बी के झा
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नई दिल्ली, 9 अगस्त
देश की सीमाओं पर तैनात सैनिक जब राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगाते हैं, तब देश के भीतर नागरिकों की जिम्मेदारी केवल तालियां बजाने तक सीमित नहीं रह सकती। घायल जवान के शरीर से बहने वाला खून जब जीवन और मृत्यु के बीच की आखिरी रेखा बन जाए, तब किसी नागरिक की नसों में दौड़ता रक्त उसके लिए जीवनदान बन सकता है।इसी भाव को राष्ट्रीय संकल्प में बदलने की अपील रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दिल्ली में आयोजित ‘सिंदूर आर्मी महा ब्लड डोनेशन यात्रा’ के दूसरे वर्ष के अभियान के दौरान की।
रक्षा मंत्री ने रक्तदान को महज सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि सैनिकों के प्रति नागरिक कर्तव्य से जोड़ते हुए कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत के शौर्य का एक आयाम था, जबकि ‘सिंदूर महारक्तदान यात्रा’ देश की करुणा और संवेदनशीलता का दूसरा आयाम है।उनका संदेश साफ था—सीमा पर जवान देश के लिए खून बहाता है, तो देश के भीतर नागरिक उसका खून बचाने का संकल्प लें।
‘सिंदूर’ अब केवल शौर्य की कहानी नहीं, सेवा का संकल्प भी
रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों ने सीमा पार उन तत्वों को जवाब दिया जिन्होंने भारत के नागरिकों की सुरक्षा को चुनौती देने की कोशिश की थी।लेकिन युद्ध और सैन्य कार्रवाई के बाद घायल सैनिकों की जिंदगी बचाने की चुनौती भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।यहीं रक्तदान की भूमिका सामने आती है।राजनाथ सिंह ने कहा कि देश की सेवा करते हुए घायल होने वाला एक भी सैनिक रक्त की कमी के कारण संकट में न पड़े, यही इस अभियान का मूल उद्देश्य होना चाहिए।यह संदेश केवल रक्तदान शिविर लगाने तक सीमित नहीं है।यह उस मानसिकता को बदलने की अपील है जिसमें सैनिक को केवल सीमा पर लड़ते हुए देखा जाता है।एक जवान जब घायल होता है तो उसके पीछे केवल सेना का मेडिकल सिस्टम नहीं, बल्कि पूरे देश की संवेदनशीलता खड़ी होनी चाहिए।
‘उन्होंने सीमा पर अपना खून दिया, हम देश के भीतर अपना रक्त देंगे‘
रक्षा मंत्री के संबोधन का सबसे भावनात्मक पक्ष यही था कि उन्होंने सैनिक और नागरिक के बीच रक्त के रिश्ते को रेखांकित किया।एक सैनिक सीमा पर खड़ा होकर देश की संप्रभुता की रक्षा करता है।लेकिन युद्ध, आतंकी हमले या सैन्य अभियान के दौरान घायल होने पर उसे रक्त की आवश्यकता पड़ती है।उस समय उसकी मदद करने वाला व्यक्ति जरूरी नहीं कि सैनिक हो।वह कोई विद्यार्थी हो सकता है।कोई शिक्षक,कोई डॉक्टर,कोई व्यापारी,कोई किसान,कोई सरकारी कर्मचारी,या देश का कोई सामान्य नागरिक
यानी—राष्ट्र की रक्षा केवल हथियार उठाने वालों की जिम्मेदारी नहीं; जीवन बचाने वालों की भी उतनी ही जिम्मेदारी है।
ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया पराक्रम, रक्तदान यात्रा दिखाएगी संवेदना
राजनाथ सिंह ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और रक्तदान अभियान को एक व्यापक राष्ट्रीय भावना के दो अलग-अलग पक्षों के रूप में प्रस्तुत किया।उनके अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की सैन्य क्षमता और दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दिया।वहीं रक्तदान अभियान यह दिखाता है कि भारत केवल युद्ध करने वाला राष्ट्र नहीं है।
भारत घायल को बचाने वाला, पीड़ित के साथ खड़ा होने वाला और मानव जीवन को सर्वोच्च महत्व देने वाला समाज भी है।यही इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।
जवान के लिए रक्त—सम्मान से आगे सेवा का प्रश्नदेश में सेना के प्रति सम्मान की भावना व्यापक है।शहीदों के सम्मान में कार्यक्रम होते हैं।सैनिकों के लिए नारे लगाए जाते हैं।राष्ट्रीय पर्वों पर सेना की वीरता को याद किया जाता है।लेकिन रक्तदान इन भावनाओं को सीधे सेवा में बदल देता है।क्योंकि रक्त किसी कारखाने में तैयार नहीं होता।इसे केवल एक स्वस्थ व्यक्ति दूसरे जरूरतमंद व्यक्ति को दे सकता है।इसलिए रक्तदान की अपील सैनिकों के संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।एक यूनिट रक्त किसी घायल सैनिक के लिए केवल रक्त नहीं—उसके परिवार के लिए उम्मीद, उसके साथियों के लिए राहत और राष्ट्र के लिए एक जिम्मेदारी का निर्वाह हो सकता है।
युवा शक्ति बने रक्तदान अभियान की रीढ़
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है।यदि युवाओं में नियमित और स्वैच्छिक रक्तदान की संस्कृति विकसित हो जाए तो देश में आपातकालीन परिस्थितियों में रक्त की उपलब्धता को मजबूत किया जा सकता है।
कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में रक्तदान अभियान
कॉरपोरेट संस्थानों में नियमित शिविर
सामाजिक संगठनों की भागीदारी
पूर्व सैनिक संगठनों का सहयोगऔर स्थानीय प्रशासन तथा स्वास्थ्य संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय—इन सभी को एक राष्ट्रीय रक्त सुरक्षा अभियान से जोड़ा जा सकता है।
‘सिंदूर महारक्तदान यात्रा’ इस दिशा में एक व्यापक सामाजिक संदेश का माध्यम बन सकती है।
सैनिक का परिवार भी इस संकल्प का हिस्सा
जब कोई जवान घायल होता है तो संघर्ष केवल अस्पताल के बिस्तर पर पड़े सैनिक का नहीं होता।उसका परिवार भी मानसिक और भावनात्मक संकट से गुजरता है।ऐसे समय में यदि अस्पताल में आवश्यक रक्त उपलब्ध हो तो उपचार की प्रक्रिया अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित हो सकती है।इसलिए रक्तदान को केवल चिकित्सा प्रक्रिया के रूप में नहीं बल्कि सैनिक परिवारों के प्रति सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में भी देखा जाना चाहिए।जवान सीमा पर अकेला नहीं होना चाहिए और घायल होने के बाद भी अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय अभियान की जरूरत
रक्तदान ऐसा विषय है जिस पर राजनीतिक मतभेदों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
सरकार हो या विपक्ष, सत्ता पक्ष हो या विरोधी दल,सामाजिक संगठन हों या धार्मिक संस्थाएं, युवा संगठन हों या उद्योग जगत, सभी मिलकर एक ऐसा राष्ट्रीय नेटवर्क बना सकते हैं जिसमें जरूरत पड़ने पर सैनिकों, अर्धसैनिक बलों और आम नागरिकों के लिए सुरक्षित रक्त की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
यदि ‘सिंदूर’ को केवल एक सैन्य अभियान के नाम के रूप में नहीं बल्कि राष्ट्रसेवा की भावना के रूप में देखा जाए तो रक्तदान उसका सबसे मानवीय विस्तार बन सकता है।
शौर्य और करुणा—राष्ट्रवाद के दो चेहरे
रक्षा मंत्री का संदेश इसी व्यापक सोच को सामने लाता है।राष्ट्रवाद केवल सीमा पर दुश्मन के सामने खड़े होने का नाम नहीं है।राष्ट्रवाद उस घायल सैनिक के लिए अस्पताल पहुंचकर रक्त देने में भी दिखाई देता है, राष्ट्रवाद आपदा के समय राहत पहुंचाने में भी है, राष्ट्रवाद किसी जरूरतमंद की जान बचाने में भी है और राष्ट्रवाद उस परिवार के साथ खड़े होने में भी है जिसका बेटा देश की रक्षा करते हुए घायल हुआ है।
इस दृष्टि से देखें तो—‘ऑपरेशन सिंदूर’ शौर्य की भाषा थी, ‘सिंदूर महारक्तदान यात्रा’ सेवा की भाषा है।
दोनों का लक्ष्य एक ही है—राष्ट्र की रक्षा।
एक सीमा पर, दूसरा जीवन के मोर्चे पर, एक भी जवान रक्त की कमी से न जूझे’—अब यह केवल नारा नहीं, राष्ट्रीय लक्ष्य बने
रक्षा मंत्री के आह्वान को यदि व्यापक सामाजिक अभियान में बदलना है तो इसे केवल एक दिन के कार्यक्रम तक सीमित नहीं किया जा सकता, रक्तदान को नियमित नागरिक संस्कार बनाने की जरूरत है, हर शहर में नियमित रक्तदान शिविर, हर बड़े अस्पताल के साथ स्वैच्छिक रक्तदाता नेटवर्क।
आपातकालीन जरूरत के लिए डिजिटल रक्तदाता सूची
युवाओं को जागरूक करने के लिए शैक्षणिक संस्थानों में अभियान और सैनिकों तथा उनके परिवारों के लिए प्राथमिकता
आधारित सहायता तंत्र—ऐसी व्यवस्था इस संकल्प को स्थायी रूप दे सकती है।
संपादकीय निष्कर्ष:
सीमा की रक्षा से लेकर जीवन की रक्षा तक
भारत के सैनिक सीमा पर खड़े होकर यह सुनिश्चित करते हैं कि देश सुरक्षित रहे।लेकिन जब वही सैनिक घायल होकर अस्पताल पहुंचता है तो उसकी जिंदगी बचाने में समाज की भूमिका शुरू होती है।
यही वह बिंदु है जहां देशभक्ति भावना से सेवा में बदलती है।रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का रक्तदान अभियान के मंच से दिया गया संदेश इसी परिवर्तन की मांग करता है—सैनिकों के सम्मान में केवल नारे नहीं, जरूरत पड़ने पर रक्त भी दीजिए।
क्योंकि सीमा पर खड़ा जवान देश के लिए अपना सर्वस्व देने को तैयार है।
अब देश की बारी है
वहां जवान ने कहा—‘देश पहले।’यहां नागरिक कहे—‘जवान का जीवन पहले।’और यदि देश में यह भावना मजबूत होती है तो ‘सिंदूर’ केवल एक सैन्य अभियान की स्मृति नहीं रहेगा—यह शौर्य, सेवा और संवेदना को जोड़ने वाला राष्ट्रीय संकल्प बन सकता है।
