बी के झा
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नई दिल्ली, 26 अगस्त
कश्मीर की वादियों में परिवार की शादी में शामिल होने की एक 82 वर्षीय अमेरिकी नागरिक की इच्छा अब देश की सर्वोच्च अदालत में राष्ट्रीय सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विदेशी नागरिकों के अधिकार और भारत की संप्रभुता के बीच संतुलन का सवाल बन गई है। अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के डॉक्टर खालिद जहांगीर काजी, जो कभी OCI कार्डधारक रहे हैं, ने कश्मीर जाने की अनुमति के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।काजी का कहना है कि वह अपनी बहन के परिवार में होने वाले विवाह समारोहों में शामिल होने के लिए श्रीनगर जाना चाहते हैं। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पराग त्रिपाठी ने अदालत में उनकी उम्र और परिवार के बुजुर्ग सदस्यों का हवाला देते हुए कहा कि शायद यह उनके लिए परिवार के साथ मिलने-जुलने का आखिरी अवसर हो। काजी ने यह भरोसा देने की पेशकश भी की है कि भारत यात्रा के दौरान वह किसी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे।
मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को प्रस्तावित है।लेकिन इस मामले की असली पेचीदगी शादी में शामिल होने की इच्छा से कहीं आगे है।मामला सिर्फ एक बुजुर्ग की यात्रा का नहीं भारत सरकार ने काजी पर पाकिस्तान समर्थक प्रचार करने और कश्मीरी अलगाववादी गतिविधियों के प्रति सहानुभूति रखने के आरोप लगाए थे। इन्हीं आरोपों के आधार पर मई 2023 में न्यूयॉर्क स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास ने उनका OCI कार्ड रद्द कर दिया था और बाद में उन्हें भारत में प्रवेश से रोकने के लिए ब्लैकलिस्ट किए जाने की बात सामने आई।
दिल्ली हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में सरकार का पक्ष यह रहा कि उनके खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों से प्राप्त इनपुट भारत की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा से जुड़े थे।
यहीं से मामला संवेदनशील हो जाता है—एक तरफ 82 वर्षीय व्यक्ति का परिवार से मिलने का मानवीय पक्ष है, तो दूसरी तरफ राज्य की वह जिम्मेदारी है जिसमें विदेशी नागरिक की भारत में प्रवेश की अनुमति राष्ट्रीय सुरक्षा के मानकों से तय होती है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या कहा था?
12 नवंबर 2024 को दिल्ली हाईकोर्ट की एकल पीठ ने काजी का OCI कार्ड रद्द करने और ब्लैकलिस्ट करने संबंधी कार्रवाई को रद्द कर दिया था। अदालत ने मुख्य रूप से इस बात पर जोर दिया कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं थे और उन्हें प्रभावी ढंग से अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं मिला।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि OCI कार्डधारक भारतीय नागरिक नहीं होते और भारत में प्रवेश देना राज्य का संप्रभु अधिकार है।इस फैसले को चुनौती देने वाली अपीलें दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के सामने लंबित हैं।
11 अगस्त 2026 के आदेश के मुताबिक इन अपीलों की सुनवाई 24 अगस्त को हाईकोर्ट में होनी थी। इससे पहले 3 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट से काजी की भारत यात्रा की अंतरिम अनुमति संबंधी अर्जी पर शीघ्र फैसला करने का अनुरोध किया था।
अर्थात कानूनी तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है। एक ओर एकल पीठ का फैसला काजी के पक्ष में है, तो दूसरी ओर केंद्र सरकार की अपील और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े उसके तर्क अभी न्यायिक जांच के दायरे में हैं।
कानूनविदों के लिए सबसे बड़ा सवाल: OCI कार्ड क्या नागरिकता का विकल्प है?
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यही है। OCI यानी Overseas Citizen of India भारतीय नागरिकता नहीं है। OCI धारक को भारत से जुड़ी कई सुविधाएं मिलती हैं, लेकिन उसे भारतीय नागरिक के समान संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं होते।यही वजह है कि सरकार का तर्क है कि किसी विदेशी नागरिक को भारत में प्रवेश देना उसका मौलिक अधिकार नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में केंद्र ने यह भी कहा था कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत प्रत्येक संप्रभु राष्ट्र को यह अधिकार है कि वह किस विदेशी नागरिक को अपने क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति दे और किसे नहीं।
दूसरी तरफ काजी की ओर से मूल तर्क यह है कि सरकार यदि उनके OCI जैसे विशेष दर्जे को खत्म करती है या प्रवेश रोकती है तो उसे कानून में निर्धारित प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना होगा।यही वह बिंदु है जहां यह मुकदमा महज एक व्यक्ति की यात्रा से निकलकर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम प्रक्रिया की निष्पक्षता’ के बड़े संवैधानिक विमर्श में प्रवेश करता है।
रक्षा विशेषज्ञों की नजर में राष्ट्रीय सुरक्षा का दृष्टिकोण
रक्षा और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों के लिए यह सवाल अहम है कि किसी व्यक्ति पर अलगाववादी या पाकिस्तान समर्थक गतिविधियों से जुड़े गंभीर सुरक्षा आरोप हों तो क्या केवल उम्र और पारिवारिक समारोह के मानवीय आधार पर उसे संवेदनशील क्षेत्र में प्रवेश दिया जा सकता है?
राष्ट्रीय सुरक्षा का सिद्धांत कहता है कि सुरक्षा एजेंसियों के पास कई बार ऐसे इनपुट होते हैं जिन्हें सार्वजनिक करना संभव नहीं होता। दिल्ली हाईकोर्ट के 2024 के रिकॉर्ड में भी केंद्र ने सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट और खुफिया इनपुट का हवाला दिया था।
लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों के सामने दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है—यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जाती है तो क्या आरोप इतने स्पष्ट होने चाहिए कि वह उनका प्रभावी ढंग से जवाब दे सके?
यानी राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ यह नहीं कि न्यायिक समीक्षा समाप्त हो जाए; और न्यायिक समीक्षा का अर्थ यह भी नहीं कि राज्य की सुरक्षा संबंधी गोपनीय सूचनाएं सार्वजनिक कर दी जाएं। इस मामले की असली परीक्षा इसी संतुलन की है।
राजनीतिक गलियारों में क्यों गरमा सकता है मामला?
सत्ता पक्ष के नजरिए से इसे इस तर्क के साथ देखा जा सकता है कि कश्मीर अब वह क्षेत्र नहीं है जहां अलगाववादी राजनीति को किसी भी रूप में सामान्य राजनीतिक गतिविधि मानकर नजरअंदाज किया जाए। यदि किसी विदेशी नागरिक पर पाकिस्तान समर्थक प्रचार या अलगाववाद के प्रति सहानुभूति के आरोप हैं तो सरकार का सतर्क रहना स्वाभाविक है।
विपक्षी राजनीति से जुड़े संभावित तर्क का दूसरा सिरा है—राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है, लेकिन कार्रवाई कानून और प्राकृतिक न्याय की कसौटी पर भी खरी उतरनी चाहिए। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी 2024 में इसी प्रक्रिया संबंधी प्रश्न पर सरकार की कार्रवाई को झटका दिया था।इसलिए राजनीतिक बहस में असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि काजी ‘सरकार के पक्ष में हैं या खिलाफ’,
बल्कि यह होना चाहिए कि क्या सुरक्षा संबंधी आरोपों पर की गई प्रशासनिक कार्रवाई कानून की तय प्रक्रिया का पालन करती है?
मुस्लिम मौलानाओं और संगठनों के लिए भी यह दोहरी परीक्षा
मुस्लिम धार्मिक नेताओं और सामाजिक संगठनों के लिए यह मामला बेहद संवेदनशील है। एक ओर यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ पाकिस्तान समर्थक या अलगाववादी विचारों के आरोप हैं तो उन आरोपों की स्वतंत्र जांच और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात सामने आ सकती है।
दूसरी ओर किसी व्यक्ति की उम्र, पारिवारिक संबंध और कानूनी अधिकारों को केवल उसकी पहचान के आधार पर नजरअंदाज करना भी न्यायसंगत नहीं होगा।
एक जिम्मेदार सामाजिक विमर्श यही कहेगा कि किसी व्यक्ति के कथित राजनीतिक विचार और पूरे मुस्लिम समाज की देशभक्ति को एक तराजू में नहीं तौला जा सकता। न किसी आरोपित व्यक्ति के कारण पूरे समुदाय को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए और न ही धार्मिक पहचान के कारण किसी गंभीर सुरक्षा आरोप को स्वतः खारिज किया जा सकता है।
मुस्लिम समाज के प्रबुद्ध वर्ग के सामने चुनौती यही है कि वह संविधान, कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा—तीनों के पक्ष में स्पष्ट और संतुलित आवाज उठाए।
समाजसेवी संस्थाओं की चिंता: क्या मानवीय आधार पर अस्थायी अनुमति संभव है?
मानवाधिकार और सामाजिक संगठनों की दृष्टि से काजी की उम्र और पारिवारिक परिस्थिति महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यक्ति अपने परिजनों के विवाह में शामिल होना चाहता है और राजनीतिक गतिविधि से दूर रहने की लिखित शर्त स्वीकार करता है तो एक सीमित अवधि की निगरानीयुक्त यात्रा पर विचार किया जा सकता है—
यह एक संभावित नीति विकल्प हो सकता है।लेकिन इसका निर्णय अदालत और सरकार को सुरक्षा आकलन के आधार पर ही करना होगा।
क्योंकि कश्मीर कोई सामान्य पर्यटन स्थल भर नहीं है; यहां सुरक्षा संवेदनशीलता का अपना विशिष्ट इतिहास और वर्तमान संदर्भ है।
सरकार के सामने भी आसान रास्ता नहीं
केंद्र सरकार के लिए यह मामला दोहरी चुनौती है। यदि वह काजी को बिना पर्याप्त सुरक्षा आश्वासन के कश्मीर जाने देती है तो उस पर सुरक्षा के साथ समझौते का राजनीतिक आरोप लग सकता है। दूसरी ओर यदि वह एक 82 वर्षीय व्यक्ति को केवल पुराने आरोपों के आधार पर परिवार से मिलने से रोकती है, जबकि अदालत पहले ही प्रक्रिया संबंधी खामियों पर सरकारी आदेशों को रद्द कर चुकी है, तो सरकार को न्यायिक कसौटी पर कठिन सवालों का सामना करना पड़ सकता है।
इसलिए सरकार के लिए सबसे मजबूत रास्ता यही होगा कि वह सुप्रीम कोर्ट के सामने तथ्य, सुरक्षा आकलन और कानूनी आधार स्पष्ट रूप से रखे, न कि केवल व्यापक ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का हवाला देकर मामला समाप्त करने की कोशिश करे।
विपक्ष के लिए भी सियासत से ज्यादा सावधानी जरूरी
विपक्ष यदि इस मामले को मानवाधिकार और न्यायिक प्रक्रिया के सवाल के रूप में उठाता है तो उसके पास मजबूत संवैधानिक तर्क हो सकता है। लेकिन यदि इसे केवल ‘सरकार बनाम अल्पसंख्यक’ के राजनीतिक चश्मे से देखा गया तो राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल उसके खिलाफ खड़ा किया जा सकता है।इसी तरह सत्ता पक्ष के लिए भी यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि ‘राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है।’ लोकतंत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि होने के साथ-साथ कानून का शासन भी सर्वोपरि है।
असली फैसला कश्मीर जाने पर नहीं, संतुलन पर होगा
काजी की याचिका का अंतिम महत्व इस बात से कहीं ज्यादा है कि एक विदेशी नागरिक, OCI का दर्जा, भारत में प्रवेश का अधिकार, राष्ट्रीय सुरक्षा, अलगाववादी विचारों के आरोप और प्राकृतिक न्याय—इन सभी के बीच भारतीय न्यायपालिका किस तरह संतुलन बनाती है।
एक 82 वर्षीय व्यक्ति की अपने परिवार से मिलने की इच्छा निश्चित रूप से मानवीय है। लेकिन राज्य के लिए सुरक्षा संबंधी संदेह भी उतने ही गंभीर हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था की खूबसूरती इसी में है कि न तो भावनाओं के दबाव में सुरक्षा को भुलाया जाए और न सुरक्षा के नाम पर कानून की प्रक्रिया को।
अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का जवाब यह तय करने में महत्वपूर्ण होगा कि काजी के मामले को केवल एक पारिवारिक यात्रा की अनुमति के रूप में देखा जाएगा या फिर यह मामला भारत में विदेशी नागरिकों, OCI धारकों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों के लिए एक बड़ा कानूनी नजीर बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा।
कश्मीर जाने की अनुमति की मांग छोटी दिखाई दे सकती है, लेकिन उसके पीछे खड़ा संवैधानिक प्रश्न बड़ा है—भारत की सुरक्षा और भारत के कानून, दोनों की रक्षा एक साथ कैसे हो?
