बी के झा
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पटना, 28 अगस्त
आरक्षण को लेकर बिहार की सियासत में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। इस बार सवाल आरक्षण खत्म करने का नहीं, बल्कि आरक्षण के भीतर आरक्षण और उसके लाभ के समान बंटवारे का है।
केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के प्रमुख जीतन राम मांझी ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा के साथ अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण यानी ‘कोटे में कोटा’ लागू करने की जोरदार पैरवी की है। खास बात यह है कि उनका यह बयान केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के उस रुख के बाद आया है, जिसमें उन्होंने आरक्षण को किसी भी तरह की ‘खैरात’ मानने से इनकार करते हुए इसकी समीक्षा या बदलाव का विरोध किया था।
मांझी ने साफ शब्दों में कहा कि आरक्षण की समीक्षा का अर्थ आरक्षण समाप्त करना नहीं है। असली सवाल यह है कि जिस सामाजिक न्याय के उद्देश्य से आरक्षण की व्यवस्था बनाई गई थी, उसका लाभ समाज के सबसे वंचित तबके तक आखिर कितना पहुंच रहा है।
‘कुछ आगे निकल गए, नीचे वाले वहीं रह गए’
जीतन राम मांझी का तर्क है कि आरक्षित वर्ग के भीतर भी सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ जातियां और परिवार आरक्षण का लाभ लेकर काफी आगे निकल चुके हैं। उनके बच्चों की शिक्षा, रोजगार और सामाजिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया है।
दूसरी तरफ ऐसे समुदाय भी हैं, जो आज तक बुनियादी शिक्षा और अवसरों से जूझ रहे हैं।मांझी ने इसी असमानता को आरक्षण व्यवस्था के भीतर नए सिरे से विचार करने का आधार बनाया है। उनका कहना है कि यदि आरक्षण का लाभ लगातार उन्हीं अपेक्षाकृत सक्षम वर्गों तक पहुंचता रहेगा, तो सबसे पिछड़े और वंचित तबकों को बराबरी का अवसर कैसे मिलेगा?
यही वह सवाल है, जिसने अब बिहार की राजनीति में ‘आरक्षण बनाम आरक्षण के भीतर हिस्सेदारी’ की बहस को जन्म दे दिया है।
मांझी का ‘कोटे में कोटा’ वाला फॉर्मूला
मांझी ने अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण की वकालत करते हुए कहा कि आरक्षित वर्ग में भी उन समुदायों की पहचान जरूरी है, जिन्हें अब तक आरक्षण का पर्याप्त लाभ नहीं मिल सका है। उनका मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत राज्यों को इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए दावा किया कि पहले आरक्षित वर्ग की कुछ प्रभावशाली जातियां ही सरकारी नौकरियों और अवसरों में बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर लेती थीं।
उप-वर्गीकरण के बाद अपेक्षाकृत वंचित तबकों को भी आरक्षण का अपना हिस्सा मिलने का रास्ता खुला।
मांझी का संदेश स्पष्ट है—आरक्षण का दरवाजा खुला रहे, लेकिन उसके भीतर खड़े हर व्यक्ति को बराबर आगे बढ़ने का मौका भी मिले।
चिराग से अलग दिखी मांझी की राह
इस पूरे विवाद का सबसे राजनीतिक पहलू चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के अलग-अलग रुख में दिखाई दे रहा है।चिराग पासवान ने आरक्षण को ‘खैरात’ मानने की धारणा को खारिज करते हुए कहा था कि आरक्षण को खत्म करना तो दूर, इसकी समीक्षा या बदलाव की कोई भी बात स्वीकार्य नहीं है।
उनका तर्क है कि आरक्षण सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकार का माध्यम है, इसे किसी सरकारी मेहरबानी की तरह नहीं देखा जा सकता।
मांझी ने भी आरक्षण खत्म करने की मांग नहीं की है। लेकिन उन्होंने चिराग के तर्क से अलग एक दूसरा सवाल खड़ा कर दिया है—अगर आरक्षण सामाजिक न्याय का हथियार है, तो क्या उसका लाभ समाज के सबसे वंचित व्यक्ति तक पहुंच रहा है?
यहीं से दोनों नेताओं के बयान एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई देते हैं।
‘समीक्षा’ शब्द पर सियासी तापमान बढ़ा
आरक्षण की ‘समीक्षा’ शब्द अपने आप में बेहद संवेदनशील है। यही वजह है कि चिराग पासवान के बयान के बाद मांझी की प्रतिक्रिया को बिहार की राजनीति में महज दो नेताओं की बयानबाजी के तौर पर नहीं देखा जा रहा।
मांझी ने स्पष्ट करने की कोशिश की है कि वह आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने की बात नहीं कर रहे, बल्कि उसके लाभार्थियों के दायरे को और व्यापक करने की मांग कर रहे हैं।उनका कहना है कि जिन लोगों को लंबे समय से आरक्षण का लाभ मिल रहा है, उनके बच्चे भी आगे बढ़ रहे हैं, जबकि आरक्षित वर्ग के भीतर ही ऐसे लोग मौजूद हैं जो अभी भी शिक्षा और अवसरों की दौड़ में काफी पीछे हैं।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आरक्षण की मौजूदा संरचना उन लोगों तक पर्याप्त पहुंच बना पा रही है, जिनके लिए इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है?
बिहार सरकार से मांझी की सीधी मांग
मांझी ने बिहार सरकार से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की अपील की है। उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से अनुरोध किया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्यों को दिए गए अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए बिहार में आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण की व्यवस्था लागू की जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर बिहार सरकार और केंद्र के स्तर पर चर्चा हुई है। उनके बेटे संतोष कुमार की ओर से भी सब-कोटा की मांग उठाए जाने का उन्होंने उल्लेख किया।
अब गेंद बिहार सरकार के पाले में है। सवाल यह है कि सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है।असली लड़ाई आरक्षण खत्म करने की नहीं, हिस्सेदारी की?
मांझी के बयान का राजनीतिक मर्म यही है कि आरक्षण की लड़ाई अब केवल आरक्षण बचाने तक सीमित नहीं रह गई है। आरक्षित वर्ग के भीतर भी यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर उसका लाभ किसे और कितना मिल रहा है।
एक तरफ चिराग पासवान जैसे नेता आरक्षण की समीक्षा की किसी भी संभावना को सामाजिक न्याय के अधिकार के लिए खतरा मान रहे हैं। दूसरी तरफ मांझी आरक्षण को बनाए रखते हुए उसके भीतर हिस्सेदारी के पुनर्वितरण की मांग कर रहे हैं।
बिहार जैसे सामाजिक रूप से जटिल राज्य में यह बहस सिर्फ सरकारी नौकरियों और आंकड़ों की बहस नहीं है। इसके पीछे प्रतिनिधित्व, राजनीतिक हिस्सेदारी, सामाजिक सम्मान और आने वाली पीढ़ियों के अवसरों का बड़ा सवाल छिपा है।
इसलिए आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार की राजनीति ‘आरक्षण बचाओ’ और ‘आरक्षण का लाभ सब तक पहुंचाओ’ के बीच किस नए राजनीतिक विमर्श को जन्म देती है।
