‘इतनी फोर्स मंगाऊंगा कि ठंडा कर दूंगा…’, गोरखपुर विश्वविद्यालय में दरोगा के तेवर का वीडियो वायरल; छात्र आंदोलन से पुलिसिया भाषा तक, पूरे विवाद का विश्लेषण

बी के झा

NSK विशेष रिपोर्ट

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गोरखपुर , 9 सितंबर

NSK विशेष रिपोर्ट

गोरखपुर विश्वविद्यालय में छात्रों के आंदोलन और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच चल रहा विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। मंगलवार को छात्रों और विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रॉक्टर के बीच हुए हंगामे के बाद पुलिस चौकी प्रभारी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

वीडियो में चौकी प्रभारी अविरल मिश्रा छात्रों को सख्त लहजे में चेतावनी देते नजर आ रहे हैं।वीडियो में पुलिस अधिकारी कहते सुनाई दे रहे हैं कि यह शांतिपूर्ण आंदोलन नहीं है और छात्रों द्वारा कॉलर पकड़ने तक की स्थिति पैदा हो रही है।

इसी दौरान वह कहते हैं—”इतनी फोर्स मंगाऊंगा कि ठंडा कर दूंगा… गोरखपुर पुलिस है ये।

”वीडियो सामने आने के बाद मामला केवल विश्वविद्यालय परिसर में हुए हंगामे तक सीमित नहीं रह गया है। अब बहस इस बात पर भी हो रही है कि लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन कर रहे छात्रों से पुलिस को किस भाषा और किस तरीके से संवाद करना चाहिए।

पुलिस ने बताया—छात्र उग्र हुए, प्रॉक्टर से धक्का-मुक्की का प्रयास

वीडियो वायरल होने के बाद गोरखपुर पुलिस ने अपना पक्ष रखा है। पुलिस के मुताबिक, 8 सितंबर को विश्वविद्यालय परिसर में धरने पर बैठे निष्कासित छात्रों से प्रॉक्टर और अन्य अधिकारियों की बातचीत चल रही थी।पुलिस का दावा है कि बातचीत के दौरान कुछ छात्र उग्र हो गए और प्रॉक्टर के साथ अभद्रता, धक्का-मुक्की तथा मारपीट का प्रयास करने लगे।

मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने हस्तक्षेप करते हुए प्रॉक्टर को सुरक्षित बाहर निकाला और स्थिति को नियंत्रित किया।पुलिस ने यह भी कहा है कि पूरे मामले में जांच की जा रही है और आवश्यक विधिक कार्रवाई की जाएगी।

यानी पुलिस के सामने एक तरफ कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती थी, तो दूसरी तरफ छात्रों का आंदोलन। लेकिन वायरल वीडियो ने अब एक अलग सवाल खड़ा कर दिया है—कानून-व्यवस्था कायम रखने और बल प्रयोग की चेतावनी देने के बीच पुलिस की भाषा की सीमा क्या होनी चाहिए?

आखिर विवाद की शुरुआत कहां से हुई?

मंगलवार दोपहर करीब ढाई बजे विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन के नीचे भूख हड़ताल पर बैठे छात्र नेताओं सतीश प्रजापति और उज्जवल सिंह से असिस्टेंट प्रॉक्टर वेद प्रकाश राय बातचीत करने पहुंचे।बताया जा रहा है कि बातचीत छात्रों की मांगों को लेकर हो रही थी। बातचीत आगे बढ़ी तो दोनों पक्षों के बीच बहस होने लगी। देखते ही देखते स्थिति धक्का-मुक्की तक पहुंच गई।

मौके पर मौजूद लोगों के मुताबिक, इस दौरान कुछ छात्र नेता नीचे गिर गए। इसी बीच छात्रों के बीच घिरे असिस्टेंट प्रॉक्टर को विश्वविद्यालय के गार्ड वहां से निकालकर उनके कार्यालय तक ले गए।

हंगामे के बाद छात्र नेताओं ने अपना आंदोलन जारी रखा।

25 अगस्त से आंदोलन, 5 सितंबर से भूख हड़ताल

छात्र नेताओं का आंदोलन 25 अगस्त से प्रशासनिक भवन के सामने चल रहा है।

शुरुआत धरने से हुई थी।

मांगों पर कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाते हुए 5 सितंबर से आंदोलन को भूख हड़ताल में बदल दिया गया।

छात्र नेता सतीश प्रजापति लगातार भूख हड़ताल पर हैं।

आंदोलनकारियों का कहना है कि जब तक विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लेता, आंदोलन जारी रहेगा।छात्र नेताओं को नए कुलपति से समाधान की उम्मीद भी है।

छात्रों की मांगें क्या हैं?

आंदोलनकारियों की मांगों का दायरा केवल एक मुद्दे तक सीमित नहीं है।

उनकी प्रमुख मांगों में—- विश्वविद्यालय से निष्कासित छात्रों की बहाली

छात्रसंघ चुनाव कराना

हॉस्टल की मेस और मूलभूत सुविधाओं में सुधार

पीएम-उषा योजना के कार्यों में पारदर्शिता

परीक्षा एजेंसी की कार्यप्रणाली की जांच

डिग्री और अंकपत्र के नाम पर कथित वसूली की जांच

अनियमितता मिलने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई शामिल हैं।

छात्र नेताओं का आरोप है कि अपनी समस्याएं उठाने वाले छात्रों के खिलाफ निष्कासन की कार्रवाई की गई। वहीं छात्रसंघ चुनाव को लेकर उनका तर्क है कि लंबे समय से चुनाव नहीं हुए हैं, जबकि छात्रों से छात्रसंघ शुल्क लिया जाता है।इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं हुई है। इसलिए इन मामलों में विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष और किसी आधिकारिक जांच का निष्कर्ष बेहद महत्वपूर्ण होगा।

अब असली सवाल—आंदोलन बनाम अनुशासन

गोरखपुर विश्वविद्यालय का यह प्रकरण भारतीय विश्वविद्यालय परिसरों में छात्र राजनीति और प्रशासन के बीच लगातार उभरने वाले तनाव की याद दिलाता है।एक लोकतांत्रिक परिसर में छात्रों को अपनी मांगें रखने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार है।

दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रशासन और पुलिस की जिम्मेदारी है कि परिसर में हिंसा, जबरदस्ती, तोड़फोड़ या किसी अधिकारी के साथ मारपीट जैसी स्थिति पैदा न हो।यहीं से इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल निकलता है—

अगर छात्र आंदोलन उग्र होता है तो प्रशासन को कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन क्या कार्रवाई की चेतावनी देते समय पुलिस की भाषा भी उतनी ही संयमित नहीं होनी चाहिए?

राजनीतिक विश्लेषकों के नजरिए से देखें तो विश्वविद्यालयों में छात्र असंतोष को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानना लंबे समय में समाधान नहीं देता। दूसरी ओर, आंदोलन के नाम पर किसी अधिकारी के साथ कथित धक्का-मुक्की या हिंसा को भी लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

अर्थात दोनों पक्षों के लिए एक ही कसौटी होनी चाहिए—अधिकार भी, जिम्मेदारी भी।

कानूनविदों के लिए भी अहम प्रश्न

कानूनी दृष्टि से किसी भी आंदोलन में दो अलग-अलग प्रश्न होते हैं—पहला, क्या आंदोलन का अधिकार है?

और दूसरा, क्या आंदोलन के दौरान कानून का उल्लंघन हुआ?

यदि किसी अधिकारी के साथ वास्तव में मारपीट या धक्का-मुक्की हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि पुलिस अधिकारी द्वारा छात्रों को धमकाने या अनुचित भाषा इस्तेमाल करने का आरोप है तो उसकी भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।किसी एक पक्ष की शिकायत के आधार पर दूसरे पक्ष को पूरी तरह दोषी मान लेना न्यायसंगत नहीं होगा।

शिक्षाविदों के सामने बड़ी चुनौती

शिक्षाविदों के नजरिए से यह विवाद विश्वविद्यालय प्रशासन की संवाद क्षमता का भी परीक्षण है।विश्वविद्यालय केवल कक्षाओं, परीक्षाओं और डिग्री देने की संस्था नहीं होता। यह वह स्थान भी है जहां विद्यार्थी असहमति व्यक्त करना, सवाल पूछना और संस्थागत व्यवस्था से जवाब मांगना सीखते हैं।ऐसे में प्रशासन और छात्रों के बीच नियमित संवाद की व्यवस्था तनाव को टकराव में बदलने से रोक सकती है।

यदि छात्रों की मांगों में तथ्य हैं तो उन्हें जांच और संस्थागत प्रक्रिया से संबोधित किया जाना चाहिए। यदि मांगें नियमों के विरुद्ध हैं तो प्रशासन को कारण सहित स्पष्ट जवाब देना चाहिए।

सामाजिक संगठनों की संभावित चिंता—पारदर्शिता और संवाद

सामाजिक संगठनों के नजरिए से भी ऐसे मामलों में तीन चीजें सबसे महत्वपूर्ण होती हैं—पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और संवाद।

निष्कासित छात्रों का मामला हो,

छात्रसंघ चुनाव का प्रश्न हो,

पीएम-उषा योजना के तहत काम हो या डिग्री-अंकपत्र से जुड़े कथित वसूली के आरोप—हर मामले में यदि दस्तावेज और रिकॉर्ड सार्वजनिक प्रक्रिया के तहत जांचे जाएं तो विवाद का बड़ा हिस्सा स्वतः स्पष्ट हो सकता है।

विपक्षी दलों के लिए भी बना मुद्दा

यह मामला राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील हो सकता है। विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति का मुद्दा अक्सर विपक्षी दलों को सरकार और प्रशासन पर सवाल उठाने का अवसर देता है।विपक्षी दल यदि इस प्रकरण को उठाते हैं तो उनके सामने दो मुद्दे होंगे—पहला, छात्रों की मांगों की जांच और दूसरा, पुलिस के कथित आक्रामक रवैये की जांच।

हालांकि किसी राजनीतिक दल की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आए बिना उसके नाम से बयान देना उचित नहीं होगा। इसलिए इस मामले में आगे आने वाली राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी महत्वपूर्ण रहेंगी।

क्या होना चाहिए आगे?

इस पूरे प्रकरण में टकराव बढ़ाने के बजाय एक निष्पक्ष जांच सबसे बेहतर रास्ता दिखाई देता है।जांच में कम से कम इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए—

1. असिस्टेंट प्रॉक्टर और छात्रों के बीच वास्तव में क्या हुआ?

2. क्या धक्का-मुक्की या मारपीट का प्रयास हुआ?

3. वायरल वीडियो की पूरी रिकॉर्डिंग क्या बताती है?

4. पुलिस अधिकारी ने किस परिस्थिति में बल बुलाने की चेतावनी दी?

5. छात्रों की मांगों में कौन-कौन से मुद्दे विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड से सत्यापित होते हैं?

6. निष्कासन की कार्रवाई किन नियमों के तहत हुई?

7. छात्रसंघ चुनाव को लेकर विश्वविद्यालय की आधिकारिक स्थिति क्या है?

8. पीएम-उषा परियोजनाओं और परीक्षा एजेंसी से जुड़े आरोपों पर क्या कोई आधिकारिक जांच हुई है?

9. डिग्री और अंकपत्र के नाम पर कथित वसूली के आरोपों की जांच किस स्तर पर हुई?

10. क्या छात्र और विश्वविद्यालय प्रशासन एक औपचारिक संवाद समिति के माध्यम से समाधान निकाल सकते हैं?

NSK विश्लेषण: असली परीक्षा सिर्फ पुलिस की नहीं, विश्वविद्यालय की भी

गोरखपुर विश्वविद्यालय का यह विवाद सिर्फ एक वायरल वीडियो की कहानी नहीं है।

यह उस बड़े सवाल की तस्वीर है जिसमें एक तरफ छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़क और परिसर में उतरते हैं,

दूसरी तरफ विश्वविद्यालय प्रशासन अनुशासन बनाए रखने की कोशिश करता है और तीसरी तरफ पुलिस कानून-व्यवस्था संभालने पहुंचती है।

लेकिन लोकतांत्रिक संस्थानों की खूबसूरती यही है कि असहमति को दबाने के बजाय उसका संस्थागत समाधान निकाला जाए।

छात्रों का आंदोलन शांतिपूर्ण रहे, प्रशासन जवाबदेह रहे और पुलिस कानून के साथ संयम की भाषा में काम करे—तीनों बातें एक साथ चलेंगी, तभी विश्वविद्यालय का माहौल स्वस्थ रहेगा।

वायरल वीडियो पर कार्रवाई हो या छात्रों की मांगों पर जांच—दोनों मामलों में पारदर्शिता जरूरी है।

क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन चिल्लाया?

बड़ा सवाल यह है कि विश्वविद्यालय में संवाद इतना कमजोर क्यों हुआ कि बात बातचीत से निकलकर टकराव और पुलिस की चेतावनी तक पहुंच गई?

NSK की नजर में अब सबकी निगाहें विश्वविद्यालय प्रशासन, पुलिस जांच और छात्रों के अगले कदम पर हैं।

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