मुस्लिम वोट बैंक से आगे बढ़कर प्रतिनिधित्व की राजनीति! प्रशांत किशोर की नई हुंकार ने RJD-कांग्रेस की बढ़ाई बेचैनी, बिहार में खुल रहा सियासत का नया पन्ना, “क्या बिहार का मुस्लिम मतदाता अब सिर्फ ‘वोट बैंक’ नहीं, सत्ता में भागीदारी का हिस्सेदार बनेगा?

बी. के. झा

NSK news Ind

पटना, 14 सितंबर

बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर ने एक बार फिर ऐसा राजनीतिक सवाल उछाल दिया है, जिसकी गूंज सिर्फ पटना के सब्जीबाग तक सीमित रहने वाली नहीं है।

जन सुराज पार्टी के संस्थापक और बांकीपुर विधायक प्रशांत किशोर ने मुस्लिम समुदाय से साफ शब्दों में कहा कि किसी राजनीतिक दल का पिछलग्गू बनने के बजाय उसे अपनी राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व की चिंता स्वयं करनी चाहिए।पटना के मुस्लिम बहुल सब्जीबाग इलाके में आयोजित अल्पसंख्यक सम्मेलन में किशोर ने कहा कि लोकतांत्रिक राजनीति में अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए और इसके लिए समुदाय को स्वयं संघर्ष करना होगा।

उन्होंने बिहार के सभी सामाजिक वर्गों से भी अपील की कि वे खुद को हितैषी बताने वाले नेताओं के बहकावे में आने के बजाय अपने बच्चों के भविष्य को प्राथमिकता दें।प्रशांत किशोर का यह बयान ऐसे समय आया है जब बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज ने बीजेपी के लंबे समय से मजबूत माने जाने वाले गढ़ को ध्वस्त कर राजनीतिक समीकरण बदल दिया है।

बांकीपुर पर बीजेपी का 1995 से लगातार कब्जा रहा था और नितिन नवीन के विधानसभा से इस्तीफे के बाद हुए उपचुनाव में प्रशांत किशोर ने जीत दर्ज की।

‘मुस्लिम वोट’ नहीं, ‘मुस्लिम प्रतिनिधित्व’—क्या PK ने बदल दिया राजनीतिक विमर्श?

बिहार की चुनावी राजनीति में लंबे समय से मुस्लिम मतदाताओं को RJD के पारंपरिक सामाजिक आधार के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जाता रहा है। ऐसे में प्रशांत किशोर का यह कहना कि मुस्लिम समुदाय किसी पार्टी का स्थायी समर्थक बनने के बजाय अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए स्वयं संघर्ष करे, सीधे उस स्थापित राजनीतिक धारणा को चुनौती देता है।यहीं से इस बयान का असली राजनीतिक महत्व सामने आता है।सवाल केवल यह नहीं है कि मुस्लिम मतदाता किसे वोट देगा। बड़ा सवाल यह है कि उसके वोट के बदले उसे राजनीति में कितनी भागीदारी, कितने टिकट, कितने प्रभावशाली पद और नीति-निर्माण में कितनी आवाज मिलेगी?

राजनीतिक विश्लेषकों के एक वर्ग का मानना है कि यदि मतदाता जाति, धर्म या पारंपरिक राजनीतिक निष्ठा से ऊपर उठकर उम्मीदवारों और नीतियों के आधार पर मतदान करने लगता है तो बिहार की राजनीति में स्थापित समीकरणों को चुनौती मिल सकती है। वहीं दूसरा पक्ष इसे प्रशांत किशोर की अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की रणनीति मानता है।

RJD के लिए असली चुनौती क्या है?

प्रशांत किशोर का संदेश सीधे तौर पर किसी एक दल के खिलाफ नहीं है, लेकिन बिहार की राजनीति में इसका सबसे बड़ा असर उस दल पर पड़ सकता है जिसे लंबे समय से मुस्लिम-यादव सामाजिक समीकरण का प्रमुख राजनीतिक लाभार्थी माना जाता रहा है।अगर मुस्लिम मतदाताओं का एक हिस्सा यह सवाल उठाने लगे कि वर्षों से समर्थन देने के बावजूद सत्ता और संगठन में उसे अपेक्षित प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिला, तो RJD और कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों को अपने उम्मीदवार चयन, संगठनात्मक प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यक नेतृत्व पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है।

हालांकि यह मान लेना भी जल्दबाजी होगी कि बांकीपुर के परिणाम को पूरे बिहार के मुस्लिम मतदाताओं के राजनीतिक रुझान का प्रमाण मान लिया जाए। बांकीपुर एक विशिष्ट शहरी विधानसभा क्षेत्र है और वहां का चुनावी सामाजिक समीकरण पूरे राज्य से अलग है।

शिक्षाविदों की नजर में—प्रतिनिधित्व बनाम तुष्टीकरण

शिक्षाविदों के बीच इस मुद्दे पर दो अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ सकते हैं। एक पक्ष लोकतंत्र में आबादी के विभिन्न सामाजिक वर्गों की प्रभावी भागीदारी को लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी मानता है। दूसरा पक्ष चेतावनी देता है कि प्रतिनिधित्व की राजनीति को केवल धार्मिक पहचान तक सीमित कर देने से विकास, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और प्रशासन जैसे मूल सवाल पीछे छूट सकते हैं।

यही वह बिंदु है जहां प्रशांत किशोर की बात की असली परीक्षा होगी।यदि ‘उचित प्रतिनिधित्व’ का अर्थ शिक्षा, रोजगार, प्रशासन, स्थानीय निकायों, विधानमंडल और नीति-निर्माण में अवसरों की समानता है तो यह विमर्श व्यापक सामाजिक बहस का आधार बन सकता है। लेकिन यदि यह केवल चुनावी गणित और वोटों के ध्रुवीकरण तक सीमित रहा तो यह बिहार की उसी पारंपरिक वोट-बैंक राजनीति का नया संस्करण बनकर रह जाएगा।

कानूनविदों का सवाल—प्रतिनिधित्व अधिकार है, लेकिन आधार क्या होगा?

कानूनविदों के नजरिए से लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को राजनीतिक भागीदारी का समान अधिकार है। किसी समुदाय को राजनीतिक रूप से सक्रिय होने और अपने प्रतिनिधित्व की मांग करने से रोकना लोकतांत्रिक भावना के विपरीत होगा। लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आधार संविधानसम्मत समानता, नागरिक अधिकार और लोकतांत्रिक प्रक्रिया होना चाहिए।इसलिए बहस का केंद्र यह होना चाहिए कि क्या राजनीतिक दल टिकट वितरण और संगठन में वास्तविक सामाजिक भागीदारी सुनिश्चित कर रहे हैं या चुनाव के समय समुदायों को केवल मतदाता समूह के रूप में देखते हैं।

मुस्लिम संगठनों के सामने भी बड़ा सवाल

प्रशांत किशोर की अपील मुस्लिम सामाजिक और सामुदायिक संगठनों के लिए भी आत्ममंथन का अवसर पैदा करती है। क्या समुदाय केवल चुनाव के समय अपनी राजनीतिक प्राथमिकता तय करेगा या शिक्षा, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, उद्यमिता, प्रशासनिक सेवाओं और राजनीतिक नेतृत्व की दीर्घकालिक तैयारी पर भी काम करेगा?

अगर राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल गंभीरता से उठाया जाता है तो मुस्लिम समाज के भीतर से नए नेतृत्व, शिक्षित राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों की भूमिका भी बढ़ेगी।

हिंदू समाज और सामाजिक संगठनों के लिए भी यही कसौटी

इस बहस को केवल मुस्लिम राजनीति तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा। बिहार में हिंदू समाज के विभिन्न सामाजिक समूहों, जातीय संगठनों और सामाजिक संस्थाओं के सामने भी यही सवाल है कि क्या वे केवल चुनावी समर्थन तक सीमित रहेंगे या शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुधार और राजनीतिक नेतृत्व निर्माण में दीर्घकालिक भूमिका निभाएंगे।

लोकतंत्र में किसी भी समुदाय का सशक्तिकरण दूसरे समुदाय के कमजोर होने की कीमत पर नहीं होना चाहिए। वास्तविक राजनीतिक भागीदारी वही है जिसमें सभी सामाजिक समूह अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को समझें।

RJD-कांग्रेस की रणनीति पर पड़ेगा असर?

प्रशांत किशोर के बयान का राजनीतिक संदेश स्पष्ट है—वे बिहार में अपने लिए ऐसा सामाजिक आधार तलाश रहे हैं जो पारंपरिक दलों की सीमाओं से बाहर हो।जन सुराज ने पिछले विधानसभा चुनाव में अपेक्षित राजनीतिक प्रभाव नहीं डाला था, लेकिन बांकीपुर की जीत ने पार्टी को नया मनोबल दिया है। अब किशोर विधान परिषद की आगामी आठ सीटों पर भी चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कर चुके हैं।इसका अर्थ है कि जन सुराज अब केवल एक आंदोलन या वैकल्पिक राजनीतिक मंच के रूप में नहीं, बल्कि बिहार की चुनावी राजनीति में स्थायी खिलाड़ी बनने की कोशिश कर रहा है।

RJD और कांग्रेस के सामने चुनौती यह होगी कि वे मुस्लिम मतदाताओं समेत अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को केवल चुनावी गठजोड़ के भरोसे बनाए रखते हैं या उसे वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक भागीदारी का स्वरूप भी देते हैं।

बिहार सरकार के लिए भी आसान नहीं होगा यह विमर्श

प्रशांत किशोर अब विधायक हैं और उनका राजनीतिक प्रभाव बांकीपुर से आगे बढ़ाने की कोशिश स्पष्ट दिखाई दे रही है। ऐसे में सरकार की नीतियों पर उनकी हर टिप्पणी विपक्षी राजनीति के साथ-साथ वैकल्पिक राजनीति का दावा भी बनती जा रही है।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पहले ही किशोर को ‘बेचारा’ कहकर उनकी राजनीतिक चुनौती को हल्का करने की कोशिश कर चुके हैं, जबकि किशोर ने इसके जवाब में सरकार और मुख्यमंत्री पर तीखे हमले किए हैं।यानी बिहार की राजनीति में PK बनाम सत्ता का टकराव अब व्यक्तिगत बयानबाजी से आगे बढ़कर राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई बनता जा रहा है।

असली परीक्षा अब प्रशांत किशोर की भी

प्रशांत किशोर ने मुस्लिम समाज से कहा है कि वह किसी राजनीतिक दल का पिछलग्गू न बने। यह बात सुनने में प्रभावशाली है, लेकिन इसका अगला सवाल स्वयं जन सुराज से भी पूछा जाएगा।क्या जन सुराज मुस्लिम समाज को केवल वोटर के रूप में देखेगा या संगठन, उम्मीदवार चयन और नेतृत्व में उसे वास्तविक भागीदारी देगा?

क्या महिलाओं, अति पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों और युवाओं को वह राजनीतिक शक्ति देगा जिसका वादा किया गया है?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या जन सुराज खुद उस राजनीतिक संस्कृति का विकल्प बन पाएगा जिसकी आलोचना प्रशांत किशोर लगातार करते रहे हैं?

यहीं से प्रशांत किशोर के बयान की विश्वसनीयता तय होगी।

निष्कर्ष

बिहार की राजनीति में शायद पहली बार बहस को ‘किसका वोट किसे जाएगा’ से आगे ले जाने की कोशिश हो रही है। प्रशांत किशोर का संदेश यही है कि मतदाता किसी दल का स्थायी ग्राहक नहीं, लोकतंत्र का मालिक है।लेकिन इस विचार की अग्निपरीक्षा आने वाले चुनावों में होगी।

यदि मुस्लिम मतदाता अपने वोट को केवल भावनात्मक पहचान के बजाय शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, प्रतिनिधित्व और विकास से जोड़कर देखता है, तो बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव है।

और यदि यही सिद्धांत हिंदू, दलित, अति पिछड़े, आदिवासी, महिला और युवा मतदाताओं पर भी लागू होता है, तो बिहार में राजनीति का केंद्र ‘वोट बैंक’ से हटकर ‘जवाबदेही’ बन सकता है।

यही प्रशांत किशोर की बात का सबसे बड़ा राजनीतिक अर्थ है—और शायद सबसे बड़ी चुनौती भी।

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