानमंत्री की वापसी का मामला नहीं है। यह अवामी लीग के भविष्य, 2024 के राजनीतिक उथल-पुथल, न्यायिक कार्रवाई और बांग्लादेश की नई सत्ता संरचना से जुड़ा हुआ है।यही वजह है कि हसीना की वापसी भारत-बांग्लादेश संबंधों का सबसे संवेदनशील मुद्दा बनी हुई है।

हसीना के लिए ‘सेना की सुरक्षा’ वाला दावा कितना बड़ा?

यदि Northeast News में प्रकाशित सूत्रों का दावा सही साबित होता है और बांग्लादेशी सेना वास्तव में हसीना की वापसी की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेती है, तो यह महज सुरक्षा व्यवस्था नहीं होगी।यह बांग्लादेश की राजनीतिक और सैन्य संरचना के भीतर एक महत्वपूर्ण संदेश माना जाएगा।

क्योंकि हसीना की वापसी का अर्थ होगा—एक ऐसी पूर्व प्रधानमंत्री का देश लौटना, जिनकी सरकार अगस्त 2024 में व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद सत्ता से बाहर हुई थी और जिनके खिलाफ बाद में बांग्लादेश में गंभीर कानूनी कार्रवाई हुई।इसलिए उनकी वापसी केवल हवाईअड्डे पर सुरक्षा घेरे का सवाल नहीं होगी।

असली सवाल होगा—वापसी के बाद उनकी राजनीतिक और कानूनी स्थिति क्या होगी?

दिसंबर में लौटने का दावा पहले ही कर चुकी हैं हसीना

दिलचस्प बात यह है कि हसीना स्वयं अगस्त 2026 में दिल्ली से दिए गए अपने पहले बड़े मीडिया संबोधन में कह चुकी हैं कि वह दिसंबर तक बांग्लादेश लौटने का इरादा रखती हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि वापसी पर उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है या उनकी जान को खतरा हो सकता है, फिर भी वह लौटेंगी।लेकिन उनके इस राजनीतिक दावे और भारत सरकार की मौजूदा कानूनी प्रक्रिया के बीच अभी दूरी दिखाई देती है।

यानी हसीना की इच्छा अलग है, ढाका की मांग अलग है और दिल्ली की प्रक्रिया अलग।

अचानक दिल्ली आए भारतीय उच्चायुक्त, बढ़ी अटकलें

इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी का दिल्ली दौरा भी चर्चा में है। Northeast News ने इसे 5 अक्टूबर का अचानक और पूर्व निर्धारित कार्यक्रम से अलग दौरा बताते हुए दावा किया कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान का विशेष संदेश लेकर आए थे।

हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि फिलहाल सामने नहीं आई है।लेकिन इतना जरूर है कि त्रिवेदी 6 अक्टूबर को नई दिल्ली में भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ से मिले और दोनों के बीच भारत-बांग्लादेश द्विपक्षीय सहयोग तथा रक्षा संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा हुई।

भारतीय सेना ने भी इस मुलाकात की पुष्टि की है।यही मुलाकात इस घटनाक्रम को और दिलचस्प बनाती है।

क्या तारिक रहमान भारत आ सकते हैं?

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा को लेकर भी बातचीत चलती रही है। 6 अक्टूबर की रिपोर्टों के मुताबिक ढाका ने कहा कि तारिक रहमान ने भारत यात्रा की संभावना को खारिज नहीं किया है, लेकिन यह यात्रा उचित द्विपक्षीय ढांचे के भीतर होनी चाहिए।दूसरी तरफ हसीना का भारत में रहना दोनों देशों के बीच सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक बना हुआ है।

यानी दिल्ली के सामने एक कठिन कूटनीतिक संतुलन है—एक तरफ बांग्लादेश की निर्वाचित सरकार के साथ संबंधों को आगे बढ़ाना, दूसरी तरफ हसीना के प्रत्यर्पण के कानूनी अनुरोध पर फैसला करना।

कानूनविदों के लिए सबसे बड़ा सवाल

कानूनी विशेषज्ञों के लिए इस पूरे मामले का मूल प्रश्न यही है कि किसी व्यक्ति के प्रत्यर्पण का फैसला केवल राजनीतिक इच्छा से नहीं बल्कि संबंधित कानून, संधि और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर कैसे होगा।भारत पहले ही कह चुका है कि बांग्लादेश के प्रत्यर्पण अनुरोध की जांच स्थापित कानूनी प्रक्रिया के तहत हो रही है। इसलिए यदि भविष्य में हसीना की वापसी होती भी है, तो उसके पीछे कानूनी और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर स्पष्ट प्रक्रिया होना जरूरी होगा।

शिक्षाविदों और दक्षिण एशिया विशेषज्ञों के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण?

राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर देखें तो हसीना प्रकरण केवल भारत-बांग्लादेश द्विपक्षीय संबंधों का मुद्दा नहीं है। इसके प्रभाव दक्षिण एशिया की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, व्यापार, नदी जल बंटवारे और क्षेत्रीय कूटनीति तक जा सकते हैं।

भारत के लिए स्थिर और सहयोगी बांग्लादेश सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है। वहीं बांग्लादेश की नई सरकार के लिए भारत के साथ संबंधों को आगे बढ़ाना आर्थिक और क्षेत्रीय जरूरतों से जुड़ा विषय है।इसलिए दोनों देशों के बीच किसी भी बड़े फैसले को केवल हसीना के व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा।

विपक्ष और अवामी लीग की नजर में मामला

अवामी लीग और हसीना समर्थक खेमा उनकी वापसी को राजनीतिक संघर्ष जारी रखने से जोड़ता रहा है। वहीं बांग्लादेश की मौजूदा सत्ता के लिए हसीना की जवाबदेही और प्रत्यर्पण का मुद्दा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

भारत में भी विपक्षी दलों की ओर से बांग्लादेश नीति पर अलग-अलग समय में सवाल उठते रहे हैं, लेकिन फिलहाल हसीना की संभावित वापसी पर केंद्र सरकार की ओर से कोई ऐसा आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है जिसमें वापसी की तारीख या सेना की सुरक्षा व्यवस्था को अंतिम रूप दिया गया हो।इसलिए इस मामले में राजनीतिक दावों और आधिकारिक तथ्यों के बीच अंतर करना बेहद जरूरी है।

असली सवाल:-

क्या दिल्ली और ढाका किसी बड़े समझौते की ओर बढ़ रहे हैं?

मौजूदा घटनाक्रम में तीन बातें एक साथ दिखाई दे रही हैं—पहली, ढाका हसीना के प्रत्यर्पण पर भारत से तेजी चाहता है।

दूसरी, दिल्ली कह रहा है कि मामला कानूनी प्रक्रिया में है और कोई समयसीमा तय नहीं की जा सकती।

तीसरी, इसी बीच तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा और भारत-बांग्लादेश के रक्षा एवं कूटनीतिक संपर्कों को फिर से सक्रिय करने के संकेत मिल रहे हैं।

यही वजह है कि शेख हसीना की वापसी को लेकर चल रही चर्चा को फिलहाल ‘फाइनल डील’ की बजाय एक संभावित कूटनीतिक रोडमैप के दावे के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।अगर आने वाले दिनों में दिल्ली और ढाका के बीच कोई औपचारिक घोषणा होती है, तब यह साफ होगा कि पर्दे के पीछे चल रही बातचीत वास्तव में किस दिशा में पहुंची है।

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि शेख हसीना अब केवल बांग्लादेश की घरेलू राजनीति का मुद्दा नहीं हैं। वह भारत-बांग्लादेश संबंधों की सबसे बड़ी कूटनीतिक पहेली बन चुकी हैं।

और इस पहेली का अगला अध्याय—हसीना की वापसी, तारिक रहमान की भारत यात्रा या दोनों के बीच किसी नए राजनीतिक समझौते के रूप में सामने आता है—इस पर अब पूरे दक्षिण एशिया की नजर रहेगी।

बी. के. झा

एनएसके (NSK)

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