आप आज भी आपातकाल मोड में हैं…’: राज्यसभा में सभापति सी • पी • राधाकृष्णन की कड़ी टिप्पणी से सियासी घमासान, संसद में लोकतंत्र, विरोध और मर्यादा पर नई बहस

बी के झा

NSK news India

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नई दिल्ली,1 अगस्त

संसद के मानसून सत्र में शुक्रवार को राज्यसभा का वातावरण एक बार फिर तीखा राजनीतिक टकराव का गवाह बना। विपक्षी दलों के लगातार हंगामे के बीच राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने विपक्ष को कड़े शब्दों में नसीहत देते हुए कहा कि “आप आज तक आपातकाल मोड में हैं। आप चाहते हैं कि हर कोई आपकी बात सुने, लेकिन आप किसी की बात नहीं सुनना चाहते। यह लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं है।”

सभापति की इस टिप्पणी के बाद सदन का माहौल और अधिक गर्म हो गया तथा सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया।

किन मुद्दों पर हुआ हंगामा?

विपक्षी सांसद छात्रों के खिलाफ कथित कार्रवाई पर केंद्रीय गृह मंत्री के बयान की मांग तथा अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी से जुड़े मुद्दे पर चर्चा कराने की मांग कर रहे थे। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सदस्य अपनी सीटों से उठकर नारेबाजी करने लगे, जिसके कारण सदन की कार्यवाही बाधित हुई।सभापति ने सदस्यों से शांत रहने की अपील करते हुए कहा कि प्रतिदिन इसी प्रकार का गतिरोध उत्पन्न किया जाता है और फिर विपक्ष सदन से वॉकआउट कर देता है, जिससे संसदीय कार्य प्रभावित होता है।

नियम-267 पर भी टकराव

बाद में सभापति ने विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे को बोलने की अनुमति दी। खरगे ने बताया कि उन्होंने नियम-267 के तहत सदन का नियमित कामकाज स्थगित कर तत्काल चर्चा कराने का नोटिस दिया है। इस पर सभापति ने स्पष्ट किया कि नियम-267 के अंतर्गत दिए गए किसी भी नोटिस को स्वीकार नहीं किया जाएगा। इसके बाद विपक्ष ने सरकार पर महत्वपूर्ण मुद्दों से बचने का आरोप लगाया, जबकि सत्ता पक्ष ने कहा कि सदन के निर्धारित एजेंडे को बाधित करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुकूल नहीं है।

केंद्र सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार के नेताओं का कहना है कि संसद चर्चा का मंच है, व्यवधान का नहीं। सरकार का तर्क है कि विपक्ष यदि गंभीरता से बहस करना चाहता है तो संसदीय नियमों के अनुरूप चर्चा के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं, लेकिन लगातार हंगामा और कार्यवाही बाधित करना लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करता है।सरकार का कहना है कि संसद का समय जनता का समय है और उसका सदुपयोग विधायी कार्यों तथा सार्थक बहस के लिए होना चाहिए।

कांग्रेस और विपक्ष की प्रतिक्रिया

कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दलों ने कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सरकार से जवाब मांगना है। उनका आरोप है कि सरकार संवेदनशील और जनहित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा से बच रही है। विपक्ष का कहना है कि जब महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की अनुमति नहीं मिलती, तब विरोध दर्ज कराना संसदीय परंपरा का हिस्सा है।विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा कि नियम-267 का उद्देश्य ही असाधारण परिस्थितियों में तत्काल चर्चा सुनिश्चित करना है और यदि ऐसे नोटिस लगातार अस्वीकार किए जाएंगे तो विपक्ष की प्रभावी भूमिका सीमित हो जाएगी।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद में टकराव अब केवल किसी एक मुद्दे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक विश्वास की कमी को भी दर्शाता है। उनके अनुसार सत्ता पक्ष कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने पर जोर देता है, जबकि विपक्ष जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता देने की मांग करता है। यदि संवाद की संस्कृति कमजोर होती है तो संसद की उत्पादकता और लोकतांत्रिक विमर्श दोनों प्रभावित होते हैं।विश्लेषकों का यह भी मानना है कि संसदीय बहुमत और विपक्ष के अधिकार—दोनों लोकतंत्र के अभिन्न अंग हैं और इनके बीच संतुलन बनाए रखना संसदीय नेतृत्व की सबसे बड़ी चुनौती है।

वरिष्ठ संविधान विशेषज्ञों की टिप्पणी

संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि संसद का मूल उद्देश्य विचार-विमर्श, जवाबदेही और कानून निर्माण है। विपक्ष को अपनी बात रखने का अधिकार है, वहीं सभापति को सदन की व्यवस्था बनाए रखने का संवैधानिक दायित्व प्राप्त है। विशेषज्ञों के अनुसार संसदीय नियमों की व्याख्या और उनका अनुपालन पीठासीन अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन साथ ही यह भी आवश्यक है कि विपक्ष को प्रभावी ढंग से अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिले।उनका मानना है कि लोकतंत्र की मजबूती इस बात से तय होती है कि मतभेदों का समाधान संवाद से हो, न कि लगातार गतिरोध से।

कानूनविदों की राय

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि संसद के नियमों का पालन प्रत्येक सदस्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है। वे मानते हैं कि विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन वह इस सीमा तक नहीं पहुंचना चाहिए कि विधायी प्रक्रिया पूरी तरह ठप हो जाए। दूसरी ओर सरकार की भी जिम्मेदारी है कि विपक्ष द्वारा उठाए गए गंभीर सार्वजनिक महत्व के विषयों पर उचित चर्चा सुनिश्चित करे।

शिक्षाविदों का दृष्टिकोण

शिक्षाविदों का कहना है कि संसद देश के लोकतांत्रिक संस्कारों का सर्वोच्च मंच है। वहां होने वाली बहसें करोड़ों युवाओं के लिए लोकतांत्रिक व्यवहार का उदाहरण बनती हैं। उनका मानना है कि तीखी असहमति भी गरिमा, तर्क और संवैधानिक मर्यादा के साथ व्यक्त की जानी चाहिए।

समाजसेवी संस्थाओं की अपील

कई सामाजिक संगठनों ने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों से संयम बरतने की अपील की है। उनका कहना है कि जनता चाहती है कि संसद में बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, किसानों और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर सार्थक चर्चा हो। लगातार हंगामे से जनता की अपेक्षाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

आम जनता की प्रतिक्रिया

संसदीय घटनाक्रम पर आम नागरिकों की प्रतिक्रियाएं भी मिश्रित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि विपक्ष को जनहित के मुद्दे उठाने का पूरा अधिकार है, जबकि अन्य नागरिकों का कहना है कि विरोध के बावजूद संसद की कार्यवाही बाधित नहीं होनी चाहिए। अधिकांश लोगों की अपेक्षा है कि सत्ता और विपक्ष दोनों संवाद के माध्यम से समाधान खोजें ताकि संसद की गरिमा और लोकतांत्रिक परंपराएं मजबूत हों।

निष्कर्ष

राज्यसभा में सभापति की “आपातकाल मोड” वाली टिप्पणी ने केवल तत्कालीन हंगामे को ही नहीं, बल्कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र में विरोध, जवाबदेही, संसदीय नियमों और सदन की गरिमा पर व्यापक बहस को भी नई दिशा दे दी है।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और विपक्ष टकराव की राजनीति से आगे बढ़कर संवाद और सहमति का रास्ता अपनाते हैं या नहीं, क्योंकि अंततः संसद की प्रभावशीलता ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी मानी जाती है।

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