बी के झा
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मॉस्को/तेहरान/वॉशिंगटन, 2 सितंबर
अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव के बीच एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है, जिसने वैश्विक रणनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। दावा है कि रूस पर्दे के पीछे से ईरान की मिसाइल क्षमता को नई धार देने में जुटा है। फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रूस पिछले कई वर्षों से ईरान को सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल विकसित करने के लिए बेहद संवेदनशील सैन्य तकनीक और विशेषज्ञता उपलब्ध करा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस कथित गुप्त कार्यक्रम का कोडनेम C430L है और इसकी शुरुआत वर्ष 2023 में हुई थी। इसमें रूस के अनुभवी मिसाइल विशेषज्ञों के शामिल होने का दावा किया गया है। अगर ये दावे सही साबित होते हैं, तो यह घटनाक्रम सिर्फ ईरान की सैन्य क्षमता में बढ़ोतरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि फारस की खाड़ी से लेकर मध्य पूर्व और हिंद महासागर तक अमेरिका की सैन्य रणनीति के लिए नई चुनौती पैदा कर सकता है।
आखिर रूस ईरान को क्या दे रहा है?
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण दावा रैमजेट इंजन तकनीक से जुड़ा है। रैमजेट एक ऐसा एयर-ब्रीदिंग इंजन है, जिसका इस्तेमाल तेज गति से उड़ने वाली मिसाइलों में किया जा सकता है। इस तकनीक के जरिए सुपरसोनिक गति हासिल करने वाली क्रूज मिसाइलों को विकसित किया जा सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, रूस की कथित मदद का उद्देश्य ईरान को ऐसी तकनीक विकसित करने में सक्षम बनाना है, जिसका इस्तेमाल भविष्य में एंटी-शिप यानी जहाज रोधी और जमीन पर हमला करने वाली क्रूज मिसाइलों में किया जा सके।यही वह बिंदु है, जिसने अमेरिका की चिंता बढ़ा दी है।
कम ऊंचाई, ज्यादा रफ्तार… यही है असली खतरा
सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों की सबसे बड़ी ताकत उनकी रफ्तार और उड़ान प्रोफाइल है। ऐसी मिसाइलें तेज गति के साथ अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर उड़ सकती हैं। नतीजा यह होता है कि दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को उन्हें पहचानने, ट्रैक करने और रोकने के लिए अपेक्षाकृत कम समय मिलता है।
यानी अगर ईरान भविष्य में ऐसी मिसाइलों को बड़ी संख्या में तैनात करने में सफल रहता है, तो खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और नौसैनिक संसाधनों के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो सकती है। खासकर एंटी-शिप भूमिका में ऐसी मिसाइलें अमेरिकी नौसेना के युद्धपोतों के लिए चिंता का विषय बन सकती हैं।
लीक हुई बातचीत और पेटेंट ने बढ़ाया संदेह
फाइनेंशियल टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए कथित तौर पर लीक हुई रूसी बातचीत, यात्रा रिकॉर्ड और सैन्य पेटेंट से जुड़ी जानकारी का विश्लेषण किया है।रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान के हालिया संघर्ष के दौरान भी यह कथित कार्यक्रम जारी रहा।
लीक हुई बातचीत से यह संकेत मिलने का दावा किया गया है कि कार्यक्रम को लेकर गतिविधियां इस गर्मी तक जारी थीं।हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि रिपोर्ट में सामने आए दावों के बावजूद अब तक ऐसा निर्णायक सबूत सामने नहीं आया है कि रूस की मदद से विकसित कोई सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ईरान ने वास्तविक युद्धक तैनाती में शामिल कर ली है।
‘दशकों से ऐसी तकनीक चाहता था ईरान’
ईरानी मिसाइल कार्यक्रम के विशेषज्ञ और Conflict Armament Research के वरिष्ठ विश्लेषक फैबियन हिंज ने फाइनेंशियल टाइम्स से बातचीत में इस कथित तकनीकी हस्तांतरण को बेहद महत्वपूर्ण बताया।उनके मुताबिक, यह रूस की ओर से ईरान को दी जा रही अत्यंत रणनीतिक और संवेदनशील सैन्य तकनीक हो सकती है, जिसे ईरान लंबे समय से हासिल करना चाहता रहा है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इतने संवेदनशील सैन्य कार्यक्रम के लिए रूस में उच्च राजनीतिक स्तर की मंजूरी आवश्यक हो सकती है।अगर यह आकलन सही है, तो मामला सिर्फ तकनीकी सहयोग का नहीं बल्कि रूस-ईरान के बढ़ते सामरिक गठजोड़ का भी संकेत माना जा सकता है।
ईरान ने रैमजेट तकनीक में कितनी प्रगति की?
रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान रैमजेट प्रोपल्शन सिस्टम पर काम कर चुका है और उसके उड़ान परीक्षण की दिशा में भी आगे बढ़ा है।लेकिन किसी इंजन का परीक्षण कर लेना और उससे लैस विश्वसनीय, बड़े पैमाने पर तैनात की जा सकने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल तैयार कर लेना—दो अलग-अलग चरण हैं।
मिसाइल की डिजाइन, इंजन, मार्गदर्शन प्रणाली, लक्ष्य पहचान, नियंत्रण, परीक्षण और बड़े पैमाने पर उत्पादन जैसे कई स्तरों पर सफलता जरूरी होती है।इसलिए फिलहाल यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि ईरान के पास ऐसी मिसाइलों की तैयार और व्यापक तैनाती वाली क्षमता मौजूद है।
पूर्व CIA विश्लेषक ने बताया अमेरिकी नौसेना के लिए खतरा
पूर्व CIA सैन्य विश्लेषक और James Martin Center for Nonproliferation Studies से जुड़े जिम लैम्सन के मुताबिक, यदि ईरान ऐसी क्षमता हासिल करता है, तो यह उसके लिए एक नई रणनीतिक हथियार क्षमता होगी और इससे अमेरिकी नौसेना के जहाजों के सामने खतरा पैदा हो सकता है।यही वजह है कि इस कथित कार्यक्रम को लेकर पश्चिमी सुरक्षा प्रतिष्ठान की चिंता केवल ईरान तक सीमित नहीं है।
सवाल यह है कि अगर तेहरान को रूसी विशेषज्ञता और तकनीक मिलती रही और वह उसे अपने मौजूदा मिसाइल कार्यक्रम के साथ जोड़ने में सफल रहा, तो मध्य पूर्व का सैन्य संतुलन किस दिशा में जाएगा?
रूस-ईरान की दोस्ती अब मिसाइलों तक पहुंची?
रूस और ईरान के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में तेजी से गहरे हुए हैं। यूक्रेन युद्ध के दौरान ईरान द्वारा रूस को शाहेद ड्रोन उपलब्ध कराने के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं। रूस ने यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में इन ड्रोन का व्यापक इस्तेमाल किया है।
ईरान पर रूस में इन ड्रोन के उत्पादन की व्यवस्था स्थापित करने में सहयोग देने का भी आरोप लगा है।अब अगर रूस और ईरान के बीच सुपरसोनिक मिसाइल तकनीक को लेकर सहयोग के दावे सही साबित होते हैं, तो यह दोनों देशों के रिश्तों का एक और संवेदनशील सैन्य आयाम सामने ला सकता है।
यानी एक तरफ रूस को ईरान से ड्रोन और अन्य सैन्य सहयोग मिलता है, तो दूसरी तरफ ईरान को रूस से उन्नत सैन्य तकनीक और विशेषज्ञता मिलने की संभावना—यह रिश्ता आपसी रणनीतिक लेन-देन के नए मॉडल की ओर इशारा करता है।
अमेरिका के लिए क्यों बढ़ सकती है मुश्किल?
अमेरिका की मध्य पूर्व में बड़ी सैन्य मौजूदगी है। फारस की खाड़ी और आसपास के समुद्री क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक संसाधन तथा सहयोगी देशों की सैन्य सुविधाएं मौजूद हैं।ईरान पहले से ही क्षेत्र में अपनी मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं के कारण अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए चुनौती बना हुआ है।
ऐसे में यदि उसे सुपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल जैसी अतिरिक्त क्षमता हासिल हो जाती है, तो समुद्री सुरक्षा समीकरण और जटिल हो सकता है।
तेज रफ्तार और कम ऊंचाई पर उड़ान भरने वाली मिसाइलें एयर डिफेंस सिस्टम की प्रतिक्रिया के लिए उपलब्ध समय को कम कर सकती हैं। यही कारण है कि अमेरिकी नौसैनिक रणनीतिकारों के लिए ऐसी क्षमता का संभावित विकास गंभीर विषय बन सकता है।
क्या बदल सकता है मध्य पूर्व का सैन्य समीकरण?
ईरान लंबे समय से अपनी मिसाइल शक्ति को अपनी सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा मानता रहा है। उसके पास पहले से बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन की विभिन्न क्षमताएं मौजूद हैं।अगर इसके ऊपर विश्वसनीय सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल क्षमता भी जुड़ती है, तो ईरान के पास अलग-अलग प्रकार के हमले के विकल्प बढ़ सकते हैं।
विशेषज्ञों के लिए असली सवाल केवल मिसाइल की गति नहीं बल्कि उसकी सटीकता, मारक क्षमता, तैनाती की संख्या और एयर डिफेंस को भेदने की क्षमता होगी।
अभी सबसे बड़ा सवाल—मिसाइल बनी या सिर्फ कार्यक्रम चल रहा है?
यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।रूस द्वारा ईरान को संवेदनशील तकनीक उपलब्ध कराने के दावे गंभीर हैं, लेकिन उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना अभी संभव नहीं है कि ईरान ने रूस की मदद से विकसित किसी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को युद्धक स्तर पर तैनात कर दिया है।
फिलहाल तस्वीर इतनी है कि एक कथित तकनीकी सहयोग कार्यक्रम चल रहा है, ईरान रैमजेट तकनीक पर काम कर रहा है और रूस के विशेषज्ञों की संभावित भूमिका को लेकर रिपोर्ट सामने आई है।
लेकिन यदि आने वाले समय में यह तकनीकी सहयोग वास्तविक तैनाती वाली मिसाइल क्षमता में बदल जाता है, तो इसका असर केवल ईरान-अमेरिका संघर्ष तक सीमित नहीं रहेगा।
निष्कर्ष
मध्य पूर्व पहले ही मिसाइल, ड्रोन, एयर डिफेंस और समुद्री शक्ति की होड़ का अखाड़ा बन चुका है। ऐसे समय में रूस पर ईरान को सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की तकनीक में मदद करने के आरोप ने इस संघर्ष की एक नई परत खोल दी है।
ईरान के हाथ अगर रूसी तकनीक से लैस विश्वसनीय सुपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल आती है, तो खाड़ी के समुद्री रास्तों से लेकर अमेरिकी युद्धपोतों की सुरक्षा तक कई मोर्चों पर रणनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
फिलहाल यह एक कथित गुप्त कार्यक्रम है, कोई घोषित तैनाती नहीं। लेकिन आधुनिक युद्ध में कई बार मिसाइल के लॉन्च होने से पहले ही उसकी संभावित क्षमता दुश्मन की रणनीति बदलने के लिए काफी होती है।
यही वजह है कि रूस-ईरान के इस कथित मिसाइल सहयोग पर अमेरिका और उसके सहयोगियों की नजरें टिक गई हैं।
