बी के झा
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गाजियाबाद, 27 अगस्त
गाजियाबाद शहर में अवैध निर्माण के खिलाफ गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) ने अब कागजी चेतावनियों से आगे बढ़कर कार्रवाई का संकेत दे दिया है। प्राधिकरण की ओर से पहले जारी किए गए 1,500 से अधिक नोटिसों के बावजूद जिन संपत्ति मालिकों ने अवैध निर्माण को शमन यानी कंपाउंडिंग के जरिए वैध कराने की प्रक्रिया पूरी नहीं की, उनके खिलाफ अब सीलिंग और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की तैयारी है।
GDA ने अधिकतम 30 दिन की अंतिम मोहलत दी है। इसके बाद कार्रवाई शुरू होने की बात कही गई है।मामले ने शहर की नियोजित विकास व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक संरक्षण जैसे सवालों को भी सामने ला दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि निर्माण नियमों के खिलाफ था तो वह खड़ा कैसे हुआ और वर्षों तक उस पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
टोकन मनी देकर बचते रहे, अब नहीं चलेगा खेल
GDA की कार्रवाई के दायरे में ऐसे मामले भी बताए जा रहे हैं, जहां संपत्ति मालिकों ने सीलिंग या अन्य कार्रवाई से बचने के लिए कंपाउंडिंग शुल्क के नाम पर शुरुआती टोकन मनी जमा कर दी, लेकिन इसके बाद पूरी राशि जमा नहीं की और न ही कंपाउंडिंग की प्रक्रिया पूरी की।ऐसे मामलों में निर्माण की स्थिति जस की तस बनी रही। अब प्राधिकरण ने संकेत दिया है कि केवल मामूली रकम जमा कर कार्रवाई को लंबे समय तक टालने की व्यवस्था स्वीकार नहीं की जाएगी।
इंडस्ट्रियल इकाइयों से वेयर हाउस तक रडार पर
GDA की कार्रवाई का बड़ा हिस्सा इंडस्ट्रियल इकाइयों, बड़े वेयरहाउस और स्वीकृत नक्शे से अतिरिक्त निर्माण करने वाली संपत्तियों पर केंद्रित बताया जा रहा है।कई आवासीय और व्यावसायिक भवनों में भी स्वीकृत मानचित्र से बाहर निर्माण किए जाने की शिकायतें और मामले सामने आते रहे हैं। ऐसे में अगले 30 दिन संपत्ति मालिकों के लिए महज मोहलत नहीं, बल्कि अपने निर्माण की वैधता स्पष्ट करने की आखिरी खिड़की साबित हो सकते हैं।
असली सवाल सिर्फ अवैध निर्माण का नहीं, निगरानी का भी
शहरी नियोजन के विशेषज्ञों का मानना है कि अवैध निर्माण अचानक एक दिन में खड़ा नहीं होता। नक्शा पास होने से लेकर निर्माण पूरा होने तक कई स्तरों पर निगरानी की व्यवस्था होती है। ऐसे में किसी निर्माण के वर्षों बाद अवैध घोषित होने पर सिर्फ संपत्ति मालिक की जवाबदेही तय करना पर्याप्त नहीं होगा।
राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर भी यह सवाल महत्वपूर्ण है कि अवैध निर्माणों पर कार्रवाई हमेशा तब क्यों तेज होती है, जब वे बड़े पैमाने पर फैल चुके होते हैं?
यदि प्रवर्तन व्यवस्था समय रहते सक्रिय रहे तो हजारों लोगों को बाद में नोटिस और ध्वस्तीकरण की स्थिति का सामना ही न करना पड़े।
GDA के उपाध्यक्ष नंद किशोर कलाल ने पूर्व नोटिसों की अनदेखी करने वालों के खिलाफ सीलिंग की कार्रवाई का संकेत दिया है। साथ ही, प्रवर्तन में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों और टीमों पर भी कार्रवाई की संभावना जताई गई है।
कानूनविदों की नजर में ‘नोटिस से बुलडोजर’ के बीच जरूरी है पारदर्शिता
कानूनी दृष्टि से किसी भी ध्वस्तीकरण कार्रवाई में यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित संपत्ति की स्थिति, स्वीकृत नक्शा, उल्लंघन की प्रकृति और उपलब्ध वैधानिक उपचार स्पष्ट हों। जहां कंपाउंडिंग की कानूनी गुंजाइश है, वहां संबंधित पक्ष को नियमानुसार प्रक्रिया पूरी करने का अवसर मिलना चाहिए।
वहीं दूसरी तरफ, यदि कोई निर्माण स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन करता है और वैधानिक अवसरों के बावजूद उसे नियमित कराने की प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती, तो नियमों के समान रूप से लागू होने की मांग भी उतनी ही मजबूत है।
कानून का संदेश दोहरा होना चाहिए—नियम तोड़ने वाले को संरक्षण नहीं और नियमों का पालन करने वाले को नुकसान नहीं।
समाजसेवी संगठनों के सामने मानवीय पहलू भी बड़ा सवाल
सामाजिक संगठनों के लिए चुनौती यह होगी कि कार्रवाई के दौरान वास्तविक अवैध निर्माण और ऐसे मामलों के बीच अंतर किया जाए, जहां परिवारों ने अपनी जीवनभर की कमाई लगाकर संपत्ति खरीदी हो और उन्हें निर्माण की वैधता की जानकारी ही न रही हो।
हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि किसी भी नागरिक को संपत्ति खरीदने या निर्माण कराने से पहले उसकी वैधता की जांच करनी चाहिए। अतीत में गाजियाबाद में अवैध कब्जों और अवैध कॉलोनियों पर कार्रवाई के दौरान प्रशासन ने भी लोगों को निर्माण और संपत्ति की वैधता जांचने की सलाह दी है।
स्थानीय लोगों के सामने सबसे बड़ा डर—बुलडोजर से पहले समाधान होगा या नहीं?
स्थानीय स्तर पर इस कार्रवाई को लेकर दो तरह की चिंताएं स्वाभाविक हैं। एक पक्ष चाहता है कि शहर में अवैध निर्माण पर सख्ती हो, क्योंकि अनियोजित निर्माण से यातायात, पार्किंग, सीवर, अग्नि सुरक्षा और सार्वजनिक सुविधाओं पर दबाव बढ़ता है।दूसरी ओर, प्रभावित संपत्ति मालिकों के लिए सवाल यह है कि जिन मामलों में निर्माण का कुछ हिस्सा नियमों के अनुरूप किया जा सकता है, वहां क्या ध्वस्तीकरण से पहले नियमानुसार सुधार और कंपाउंडिंग का वास्तविक अवसर मिलेगा?
यही वह बिंदु है जहां GDA की अगली कार्रवाई की पारदर्शिता सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होगी।
विपक्ष के लिए भी खुला राजनीतिक सवाल
इस पूरे मामले ने विपक्षी दलों के लिए भी सरकार और प्राधिकरण की कार्यशैली पर सवाल उठाने की जमीन तैयार कर दी है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में किसी विपक्षी दल की इस मामले पर ताजा आधिकारिक प्रतिक्रिया दर्ज नहीं है, इसलिए बिना पुष्टि किसी दल या नेता के नाम से बयान जोड़ना उचित नहीं होगा।
लेकिन राजनीतिक बहस का केंद्रीय सवाल साफ है—यदि 1,500 से अधिक संपत्तियों को पहले ही नोटिस दिए जा चुके थे तो इतने बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण विकसित होने की जिम्मेदारी सिर्फ भवन मालिकों की है या निगरानी तंत्र की भी?
30 दिन बाद सिर्फ बुलडोजर नहीं, व्यवस्था की परीक्षा होगी
GDA ने अब गेंद संपत्ति मालिकों के पाले में डाल दी है। लेकिन अगले 30 दिन केवल अवैध निर्माण करने वालों की परीक्षा नहीं हैं। यह GDA की प्रवर्तन व्यवस्था की भी परीक्षा है।यदि कार्रवाई होती है तो क्या वह समान रूप से होगी?
क्या बड़े और छोटे निर्माण में एक जैसा पैमाना अपनाया जाएगा?
क्या राजनीतिक या प्रभावशाली लोगों के मामलों में भी वही सख्ती दिखाई देगी?
क्या कार्रवाई से पहले सभी वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन होगा?
और सबसे अहम—क्या आगे अवैध निर्माण रोकने के लिए निगरानी तंत्र मजबूत किया जाएगा?
इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि यह अभियान महज कुछ संपत्तियों पर बुलडोजर चलाने तक सीमित रहता है या गाजियाबाद के शहरी नियोजन में वास्तव में बड़ा बदलाव लाता है।
फिलहाल संदेश साफ है—नोटिसों की अनदेखी की अवधि खत्म हो रही है। अब 30 दिन की मोहलत के बाद GDA के सामने कागजी कार्रवाई को जमीन पर उतारने की चुनौती है।
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