बी के झा
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पटना, 28 अगस्त
बांकीपुर की राजनीति में रक्षाबंधन के बहाने एक ऐसा राजनीतिक दृश्य सामने आया, जिसने आने वाले दिनों की सियासत के कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जन सुराज के सूत्रधार और बांकीपुर के विधायक प्रशांत किशोर की कलाई पर बड़ी संख्या में महिलाओं ने राखी बांधी। तिलक हुआ, आरती हुई और राखी के धागे के साथ पीके को मिला बहनों के स्नेह और भरोसे का संदेश।
प्रशांत किशोर भी इस मौके पर बेहद प्रसन्न नजर आए। लेकिन राजनीति में कोई भी सार्वजनिक आयोजन सिर्फ भावनाओं तक सीमित नहीं रहता। खासकर तब, जब सामने प्रशांत किशोर जैसा रणनीतिकार हो, जिसने लंबे समय तक चुनावी राजनीति को बेहद करीब से देखा और समझा हो।इसलिए बांकीपुर में उठ रहा सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह सिर्फ भाई-बहन के रिश्ते का उत्सव था या प्रशांत किशोर की उस राजनीतिक रणनीति का हिस्सा, जिसमें वह मतदाता से सीधे भावनात्मक और सामाजिक संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं?’
नेता’ से ज्यादा ‘अपने आदमी’ की छवि बनाने की कोशिश
बांकीपुर में प्रशांत किशोर की राजनीति का सबसे अलग पहलू उनका लगातार क्षेत्र में मौजूद रहना है। पार्क में सुबह टहलने वालों से मुलाकात हो या स्थानीय नागरिकों की समस्याएं सुनना, पीके लगातार जनता के बीच दिखाई दे रहे हैं।पारंपरिक राजनीति में चुनाव के दौरान जनता के दरवाजे तक पहुंचने वाले नेताओं की कमी नहीं रही है। लेकिन चुनाव के बाद भी उसी स्तर पर जनता के बीच बने रहना एक अलग राजनीतिक संदेश देता है।यही कारण है कि पीके की गतिविधियों को उनके समर्थक ‘जनता के बीच रहने वाली राजनीति’ बता रहे हैं।
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इससे भी आगे है।उनका मानना है कि प्रशांत किशोर शायद बांकीपुर को सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र के रूप में नहीं देख रहे। यह उनके लिए ऐसा राजनीतिक प्रयोग भी हो सकता है, जहां संगठन, प्रशासनिक हस्तक्षेप, जनसंपर्क और स्थानीय मुद्दों को एक साथ जोड़कर नया राजनीतिक मॉडल तैयार किया जाए।
BJP-RJD-JDU-कांग्रेस के सामने नई चुनौती?
बिहार की राजनीति लंबे समय से BJP-NDA और RJD-कांग्रेस जैसे बड़े राजनीतिक ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। JDU ने भी राज्य की राजनीति में अपनी अलग भूमिका बनाए रखी है।ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में जन सुराज की चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि अपने लिए स्थायी राजनीतिक जगह बनाने की है।और बांकीपुर इसी प्रयोग की पहली बड़ी प्रयोगशाला बन सकता है।
विपक्षी दलों की ओर से पीके की सक्रियता को लेकर स्वाभाविक सवाल उठेंगे—
क्या लगातार जनसंपर्क और अधिकारियों के साथ बैठकें वास्तव में स्थानीय समस्याओं का समाधान करेंगी या यह राजनीति को मजबूत करने की रणनीति है?
वहीं जन सुराज का तर्क संभवतः यही होगा कि राजनीति का मतलब केवल चुनाव के समय जनता के बीच जाना नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल में लोगों के साथ खड़ा रहना है।यानी लड़ाई अब केवल ‘किसके पास वोट है’ की नहीं, बल्कि ‘कौन जनता के बीच दिखाई देता है’ की भी बनती जा रही है।
ट्रैफिक पर पीके का दांव, सफलता मिली तो बड़ा राजनीतिक संदेश
प्रशांत किशोर ने पटना की ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर मुख्य सचिव, डीजीपी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की।अगले दो-तीन वर्षों के लिए बेहतर ट्रैफिक प्लान तैयार करने के उद्देश्य से इंटर-डिपार्टमेंटल बैठक और वर्कशॉप आयोजित करने की बात सामने आई है। इसमें विभिन्न सरकारी विभागों के साथ ट्रैफिक और सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले संस्थानों को भी शामिल करने की योजना है।यह मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।
पटना में ट्रैफिक जाम कोई नया मुद्दा नहीं है। सड़क पर बढ़ते वाहन, पार्किंग की समस्या, अतिक्रमण, फुटपाथ की स्थिति और ट्रैफिक नियमों के पालन की चुनौती आम नागरिक की रोजमर्रा की परेशानी है।अगर पीके इस व्यवस्था में दिखाई देने वाला बदलाव कराने में सफल होते हैं तो इसका राजनीतिक लाभ सिर्फ बांकीपुर तक सीमित नहीं रह सकता।
पटना के नागरिकों के बीच यह संदेश जा सकता है कि विधायक सिर्फ विधानसभा में सवाल उठाने वाला प्रतिनिधि नहीं, बल्कि प्रशासन को सक्रिय करने वाला दबाव केंद्र भी हो सकता है।लेकिन यहां पीके की असली परीक्षा शुरू होगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अधिकारियों के साथ बैठक करना अपेक्षाकृत आसान है। असली परीक्षा तब होगी जब फैसले जमीन पर उतरेंगे।
ट्रैफिक प्लान बनेगा, लेकिन क्या जाम कम होगा?
अतिक्रमण की सूची बनेगी, लेकिन क्या प्रभावशाली कब्जे हटेंगे?
अवैध वसूली की शिकायतें सामने आएंगी, लेकिन क्या पुलिस कार्रवाई निष्पक्ष होगी?
नशे के खिलाफ कम्युनिटी पुलिसिंग की योजना बनेगी, लेकिन क्या युवाओं तक उसका असर पहुंचेगा?
इन सवालों के जवाब ही प्रशांत किशोर की राजनीतिक विश्वसनीयता तय करेंगे।
‘सूखा नशा’ पर कम्युनिटी पुलिसिंग—राजनीति से आगे सामाजिक अभियान?
प्रशांत किशोर ने नशे के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी पहल की बात कही है। सिविल सोसायटी संस्थाओं और पटना पुलिस के साथ मिलकर कम्युनिटी पुलिसिंग कार्यक्रम तैयार करने का प्रस्ताव सामने आया है।
शिक्षाविदों और सामाजिक क्षेत्र के जानकारों के लिए यह मुद्दा खासा महत्वपूर्ण है।नशे की समस्या को सिर्फ पुलिस की कार्रवाई से खत्म नहीं किया जा सकता। स्कूल-कॉलेज, परिवार, स्थानीय समुदाय, खेल संस्थाएं और सामाजिक संगठन—सभी को इसमें भूमिका निभानी होगी।
यदि यह पहल केवल बयान और बैठकों तक सीमित न रहकर जमीन पर उतरती है तो यह जन सुराज की राजनीति को एक अलग पहचान दे सकती है।क्योंकि सड़क और ट्रैफिक जैसे मुद्दे प्रशासनिक हैं, लेकिन युवाओं को नशे से बचाना सामाजिक और राजनीतिक दोनों चुनौती है।अतिक्रमण और ‘अनधिकृत कलेक्शन’ पर कार्रवाई—सबसे संवेदनशील मोर्चा
पीके ने उन स्थानों और वेंडर्स की सूची तैयार करने की बात कही है जहां कथित रूप से अनधिकृत कलेक्शन हो रहा है या सड़क पर कब्जे की वजह से रोड सेफ्टी प्रभावित हो रही है।यही मुद्दा सबसे ज्यादा राजनीतिक गर्मी पैदा कर सकता है।अतिक्रमण हटाना कागज पर आसान दिखाई देता है, लेकिन जमीन पर इसके साथ छोटे कारोबारियों की रोजी-रोटी, स्थानीय प्रभावशाली लोगों के हित और प्रशासनिक तंत्र की भूमिका जुड़ी होती है।यहीं प्रशांत किशोर के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती होगी।
क्या वह गरीब और छोटे दुकानदार की आजीविका बचाते हुए सड़क को अतिक्रमण मुक्त करा पाएंगे?
क्या कथित अवैध वसूली पर कार्रवाई बिना राजनीतिक दबाव के होगी?
अगर इन सवालों के सकारात्मक जवाब सामने आते हैं तो पीके के लिए यह उनकी कार्यशैली का सबसे बड़ा प्रमाण होगा।
विपक्ष के पास पीके को घेरने के लिए क्या है?
विपक्ष के पास फिलहाल सबसे बड़ा हथियार यही होगा कि वह ‘घोषणा बनाम परिणाम’ का सवाल उठाए।राजनीति में आलोचना करने वालों के लिए यह कहना आसान होगा कि बैठकें, वर्कशॉप और जनसंपर्क तभी मायने रखते हैं जब जनता को उसका सीधा फायदा मिले।अगर कुछ महीनों बाद भी बांकीपुर की सड़कों पर वही जाम, वही अतिक्रमण और वही समस्याएं दिखाई देती हैं तो विरोधियों को हमला करने का मौका मिलेगा।लेकिन अगर बदलाव दिखाई देने लगा तो यही विपक्ष के लिए मुश्किल भी बन सकता है।
क्योंकि तब पीके यह कह सकेंगे कि बिना बड़े राजनीतिक तंत्र का हिस्सा बने भी स्थानीय प्रशासन को जवाबदेह बनाया जा सकता है।जन सुराज के लिए बांकीपुर सिर्फ सीट नहीं, मॉडल बन सकता है
प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती
बिहार की स्थापित राजनीति के बीच अपनी अलग पहचान कायम करना है।
RJD के पास सामाजिक आधार की अपनी राजनीति है।
BJP के पास मजबूत संगठन और राष्ट्रीय नेतृत्व है।
JDU के पास बिहार की सत्ता और प्रशासनिक अनुभव की लंबी पृष्ठभूमि है।
कांग्रेस का अपना पारंपरिक राजनीतिक आधार है।
ऐसे में जन सुराज के सामने सवाल है—वह आखिर किस आधार पर इन सभी से अलग दिखाई देगा?
बांकीपुर इसका जवाब देने की प्रयोगशाला बन सकता है।यदि यहां जनता के बीच नियमित संपर्क, स्थानीय समस्याओं का समाधान, प्रशासनिक जवाबदेही और जमीनी संगठन का मॉडल सफल हुआ तो जन सुराज इसे बिहार के दूसरे क्षेत्रों में भी राजनीतिक संदेश के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।
राखी का धागा अब भरोसे की परीक्षा बनेगा
बांकीपुर की बहनों ने प्रशांत किशोर की कलाई पर राखी बांधकर अपना स्नेह जताया है। तस्वीर भावुक है, संदेश सामाजिक है और इसके भीतर राजनीति की संभावनाएं भी साफ दिखाई देती हैं।
लेकिन राजनीति में भावनात्मक रिश्ते लंबे समय तक तभी टिकते हैं जब उनके पीछे काम दिखाई दे।राखी की डोर बांकीपुर की बहनों ने बांध दी है। अब उस डोर को भरोसे में बदलने की जिम्मेदारी प्रशांत किशोर की है।
ट्रैफिक, अतिक्रमण, कथित अवैध वसूली और नशे के खिलाफ उनकी पहल अब सिर्फ प्रशासनिक मुद्दे नहीं रह गए हैं। ये उनके राजनीतिक मॉडल की अग्निपरीक्षा बनने जा रहे हैं।
और अगर पीके इस परीक्षा में सफल होते हैं, तो बांकीपुर में बंधी राखी की यह डोर महज एक दिन का भावनात्मक दृश्य नहीं रहेगी—
यह बिहार की राजनीति में एक नए राजनीतिक प्रयोग की पहचान बन सकती है।
