सादगी, स्थापत्य और पर्यावरण से समझौता नहीं; DUAC की कड़ी शर्तें—स्मारक के बहाने फिर सामने आई 2013 की नीति, सम्मान बनाम सियासत की पुरानी बहस

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 5 सितंबर

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की स्मृति को दिल्ली के राष्ट्रीय स्मृति स्थल में स्थायी स्थान मिलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ गया है। दिल्ली अर्बन आर्ट्स कमीशन (DUAC) ने उनकी प्रस्तावित समाधि के वास्तु और लैंडस्केप डिजाइन को मंजूरी दे दी है। हालांकि यह मंजूरी पूरी तरह खुली छूट नहीं है। आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि स्मारक की बनावट, रंग, सामग्री, फर्श, बाहरी स्वरूप और आसपास का लैंडस्केप राष्ट्रीय स्मृति स्थल में पहले से मौजूद समाधियों के स्थापत्य चरित्र से सामंजस्य में होना चाहिए।

25 अगस्त 2026 को हुई DUAC की बैठक में केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) की ओर से प्रस्तुत प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा हुई। आयोग ने आर्किटेक्ट से स्पष्टीकरण लेने के बाद कई शर्तें दर्ज कीं। यानी डॉ. मनमोहन सिंह का स्मारक बनेगा जरूर, लेकिन ऐसा नहीं होगा कि राष्ट्रीय स्मृति स्थल के स्थापित स्वरूप से अलग कोई भव्य या चौंकाने वाला स्थापत्य खड़ा कर दिया जाए।

मनमोहन सिंह का स्मारक—सिर्फ पत्थर और संगमरमर की इमारत नहीं

DUAC ने साफ कहा है कि राष्ट्रीय स्मृति स्थल की पहचान सादगी, संयमित स्मारक स्थापत्य और खुले हरित क्षेत्र से बनी है। इसलिए नए स्मारक को अपनी अलग पहचान के साथ-साथ आसपास की समाधियों से दृश्य और वास्तु-सामंजस्य भी बनाए रखना होगा।आयोग ने सफेद मार्बल अथवा सफेद ग्रेनाइट के विकल्प पर विचार करने और इनकी रंग-संगति को मौजूदा समाधियों के साथ परखने को कहा है। स्मारक की बाहरी दीवारों, फर्श, रास्तों, रेलिंग, साइनेज और पट्टिका तक के डिजाइन में एकरूपता बनाए रखने का निर्देश दिया गया है।यहां तक कि प्रस्तावित स्थल पर मौजूद पेड़ को भी काटने के बजाय डिजाइन का हिस्सा बनाने और उसकी जड़ों तथा भविष्य की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव न डालने की शर्त रखी गई है।

अर्थात संदेश स्पष्ट है—मनमोहन सिंह के नाम पर स्मारक बनेगा, लेकिन स्मारक की भव्यता उनकी सादगी पर हावी नहीं होनी चाहिए।

जूते उतारने से लेकर बैठने की जगह तक—DUAC की बारीकी

स्मारक परिसर में आने वाले लोगों के लिए जूते उतारने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है। DUAC ने स्मारक तक जाने वाले रास्ते के दोनों ओर बैठने के लिए बेंच और जूतों को बारिश से बचाने की व्यवस्था का भी निर्देश दिया है।आयोग ने विस्तृत लैंडस्केप प्लान, पेड़-पौधों की प्रजातियां, फर्श, रास्तों के स्तर और प्रस्तावित संरचनाओं का समन्वित खाका भी मांगा है। सभी वास्तु और लैंडस्केप ड्रॉइंग तथा 3D प्रस्तुतियों में सामग्री, रंग, स्तर और लैंडस्केप का परस्पर तालमेल होना अनिवार्य किया गया है।

सियासत का वह अध्याय, जो स्मारक के साथ फिर खुल गया

डॉ. मनमोहन सिंह के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार और स्मारक को लेकर राजनीतिक विवाद देश ने देखा था। कांग्रेस ने मांग की थी कि पूर्व प्रधानमंत्री का अंतिम संस्कार ऐसी जगह हो जहां आगे उनकी समाधि बनाई जा सके। तत्कालीन विवाद में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर उपयुक्त स्थान की मांग की थी। सरकार ने बाद में स्मारक के लिए जगह आवंटित करने की बात कही थी।दिलचस्प तथ्य यह है कि 2013 में स्वयं मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने अलग-अलग नेताओं के लिए अलग स्मारक बनाने की परंपरा को सीमित करते हुए राजघाट के निकट राष्ट्रीय स्मृति स्थल को साझा स्मारक परिसर के रूप में विकसित करने का फैसला किया था।यही वह बिंदु है जहां राजनीति का सवाल खड़ा होता है।

जिस नीति ने अलग-अलग स्मारकों की राजनीति को सीमित करने की कोशिश की थी, उसी नीति के तहत आज मनमोहन सिंह स्वयं राष्ट्रीय स्मृति स्थल का हिस्सा बनने जा रहे हैं। यह इतिहास का एक दिलचस्प राजनीतिक व्यंग्य भी है और लोकतांत्रिक व्यवस्था की निरंतरता का उदाहरण भी।

2013 का फैसला आज क्यों महत्वपूर्ण है?

राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर देखा जाए तो भारत में स्मारक केवल पत्थर की संरचनाएं नहीं रहे हैं। वे सत्ता, इतिहास और सार्वजनिक स्मृति के प्रतीक भी रहे हैं।किस नेता को दिल्ली में जगह मिली, किसे नहीं मिली और किसके नाम पर कितना बड़ा स्मारक बना—इन सवालों ने कई बार राजनीतिक बहस को जन्म दिया है। राष्ट्रीय स्मृति स्थल इसी राजनीति को कुछ हद तक संस्थागत और साझा स्वरूप देने की कोशिश के रूप में सामने आया था।

डॉ. मनमोहन सिंह का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे न केवल दो बार प्रधानमंत्री रहे, बल्कि 1991 के आर्थिक उदारीकरण के दौर से लेकर प्रधानमंत्री पद तक भारतीय आर्थिक नीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में रहे। उनके समर्थक उन्हें आर्थिक सुधारों और अपेक्षाकृत संयमित राजनीतिक शैली के लिए याद करते हैं, जबकि आलोचक उनकी सरकार के दौरान सामने आए कई राजनीतिक और प्रशासनिक विवादों को उनकी विरासत का हिस्सा मानते हैं।इसलिए प्रस्तावित स्मारक पर बहस केवल “कहां बनेगा” तक सीमित नहीं रहेगी।

असली सवाल यह भी होगा कि इतिहास मनमोहन सिंह को किस रूप में याद करता है।

कांग्रेस के लिए सम्मान का सवाल, भाजपा के लिए नीति की निरंतरता

कांग्रेस के लिए मनमोहन सिंह की स्मृति आर्थिक सुधार, सामाजिक समावेशन और गठबंधन राजनीति के एक विशिष्ट दौर से जुड़ी है। उनके निधन के बाद पार्टी ने जिस दृढ़ता से उनके लिए उपयुक्त स्मारक की मांग उठाई, वह इसी राजनीतिक विरासत को सार्वजनिक स्मृति में स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखी गई।वहीं, केंद्र की ओर से स्मारक के लिए स्थान उपलब्ध कराने का निर्णय यह संकेत देता है कि सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री के पद और उनकी राष्ट्रीय भूमिका के सम्मान को राजनीतिक मतभेदों से अलग रखने की नीति अपनाई।

2025 में सिंह परिवार ने राष्ट्रीय स्मृति स्थल में लगभग 900 वर्ग मीटर के भूखंड को स्वीकार किया था। उस समय उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यह स्थल परिसर में स्थित समाधियों के बीच था।

विपक्ष के पुराने सवाल भी दर्ज हैं इतिहास में

स्मारक विवाद के दौरान कांग्रेस नेताओं ने केंद्र पर पूर्व प्रधानमंत्री के सम्मान के साथ पर्याप्त संवेदनशीलता नहीं बरतने का आरोप लगाया था। दूसरी ओर भाजपा ने कांग्रेस पर इस पूरे विषय को राजनीतिक मुद्दा बनाने का पलटवार किया था। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि सरकार पहले ही स्मारक के लिए स्थान तलाश रही थी।शिरोमणि अकाली दल की ओर से भी उस समय मनमोहन सिंह के कद के अनुरूप स्मारक की मांग का समर्थन किया गया था और सरकार से उपयुक्त स्थान देने की अपील की गई थी।

यानी राजनीतिक मतभेदों के बावजूद एक बात पर व्यापक सहमति दिखाई दी थी—पूर्व प्रधानमंत्री की राष्ट्रीय भूमिका को सम्मानजनक स्मृति स्थल मिलना चाहिए।

कानूनी नजरिए से मामला क्या कहता है?

कानूनी और प्रशासनिक दृष्टि से DUAC की मंजूरी को अंतिम राजनीतिक स्वीकृति समझना उचित नहीं होगा। आयोग ने स्वयं स्पष्ट किया है कि उसकी अनुमति मुख्यतः वास्तु, शहरी डिजाइन और सौंदर्य संबंधी पहलुओं तक सीमित है। परियोजना को भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) की शर्तों और अन्य लागू कानूनी आवश्यकताओं का पालन करना होगा।इसका अर्थ है कि आगे की प्रक्रिया में संबंधित विभागों की मंजूरियां और तकनीकी अनुपालन भी महत्वपूर्ण होंगे।

कानूनविदों के नजरिए से इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि किसी पूर्व प्रधानमंत्री के स्मारक को लेकर भावनात्मक और राजनीतिक अपेक्षाएं अपनी जगह हैं, लेकिन सरकारी भूमि पर सार्वजनिक स्मारक का निर्माण नीति, भूमि आवंटन, पर्यावरणीय मानकों और शहरी नियोजन के नियमों के भीतर ही होना चाहिए।

शिक्षाविदों के लिए असली सवाल—स्मारक किसे याद कराएगा?

शिक्षा और इतिहास के नजरिए से किसी राष्ट्रीय नेता का स्मारक केवल श्रद्धांजलि नहीं होता। वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक दृश्य इतिहास भी बन जाता है।डॉ. मनमोहन सिंह के मामले में यह और महत्वपूर्ण है। एक ओर वे अर्थशास्त्री, पूर्व वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री रहे; दूसरी ओर उनकी पहचान एक ऐसे राजनेता की रही जिसने सार्वजनिक जीवन में अपेक्षाकृत कम आक्रामक शैली अपनाई।इसलिए उनका स्मारक यदि सादगी, खुले हरित परिवेश और संयमित स्थापत्य में बनता है तो वह उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व की एक प्रतीकात्मक व्याख्या भी बन सकता है।

राजनीतिक विश्लेषण: स्मारक की मंजूरी से ज्यादा महत्वपूर्ण है स्मृति की राजनीति

भारतीय राजनीति में स्मारक अक्सर अतीत पर अधिकार जताने का माध्यम बनते रहे हैं। सत्ता बदलती है तो इतिहास की व्याख्या भी बदलती दिखाई देती है।लेकिन मनमोहन सिंह का स्मारक इस मायने में अलग अध्याय बन सकता है। कांग्रेस उन्हें अपनी आर्थिक और राजनीतिक विरासत के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में प्रस्तुत करेगी।

भाजपा सरकार द्वारा उनके लिए स्मारक की अनुमति को सत्ता पक्ष उनके राष्ट्रीय योगदान के सम्मान के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।यहीं से राजनीतिक विमर्श का अगला प्रश्न जन्म लेता है—क्या भारत अब नेताओं की स्मृति को दलगत सीमाओं से बाहर निकालकर राष्ट्रीय विरासत के रूप में देखने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, या स्मारक भी आने वाले चुनावों में राजनीतिक प्रतीक बनते रहेंगे?

इस सवाल का जवाब आने वाला समय देगा।

मनमोहन सिंह की विरासत: स्मारक से बड़ी या स्मारक तक सीमित?

राष्ट्रीय स्मृति स्थल में जगह मिलना निश्चित रूप से किसी पूर्व प्रधानमंत्री के लिए औपचारिक सम्मान है। लेकिन मनमोहन सिंह की वास्तविक विरासत किसी पत्थर, संगमरमर या ग्रेनाइट में सीमित नहीं है।1991 के आर्थिक सुधारों से लेकर प्रधानमंत्री के रूप में दस वर्षों तक उनका सफर भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था के एक महत्वपूर्ण संक्रमण काल से जुड़ा रहा।

उनके समर्थक उनकी आर्थिक दृष्टि, प्रशासनिक अनुभव और व्यक्तिगत सादगी को याद करते हैं; आलोचक उनके शासनकाल की राजनीतिक कमजोरियों और विवादों को।इसलिए उनकी समाधि पर अंतिम प्रश्न शायद यही लिखा जाना चाहिए—इतिहास मनमोहन सिंह को उनकी समाधि से याद करेगा या उन आर्थिक और राजनीतिक फैसलों से, जिन्होंने आधुनिक भारत की दिशा को प्रभावित किया?

DUAC ने अब स्मारक की इमारत का रास्ता साफ कर दिया है।लेकिन मनमोहन सिंह की ऐतिहासिक विरासत पर बहस अभी खत्म नहीं हुई है—शायद असली बहस अब शुरू होगी।

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