बी के झा
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काठमांडू/लखनऊ, 28 अगस्त
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ का पानी भले ही कई इलाकों में उतरने लगा हो, लेकिन तबाही की भयावह तस्वीर अब सामने आ रही है। नदियों के किनारे, मलबे के ढेर और दूर-दराज के इलाकों से लगातार शव बरामद हो रहे हैं। एक ओर जहां हजारों परिवार अपनों की तलाश में भटक रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन के सामने बरामद शवों को सुरक्षित रखने, उनकी पहचान करने और कानूनी प्रक्रिया पूरी करने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
अब तक सैकड़ों शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि चितवन जिले में ही बरामद शवों की संख्या 130 के पार पहुंच गई है। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिले के स्वास्थ्य संस्थानों में एक साथ अधिकतम करीब 50 शव रखने की क्षमता है। यानी बरामद शवों की संख्या उपलब्ध शवगृह क्षमता से ढाई गुना से भी अधिक हो चुकी है।
यह संकट सिर्फ शवों को रखने तक सीमित नहीं है। प्रत्येक शव की पहचान, उसके स्थान और परिस्थितियों का रिकॉर्ड तैयार करना, तस्वीरें लेना और पहचान से जुड़े साक्ष्यों को सुरक्षित रखना जरूरी है। यही वजह है कि प्रशासन के सामने समय के साथ चुनौती और विकराल होती जा रही है।बाढ़ का पानी उतर रहा, लेकिन मौतों का सिलसिला नहीं
नेपाल में आई अचानक बाढ़ और भारी मलबे के बहाव ने बड़ी संख्या में लोगों को अपनी चपेट में लिया। कई लोग तेज बहाव में बह गए, जबकि कुछ मलबे के नीचे दब गए। बाढ़ की ताकत इतनी भयावह थी कि शव भी घटनास्थल से कई किलोमीटर दूर तक बह गए।यही कारण है कि अब शवों की बरामदगी एक ही स्थान तक सीमित नहीं है। नदी किनारे, जंगलों, पुलों के आसपास और दूर-दराज के इलाकों से भी शव मिलने की खबरें सामने आ रही हैं।
इसने बचाव दल के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है
एक तरफ जिंदा लोगों की तलाश और दूसरी तरफ मृतकों की पहचान।कई शवों की हालत भी ऐसी है कि सामान्य तरीके से उनकी पहचान करना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में हर शव को वैज्ञानिक तरीके से सुरक्षित रखना जरूरी हो गया है।
पहचान से पहले अंतिम संस्कार क्यों नहीं?
आपदा के बाद मृतकों का अंतिम संस्कार जल्द से जल्द कर देने की भावनात्मक और सामाजिक इच्छा स्वाभाविक है। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक बड़े पैमाने पर हुई मौतों के मामलों में जल्दबाजी नुकसानदेह साबित हो सकती है।त्रिभुवन विश्वविद्यालय शिक्षण अस्पताल के वरिष्ठ फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. गोपाल चौधरी के मुताबिक प्राकृतिक आपदा में मिले शवों के प्रबंधन के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक और दिशा-निर्देश मौजूद हैं।
उनका कहना है कि सबसे पहले शव को सुरक्षित रखना जरूरी है। इसके बाद यह दर्ज किया जाना चाहिए कि शव कहां मिला, किस परिस्थिति में मिला और शरीर पर कौन-कौन से पहचान चिह्न मौजूद हैं।यानी किसी शव का अंतिम संस्कार करने से पहले उसकी तस्वीर, पहचान संबंधी विवरण और उपलब्ध साक्ष्यों का रिकॉर्ड तैयार करना बेहद जरूरी है।क्योंकि आज जिस शव की पहचान नहीं हो पा रही, संभव है कि कल किसी परिवार की आखिरी उम्मीद वही शव हो।
सबसे बड़ी समस्या: शव रखने के लिए जगह नहीं
नेपाल की मौजूदा त्रासदी में एक बेहद गंभीर समस्या सामने आई है—पर्याप्त शवगृहों का अभाव।फोरेंसिक विशेषज्ञों के अनुसार नेपाल के ज्यादातर अस्पतालों में एक साथ सैकड़ों शवों को सुरक्षित रखने की क्षमता वाले पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज उपलब्ध नहीं हैं।चितवन इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। यहां स्वास्थ्य संस्थानों की कुल क्षमता करीब 50 शवों की है, जबकि बरामद शवों की संख्या 130 को पार कर चुकी है।
स्थिति इसलिए भी कठिन है क्योंकि कई शव घंटों या दिनों तक मलबे में दबे रहे। ऐसे शवों को सुरक्षित रखना सामान्य शवों की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है।तापमान नियंत्रित व्यवस्था नहीं होने पर शव तेजी से खराब होने लगते हैं। इससे न सिर्फ पहचान मुश्किल होती है, बल्कि संक्रमण और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी बढ़ सकता है।
हर शव अपने पीछे छोड़ रहा है एक परिवार की कहानी
इन आंकड़ों के पीछे सिर्फ संख्या नहीं है। हर बरामद शव किसी परिवार के लिए एक नाम, एक रिश्ता और एक अधूरी कहानी है।किसी परिवार का बेटा लापता है, किसी की बेटी नहीं मिली, किसी की पत्नी या पति की कोई खबर नहीं है। कई परिवार इस उम्मीद में राहत शिविरों और अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं कि शायद उनके अपने जीवित मिल जाएं।लेकिन शवों की बढ़ती संख्या इस त्रासदी का दूसरा और ज्यादा भयावह चेहरा सामने ला रही है।
प्रशासन के सामने अब सिर्फ यह सवाल नहीं है कि कितने लोग मारे गए?
बल्कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण सवाल है कि कौन मारा गया, उसका नाम क्या था और उसके परिवार तक उसकी पहचान की पुष्टि कैसे पहुंचेगी?
नदियां बनीं सबसे बड़ी चुनौतीबाढ़ में बहकर शवों के दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचने की वजह से खोज अभियान भी बेहद कठिन हो गया है। राहत एवं बचाव दलों को नदी के किनारे, मलबे के ढेर और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार तलाश करनी पड़ रही है।ऐसे में आने वाले दिनों में और शव मिलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
प्रशासन के लिए सबसे बड़ी जरूरत अब ऐसे अस्थायी शवगृह और कोल्ड स्टोरेज तैयार करने की है, जहां बरामद शवों को वैज्ञानिक तरीके से सुरक्षित रखा जा सके और उनकी पहचान की प्रक्रिया पूरी की जा सके।-
नेपाल की तबाही का असर यूपी तक-महाराजगंज और कुशीनगर में हाई अलर्ट, गंडक नदी पर बढ़ाई गई निगरानी
नेपाल में आई भीषण बाढ़ का खतरा अब भारत के सीमावर्ती इलाकों तक भी पहुंच गया है। उत्तर प्रदेश के महाराजगंज और कुशीनगर जिलों में प्रशासन को हाई अलर्ट पर रखा गया है।गंडक नदी के जलस्तर पर लगातार नजर रखी जा रही है। वाल्मीकि गंडक बैराज से लाखों क्यूसेक पानी छोड़े जाने के बाद कुशीनगर में नारायणी नदी का जलस्तर बढ़ रहा है। प्रशासन संभावित बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए तैयारियों में जुट गया है। सीमावर्ती इलाकों में निगरानी बढ़ाने के साथ ही राहत एवं बचाव दलों को भी तैयार रखा गया है।
योगी सरकार ने नेपाल भेजी SDRF की टीम
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर उत्तर प्रदेश सरकार ने नेपाल में राहत और बचाव अभियान के लिए 32 सदस्यीय एसडीआरएफ दल और 22 पीएसी कर्मियों को तैनात किया है।इसके अलावा एक अतिरिक्त एसडीआरएफ दल भेजे जाने की तैयारी है। इसके साथ चार रबर नाव और एक एल्युमीनियम नाव भी भेजी जा रही है, ताकि बाढ़ प्रभावित और दुर्गम इलाकों में फंसे लोगों तक पहुंच बनाई जा सके।प्रदेश का राहत आयुक्त नियंत्रण कक्ष सीमावर्ती जिलों की स्थिति पर लगातार नजर रख रहा है।
नेपाल में फंसे उत्तर प्रदेश के नागरिकों के परिजनों के लिए 1070 हेल्पलाइन भी उपलब्ध कराई गई है।
सीमा के दोनों ओर एक जैसी चिंता
नेपाल की त्रासदी अब सिर्फ नेपाल की समस्या नहीं रह गई है। हिमालय से निकलने वाली नदियां भारत के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती हैं। ऐसे में नेपाल में भारी बारिश, भूस्खलन, अचानक बाढ़ या जलाशयों के टूटने का सीधा असर भारत के सीमावर्ती जिलों पर पड़ सकता है।इसलिए आने वाले कुछ दिन नेपाल और उत्तर प्रदेश—दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
नेपाल में जहां प्रशासन शवों की पहचान और सुरक्षित प्रबंधन की चुनौती से जूझ रहा है, वहीं भारत में प्रशासन की नजर नदियों के बढ़ते जलस्तर और संभावित बाढ़ पर टिकी है।यह आपदा सिर्फ पानी की नहीं, व्यवस्था की भी परीक्षा है
नेपाल की बाढ़ ने पहाड़ों की भयावह ताकत सामने ला दी है। अब पानी उतरने के साथ त्रासदी का दूसरा चरण शुरू हो गया है—मलबे में जिंदगी तलाशने का, शवों की पहचान करने का और हजारों परिवारों को उनके अपनों के बारे में जवाब देने का।
एक तरफ नदियां रास्ता बदल रही हैं, दूसरी तरफ प्रशासन को हर बरामद शव के साथ एक नाम, एक पहचान और एक परिवार तक पहुंचना है।
और सीमा के इस पार उत्तर प्रदेश में प्रशासन को इस चिंता से जूझना है कि कहीं नेपाल की तबाही का अगला सैलाब भारतीय मैदानों का रुख न कर ले।
बाढ़ का पानी उतर सकता है, लेकिन इस आपदा का असली हिसाब अभी बाकी है।
