बी के झा, एनएसके – विशेष
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न ई दिल्ली/ बडोदरा, 20 अक्टूबर
गुजरात की राजनीति और क्रिकेट जगत से जुड़ा जमीन का एक पुराना विवाद अब नए राजनीतिक सवालों के साथ चर्चा में है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) से अलग होने के बाद पूर्व क्रिकेटर और लोकसभा सांसद यूसुफ पठान को वडोदरा में करोड़ों रुपये की कीमत वाला एक प्लॉट आवंटित करने का मामला फिर सुर्खियों में है। गुजरात सरकार ने इस जमीन के एक हिस्से को मुफ्त में देने और बाकी हिस्से को रियायती दर पर आवंटित करने की मंजूरी दी है। इसके बाद वडोदरा नगर निगम (VMC) ने भी आवंटन से संबंधित प्रस्ताव तैयार कर लिया है।
अब यह प्रस्ताव नगर निगम की स्थायी समिति के सामने जाएगा, जहां आगे की प्रक्रिया और अंतिम निर्णय का रास्ता तय होगा।मामले की संवेदनशीलता इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि जिस जमीन को लेकर कभी नगर निगम और पठान के बीच विवाद खड़ा हुआ था, उसी जमीन के आवंटन के लिए अब सरकारी स्तर पर रास्ता निकाला जा रहा है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जिस प्रस्ताव को पहले मंजूरी नहीं मिली, उसके लिए अब क्या परिस्थितियां बदली हैं?
हालांकि, इस पूरे मामले में अंतिम आवंटन की प्रक्रिया और उसकी शर्तों को समझना जरूरी है। केवल राजनीतिक घटनाक्रम के आधार पर किसी फैसले के पीछे की मंशा तय नहीं की जा सकती।
20.5 करोड़ रुपये की जमीन, आधी से ज्यादा नहीं बल्कि 978 वर्ग मीटर का पूरा प्लॉट चर्चा में
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, वडोदरा के तंदलजा इलाके में स्थित टाउन प्लानिंग स्कीम-22 के फाइनल प्लॉट नंबर 90 का कुल क्षेत्रफल 978 वर्ग मीटर है। गुजरात सरकार के आदेश के तहत इसमें से 500 वर्ग मीटर जमीन यूसुफ पठान को उपहार के रूप में देने और शेष 478 वर्ग मीटर जमीन 55 प्रतिशत रियायती दर पर आवंटित करने की व्यवस्था की गई है।इस जमीन का बाजार मूल्य कितना है, इसका अंदाजा जुलाई में नगर निगम की ओर से निर्धारित की गई नीलामी दर से लगाया जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय जमीन की दर 2.10 लाख रुपये प्रति वर्ग मीटर आंकी गई थी। इस हिसाब से पूरे प्लॉट का अनुमानित मूल्य लगभग 20.54 करोड़ रुपये बैठता है।इसमें 500 वर्ग मीटर जमीन का सांकेतिक मूल्य करीब 10.50 करोड़ रुपये और शेष 478 वर्ग मीटर का मूल्य लगभग 10.04 करोड़ रुपये बनता है।
हालांकि, ये आंकड़े नीलामी के लिए निर्धारित दर के आधार पर निकाली गई अनुमानित बाजार कीमत हैं, न कि सरकार को होने वाले वास्तविक आर्थिक नुकसान का आधिकारिक आकलन।सरकार के आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस फैसले को भविष्य के अन्य मामलों के लिए मिसाल नहीं माना जाना चाहिए। साथ ही, राजस्व विभाग की ओर से वडोदरा नगर निगम को इसके बराबर मूल्य की जमीन उपलब्ध कराने की बात भी कही गई है। ऐसे में इस फैसले की वास्तविक वित्तीय और प्रशासनिक तस्वीर आवंटन की शर्तें स्पष्ट होने के बाद ही सामने आएगी।
पहले नीलामी की तैयारी, अब रियायतों के साथ आवंटन का रास्ता
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण पहलू जमीन को लेकर बदला हुआ घटनाक्रम है। जुलाई में वडोदरा नगर निगम की स्थायी समिति इस प्लॉट की नीलामी की तैयारी कर रही थी। निर्धारित दर के आधार पर जमीन की कीमत करोड़ों रुपये में आंकी गई थी।इसी दौरान जमीन पर कथित अतिक्रमण का मुद्दा सामने आया और नीलामी की प्रक्रिया रोक दी गई। नगर निगम की ओर से यह रुख सामने आया कि विवाद का समाधान होने तक जमीन के मामले को आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा।अब गुजरात सरकार की मंजूरी के बाद इसी प्लॉट के आवंटन का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इससे मामला केवल जमीन के स्वामित्व या आवंटन तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि सरकारी संपत्ति के प्रबंधन, आवंटन की पारदर्शिता और नियमों के समान अनुपालन जैसे सवाल भी सामने आते हैं।
क्या इस आवंटन के पीछे कोई विशेष प्रशासनिक आधार है?
क्या स्पष्ट नीति या असाधारण परिस्थिति के तहत यह निर्णय लिया है?
और नगर निगम की जमीन को मुफ्त या रियायती दर पर देने के लिए कौन-सी शर्तें लागू होंगी?
इन सवालों का जवाब सरकारी आदेश और आवंटन की पूरी प्रक्रिया से ही मिल सकेगा।
2012 से शुरू हुई कहानी, जब पठान ने मांगी थी 99 साल की लीज
यूसुफ पठान और वडोदरा नगर निगम के बीच जमीन का विवाद नया नहीं है। इसकी शुरुआत वर्ष 2012 में हुई थी, जब पूर्व क्रिकेटर ने नगर निगम से इस प्लॉट को बिना नीलामी 99 साल की लीज पर देने का अनुरोध किया था।बताया जाता है कि अपने आवेदन में पठान ने क्रिकेटर होने और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला दिया था। उस समय जमीन का मूल्य करीब 5.6 करोड़ रुपये बताया गया था और पठान इस कीमत पर जमीन लेने के लिए तैयार थे।हालांकि, बिना नीलामी जमीन आवंटित करने के लिए गुजरात सरकार की मंजूरी आवश्यक थी। वर्ष 2014 में राज्य के शहरी विकास विभाग ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया।इसके बाद नगर निगम ने आरोप लगाया कि प्रस्ताव खारिज होने के बावजूद पठान ने जमीन पर फेंसिंग कर दी थी। इसी घटनाक्रम ने आगे चलकर विवाद का रूप ले लिया।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि किसी जमीन के लिए आवेदन करना, उसकी कीमत चुकाने की इच्छा जताना और उस पर कानूनी अधिकार प्राप्त कर लेना अलग-अलग बातें हैं। जमीन पर अधिकार तभी स्थापित होता है, जब संबंधित नियमों के तहत आवश्यक मंजूरियां और औपचारिकताएं पूरी हों।
2024 में अतिक्रमण हटाने का नोटिस, हाई कोर्ट तक पहुंचा मामला
विवाद ने वर्ष 2024 में उस समय नया मोड़ लिया, जब यूसुफ पठान को जमीन से कथित अतिक्रमण हटाने के लिए नोटिस दिया गया। इसके खिलाफ उन्होंने गुजरात हाई कोर्ट का रुख किया।अगस्त 2025 में हाई कोर्ट ने जमीन आवंटन से संबंधित प्रस्ताव को राज्य सरकार द्वारा खारिज किए जाने के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद भी कानूनी विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।इस वर्ष जून में हुई सुनवाई के दौरान भी अदालत ने इस बात पर सवाल उठाए थे कि बिना भुगतान और आवंटन की जरूरी औपचारिकताएं पूरी किए किसी व्यक्ति को जमीन पर अधिकार कैसे मिल सकता है।अदालत की इस टिप्पणी का मूल महत्व यही था कि सरकारी जमीन के मामले में निर्धारित प्रक्रिया और कानूनी औपचारिकताओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। किसी व्यक्ति की पहचान, प्रतिष्ठा या आर्थिक क्षमता अपने आप जमीन पर अधिकार पैदा नहीं करती।अब जब राज्य सरकार की ओर से नया आदेश जारी किया गया है, तो इस मामले में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नए आवंटन की शर्तें क्या हैं और वे पहले के विवाद से किस तरह अलग हैं।
31 अगस्त को वापस ली याचिका, उससे पहले जारी हो चुका था सरकारी आदेश
इस मामले में घटनाक्रम की टाइमिंग भी उल्लेखनीय है।रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात सरकार ने 13 अगस्त को जमीन आवंटन से संबंधित आदेश जारी किया था। यह आदेश 29 अगस्त को वडोदरा नगर निगम पहुंचा। इसके दो दिन बाद, 31 अगस्त को यूसुफ पठान ने अपने वकील से हाई कोर्ट में लंबित अपील वापस लेने के लिए कहा।अदालत में उनके वकील ने बताया कि मामले का समाधान न्यायालय के बाहर हो सकता है।इन तारीखों के सामने आने से यह स्पष्ट होता है कि सरकारी आदेश और याचिका वापस लेने की प्रक्रिया लगभग एक ही अवधि में हुई।
हालांकि, केवल समय के इस मेल के आधार पर किसी राजनीतिक समझौते या अनुचित लाभ का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इसके लिए संबंधित दस्तावेजों और फैसले के आधार की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
वडोदरा नगर निगम के आयुक्त अरुण महेश बाबू ने अखबार से बातचीत में कहा कि राज्य सरकार से मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन आवंटन का विवरण अभी तय होना बाकी है। उनके मुताबिक, प्रस्ताव नगर निगम की सामान्य प्रक्रिया से होकर गुजरेगा।इसका अर्थ है कि सरकारी मंजूरी के बावजूद आवंटन से जुड़ी आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण बनी हुई है।
TMC से अलग होने के बाद जमीन का मामला चर्चा में, लेकिन राजनीतिक संबंध ही कारण हैं?
यूसुफ पठान के राजनीतिक घटनाक्रम ने इस मामले को और चर्चा में ला दिया है। पूर्व क्रिकेटर ने तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर बहरामपुर लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया था। अब उनके टीएमसी से अलग होने और एक नए राजनीतिक संगठन से जुड़ने की खबरों के बीच जमीन आवंटन का मामला फिर सामने आया है।
राजनीतिक घटनाक्रम और सरकारी फैसले की टाइमिंग के कारण इस पर सवाल उठ सकते हैं। लेकिन किसी राजनीतिक दल से अलग होने के कारण ही सरकार ने जमीन आवंटित की, यह निष्कर्ष उपलब्ध तथ्यों से अपने आप साबित नहीं होता।इसलिए मामले की पड़ताल का केंद्र राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय सरकारी आदेश, जमीन के मूल्यांकन, आवंटन की शर्तों और संबंधित अधिकारियों के निर्णयों पर होना चाहिए।
सरकारी जमीन जनता की संपत्ति होती है। ऐसे में उसके आवंटन का हर फैसला पारदर्शी, नियमसम्मत और सार्वजनिक जवाबदेही के मानकों पर खरा उतरना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को बाजार मूल्य से कम कीमत पर जमीन दी जाती है, तो उसके पीछे का आधार भी स्पष्ट होना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल: सरकारी जमीन के आवंटन में पारदर्शिता का पैमाना क्या होगा?
यूसुफ पठान के मामले में अब तीन पहलू सबसे महत्वपूर्ण हैं।पहला, 500 वर्ग मीटर जमीन मुफ्त देने और 478 वर्ग मीटर जमीन पर 55 प्रतिशत रियायत देने का प्रशासनिक आधार क्या है?
दूसरा, जब नगर निगम इसी जमीन की नीलामी की तैयारी कर चुका था, तब अब आवंटन का रास्ता चुनने के पीछे क्या परिस्थितियां और नियम हैं?
तीसरा, राज्य सरकार द्वारा नगर निगम को बराबर मूल्य की दूसरी जमीन देने की व्यवस्था का वास्तविक स्वरूप क्या होगा और इससे नगर निगम के वित्तीय हितों की किस तरह रक्षा होगी?
इन सवालों के जवाब सामने आने से यह स्पष्ट हो सकेगा कि फैसला किन शर्तों और नियमों के तहत लिया गया है।फिलहाल इतना तय है कि करीब 20.5 करोड़ रुपये की अनुमानित बाजार कीमत वाले प्लॉट का विवाद एक नए प्रशासनिक मोड़ पर पहुंच गया है। गुजरात सरकार की मंजूरी के बाद नगर निगम ने प्रस्ताव तैयार किया है, लेकिन अंतिम आवंटन और उसकी विस्तृत शर्तों पर निर्णय होना बाकी है।
अब निगाहें वडोदरा नगर निगम की स्थायी समिति और आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया पर रहेंगी। क्योंकि मामला सिर्फ एक पूर्व क्रिकेटर को जमीन मिलने का नहीं, बल्कि इस व्यापक सवाल का भी है कि सरकारी संपत्ति के आवंटन में पारदर्शिता, समानता और जवाबदेही के मानक किस तरह लागू किए जाते हैं।
एनएसके का सवाल:
जब किसी सरकारी जमीन की कीमत करोड़ों रुपये हो और उसके आवंटन में मुफ्त हस्तांतरण के साथ बड़ी रियायत भी शामिल हो, तो क्या संबंधित आदेश, मूल्यांकन और शर्तों को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए?
आखिर सरकारी संपत्ति के हर बड़े फैसले का आधार जनता के सामने स्पष्ट होना ही चाहिए।
