मुजफ्फरपुर में खुली प्रशासनिक निगरानी की पोल ! बोचहां के तत्कालीन सीओ और राजस्व कर्मचारी पर नियमों की अनदेखी का आरोप, डीएम ने मांगा स्पष्टीकरण; जांच में शिकायत सही पाए जाने का दावा

बी के झा

NSK news Ind

मुजफ्फरपुर, 1 सितंबर

बिहार में जमीन से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के सरकारी दावों के बीच मुजफ्फरपुर से सामने आया एक मामला प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। बोचहां अंचल में जिस दाखिल-खारिज वाद को पहले ही अस्वीकृत किया जा चुका था, उसी अभिलेख पर नया वाद बनाकर उसे दोबारा स्वीकृत किए जाने का मामला सामने आया है। मामले में बोचहां के तत्कालीन अंचलाधिकारी राजा कुमार और राजस्व कर्मचारी संजीव कुमार की भूमिका पर सवाल उठे हैं।

आम जनता से साक्षात्कार कार्यक्रम के दौरान दिनकर शाही की ओर से जिलाधिकारी को दिए गए आवेदन में इसकी शिकायत की गई थी। शिकायत के बाद जिलाधिकारी कुमार गौरव ने डीसीएलआर पूर्वी से मामले की जांच कराई। जांच रिपोर्ट में शिकायत को सही पाए जाने के बाद दोनों से स्पष्टीकरण मांगा गया है।

एक ही रिकॉर्ड, पहले खारिज फिर मंजूर

जांच में सामने आया कि संबंधित दाखिल-खारिज वाद पहले अस्वीकृत किया जा चुका था। इसके बावजूद डीसीएलआर पूर्वी के किसी न्यायिक आदेश के बिना उसी मामले से संबंधित तीन दाखिल-खारिज वादों को दोबारा स्वीकृत कर दिया गया।प्रशासनिक नियमों के मुताबिक ऐसी स्थिति में सीधे नए वाद को स्वीकृत करने के बजाय मामला अपीलवाद के दायरे में आता है। यानी पुराने आदेश को दरकिनार कर उसी अभिलेख पर नई प्रक्रिया के जरिए रास्ता निकालना सवालों के घेरे में है।

सबसे अहम बात यह है कि विभागीय पोर्टल पर दाखिल-खारिज के स्वीकृत और अस्वीकृत मामलों की जानकारी उपलब्ध रहती है। ऐसे में संबंधित अधिकारियों और कर्मियों के लिए यह पता लगाना मुश्किल नहीं था कि उक्त वाद पहले ही खारिज किया जा चुका है। जांच रिपोर्ट में इसी बिंदु को गंभीर माना गया है और इसे बिहार भूमि दाखिल-खारिज अधिनियम के प्रावधानों के प्रतिकूल बताया गया है।

डीएम ने एक सप्ताह में मांगा जवाब

जांच रिपोर्ट के आधार पर जिलाधिकारी कुमार गौरव ने तत्कालीन सीओ राजा कुमार और राजस्व कर्मचारी संजीव कुमार से स्पष्टीकरण मांगा है। हालांकि दोनों का तबादला अब दूसरे जिले में हो चुका है।प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यदि एक सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण प्राप्त नहीं होता है तो इसे आरोपों की स्वीकृति मानते हुए दोनों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई के लिए विभाग को रिपोर्ट भेजी जाएगी।

मामला सिर्फ दो अधिकारियों तक सीमित है या व्यवस्था पर भी सवाल?

इस प्रकरण ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—अगर सरकारी पोर्टल पर किसी वाद की पूरी जानकारी उपलब्ध थी, तो फिर पहले से अस्वीकृत मामले को दोबारा स्वीकृत करने की प्रक्रिया आखिर कैसे आगे बढ़ी?

अगर जांच में नियमों की अनदेखी प्रमाणित होती है तो कार्रवाई केवल संबंधित अधिकारी और कर्मचारी तक सीमित रहनी चाहिए या उस पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की भी पड़ताल होनी चाहिए, जिसके तहत एक अस्वीकृत वाद दोबारा स्वीकृति की मेज तक पहुंच गया?

यही वह सवाल है जो इस मामले को महज एक अंचल कार्यालय की कथित लापरवाही से आगे ले जाकर जमीन संबंधी प्रशासनिक व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही के केंद्र में ला देता है।

समाजसेवी ने सरकार पर साधा निशाना

मामले को लेकर एक स्थानीय वरिष्ठ समाजसेवी ने बिहार सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि राज्य में भ्रष्टाचार पर कार्रवाई अक्सर तब दिखाई देती है, जब मामला सार्वजनिक चर्चा या मीडिया की सुर्खियों में पहुंच जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या बड़े स्तर पर जिम्मेदारी तय करने के बजाय हर बार स्थानीय स्तर के अधिकारियों को ही कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि यदि कहीं अनियमितता होती है तो सिर्फ कार्रवाई की घोषणा पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी सामने आना चाहिए कि व्यवस्था में चूक कहां हुई, जिम्मेदारी किसकी थी और आम लोगों को इसका खामियाजा क्यों भुगतना पड़ा।हालांकि ये समाजसेवी के आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं की गई है।

तेजस्वी ने भी सरकार को घेरा

दूसरी ओर आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने भी बिहार सरकार पर भ्रष्टाचार और अपराध को लेकर हमला बोला है। उन्होंने सरकार पर भ्रष्टाचार, अपराध, शराब माफिया और भू-अर्जन से जुड़े मामलों में कथित अनियमितताओं को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।

उनका कहना है कि सरकार संरक्षित ठेकेदारों के प्रभाव के कारण आम किसानों की जमीन और हित प्रभावित हो रहे हैं।तेजस्वी के इन राजनीतिक आरोपों पर सरकार या संबंधित विभाग की प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है।

जब उनसे जनसुराज के संस्थापक और बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र से नवनिर्वाचित विधायक प्रशांत किशोर को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने उन्हें बीजेपी की नीतियों के लिए काम करने वाला व्यक्ति बताया।

हालांकि यह भी उनका राजनीतिक आरोप है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।

अब असली परीक्षा कार्रवाई की

मुजफ्फरपुर का यह मामला फिलहाल स्पष्टीकरण के स्तर पर है। प्रशासनिक जांच में अनियमितता पाए जाने के बाद अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित अधिकारियों के जवाब के बाद सरकार क्या कार्रवाई करती है।क्योंकि सवाल सिर्फ एक दाखिल-खारिज वाद का नहीं है। सवाल यह है कि जब सरकारी रिकॉर्ड में सब कुछ दर्ज था, तब नियमों के विपरीत प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ी?

अगर गलती हुई तो जिम्मेदार कौन है?

और अगर जानबूझकर नियमों को दरकिनार किया गया, तो क्या कार्रवाई केवल दो अधिकारियों तक सीमित रहेगी या पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी भी तय होगी?

बिहार में जमीन आम आदमी के लिए सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि जीवनभर की कमाई और भविष्य की सुरक्षा है।

ऐसे मामलों में प्रशासन की विश्वसनीयता इसी बात से तय होगी कि कार्रवाई कितनी तेज होती है और जवाबदेही कितनी ऊपर तक जाती है।

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