बी के झा
NSK news Ind

नई दिल्ली, 18 सितंबर
किसी नेता की सोच का दायरा केवल उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उन फैसलों से समझा जा सकता है जिनमें तत्काल लाभ से आगे भविष्य की तस्वीर दिखाई देती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ लंबे समय तक काम कर चुके एक पूर्व शीर्ष अधिकारी के अनुभवों में उनके नेतृत्व की ऐसी ही तस्वीर उभरती है। उनके मुताबिक मोदी की कार्यशैली का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा है कि वे मौजूदा सीमाओं के भीतर समाधान खोजने के बजाय कई बार लक्ष्य का दायरा ही बड़ा कर देते हैं।इस सोच की एक मिसाल धोलेरा से जुड़ी है। उस समय लेखक दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर विकास कॉरपोरेशन (DMIDC) के सीईओ थे और भारत में औद्योगिक शहरीकरण के अगले चरण को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उनके पास थी।
भारत का पहला ग्रीन-फील्ड औद्योगिक शहर विकसित करने के लिए करीब 150 वर्ग किलोमीटर जमीन की जरूरत बताई गई थी।कई मुख्यमंत्रियों के सामने प्रस्ताव रखा गया, लेकिन जमीन का इतना बड़ा हिस्सा उपलब्ध कराना जोखिम भरा और कठिन माना गया। इसके बाद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात हुई।लेखक के अनुसार, उन्होंने पूरी बात सुनी, कुछ देर विचार किया और फिर कहा—“150 वर्ग किलोमीटर तो बहुत कम है।
सपना देखना है, तो बड़ा देखो
”इसके बाद गुजरात सरकार ने करीब 750 वर्ग किलोमीटर जमीन देने की पेशकश की। 2009 तक गुजरात में विशेष निवेश क्षेत्र यानी SIR एक्ट लागू हुआ और मास्टर प्लान के साथ धोलेरा SIR की औपचारिक शुरुआत हुई।लेखक के मुताबिक उस मुलाकात में उन्हें यह समझ आया कि मोदी की नजर केवल एक औद्योगिक परियोजना पर नहीं, बल्कि ऐसे नए विकास केंद्र पर थी जो गुजरात और आगे चलकर भारत के आर्थिक विस्तार का इंजन बन सके।
गुजरात से दिल्ली तक पहुंची विकास की सोच
इसके बाद दो वाइब्रेंट गुजरात समिट में भाग लेने के दौरान लेखक ने मोदी के उस दृष्टिकोण को करीब से देखा, जिसमें गुजरात को आधुनिक, गतिशील और वैश्विक निवेश के लिए प्रतिस्पर्धी राज्य बनाने पर जोर था।
2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो लेखक उस समय औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (DIPP) के सचिव थे। शुरुआती दौर में प्रधानमंत्री के सामने अधिकारियों की ओर से प्रस्तुतियां हुईं। विश्व बैंक की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में भारत के 142वें स्थान पर होने का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने अधिकारियों के सामने एक स्पष्ट लक्ष्य रखा—देश को नागरिकों और कारोबारियों के लिए अधिक सरल बनाना।इसके बाद अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों में नियमों, कानूनों और प्रक्रियाओं की समीक्षा शुरू हुई। इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, GST और पुराने कानूनों व प्रक्रियाओं को हटाने की दिशा में काम हुआ।
लेखक के मुताबिक भारत की रैंकिंग में इसके बाद 79 स्थान का सुधार हुआ।यह दौर केवल रैंकिंग सुधारने तक सीमित नहीं रहा। सरकार की औद्योगिक नीति में विनिर्माण को केंद्रीय भूमिका देने की कोशिश हुई।
‘मेक इन इंडिया’ से विनिर्माण का विस्तार‘
मेक इन इंडिया’ को लेकर प्रधानमंत्री के सामने कई प्रस्तुतियां दी गईं। लेखक के मुताबिक मोदी का मानना था कि भारत को बड़े पैमाने पर विनिर्माण क्षमता विकसित करनी होगी, क्योंकि रोजगार, आर्थिक अवसर और विकास को इससे गति मिल सकती है।मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रिक वाहन, दवाइयों, रक्षा उपकरणों, सौर मॉड्यूल, टेलीकॉम और इंजीनियरिंग उत्पादों तक कई क्षेत्रों में विनिर्माण क्षमता बढ़ाने की कोशिश इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा रही।इसी के समानांतर स्टार्टअप इकोसिस्टम को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया।
लेखक के अनुसार, जब स्टार्टअप इंडिया अभियान शुरू हुआ था तब भारत में केवल 356 मान्यता प्राप्त स्टार्टअप थे। आज यह संख्या तीन लाख से अधिक हो चुकी है।यह आंकड़ा केवल संख्या में वृद्धि की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताता है कि पिछले एक दशक में उद्यमिता को लेकर भारत में नीतिगत स्तर पर कितना बड़ा बदलाव आया है।
तकनीक के साथ भविष्य की तैयारी
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की चर्चा में तकनीक और उभरते क्षेत्रों का उल्लेख भी प्रमुखता से किया जाता है। लेखक के अनुभव के मुताबिक प्रधानमंत्री AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजी, ड्रोन, रक्षा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों को भविष्य के अवसरों के रूप में देखते रहे हैं।चंद्रयान-3 और आदित्य-L1 जैसे अंतरिक्ष अभियानों के साथ भारत की अंतरिक्ष क्षमता को लेकर राष्ट्रीय आत्मविश्वास बढ़ा। साथ ही निजी क्षेत्र के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र खोलने की दिशा में भी बदलाव आया।
India AI और राष्ट्रीय क्वांटम मिशन जैसी पहलों का उद्देश्य
AI और क्वांटम तकनीक में स्वदेशी क्षमताओं को मजबूत करना है। वहीं राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन जैसे कार्यक्रम आर्थिक विकास के साथ ऊर्जा संक्रमण और पर्यावरणीय लक्ष्यों को जोड़ने की कोशिश करते हैं।
कैश से डिजिटल भुगतान तक का सफर
भारत के आर्थिक बदलाव की एक और बड़ी कहानी डिजिटल भुगतान की है।एक दशक पहले रोजमर्रा के अधिकांश लेन-देन में नकदी और पारंपरिक कार्ड भुगतान का दबदबा था। इसके बाद कम-नकदी वाली अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने की नीतियां, RBI का नियामकीय ढांचा, NPCI द्वारा UPI का विकास और बैंकों, फिनटेक कंपनियों, टेलीकॉम कंपनियों तथा व्यापारियों की भागीदारी ने एक ऐसे भुगतान तंत्र को जन्म दिया जो आज भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण पहचान बन चुका है।लेखक बताते हैं कि एक समय उनकी टीम को 100 दिनों में 100 डिजिटल मेले आयोजित करने की चुनौती दी गई थी। इसका उद्देश्य लोगों और कारोबारियों को डिजिटल भुगतान से जोड़ना था। उनके अनुसार इस अभियान ने UPI के विस्तार के लिए जरूरी माहौल बनाने में भूमिका निभाई।
‘पिछड़े’ जिलों से ‘आकांक्षी’ जिलों तक
2016 तक लेखक नीति आयोग के प्रमुख बन चुके थे। इसी दौरान कैबिनेट की एक बैठक में प्रधानमंत्री ने उन्हें देश के सबसे पिछड़े जिलों पर विशेष रूप से काम करने को कहा।यहीं से आकांक्षी जिला कार्यक्रम की शुरुआत हुई।इस कार्यक्रम का आधार केवल सरकारी योजनाएं चलाना नहीं था। इसमें रियल-टाइम डेटा, मापने योग्य परिणाम और जिलों के अधिकारियों के प्रदर्शन पर लगातार नजर रखने की व्यवस्था को महत्व दिया गया।‘आकांक्षी’ शब्द भी इसी सोच को दर्शाता था। उद्देश्य यह था कि इन जिलों की पहचान केवल उनकी कमियों से न हो, बल्कि उनकी संभावनाओं से हो।
लेखक के मुताबिक स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, वित्तीय समावेशन और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में कई आकांक्षी जिलों ने उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया और कुछ संकेतकों पर उनका प्रदर्शन देश के बेहतर प्रदर्शन करने वाले जिलों के करीब पहुंचा या उनसे आगे गया।
बैठकों में बोलने से पहले सुनने की शैली
लेखक के मुताबिक प्रधानमंत्री के साथ काम करने के दौरान उन्हें एक और बात लगातार देखने को मिली—बैठकों में वे पहले अलग-अलग अधिकारियों और विशेषज्ञों के विचार सुनते थे और उसके बाद सवालों के जरिए विषय की गहराई तक जाते थे।नीति आयोग में बुनियादी ढांचा क्षेत्रों की समीक्षा के दौरान अधिकारियों से विस्तृत तैयारी और मंत्रालयों के प्रदर्शन का आंकड़ों के आधार पर विश्लेषण अपेक्षित होता था। लेखक का कहना है कि प्रधानमंत्री प्रस्तुतियों को ध्यान से सुनते और फिर सीधे मुद्दे से जुड़े सवाल पूछते थे।उनके अनुसार, नेतृत्व की यह शैली केवल निर्णय लेने तक सीमित नहीं थी। अलग-अलग दृष्टिकोण सुनकर समस्या को समझना और उसके बाद आगे की दिशा तय करना इसका महत्वपूर्ण हिस्सा था।
जब भारत ने दुनिया को एक साथ लाने की कोशिश की
नीति आयोग से विदाई के समय लेखक प्रधानमंत्री से मिलने गए थे। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री ने धन्यवाद स्वीकार करने के बजाय उन्हें भारत के G20 शेरपा की जिम्मेदारी संभालने को कहा।वह समय वैश्विक स्तर पर बेहद जटिल था। भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा हुआ था और विभिन्न देशों के बीच सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण था। इसके बावजूद भारत ने G20 की अध्यक्षता के दौरान नई दिल्ली लीडर्स डिक्लेरेशन को सर्वसम्मति से स्वीकार कराने की दिशा में काम किया।लेखक के मुताबिक प्रधानमंत्री को भरोसा था कि भारत अलग-अलग मत रखने वाले देशों को एक साझा मंच पर ला सकता है।
नेतृत्व की सबसे बड़ी सीख: जो अभी नहीं है, उसकी कल्पना करना
प्रधानमंत्री मोदी के साथ काम करने के अनुभव को लेखक अंततः नेतृत्व की एक व्यापक सीख के रूप में देखते हैं।उनके मुताबिक इस अनुभव से उन्होंने सीखा कि किसी नेता के लिए केवल वर्तमान समस्याओं का समाधान करना पर्याप्त नहीं है। उसे ऐसी संभावनाओं की कल्पना भी करनी चाहिए जो अभी वास्तविकता नहीं बनी हैं। इसके बाद उस कल्पना को नीति, प्रशासन, संस्थागत क्षमता और संसाधनों के जरिए जमीन पर उतारने की कोशिश करनी चाहिए।धोलेरा के लिए 150 वर्ग किलोमीटर की जरूरत को 750 वर्ग किलोमीटर के सपने में बदलने से लेकर डिजिटल भुगतान, स्टार्टअप, तकनीक, अंतरिक्ष और आकांक्षी जिलों तक की यह यात्रा इसी सोच की अलग-अलग झलक पेश करती है।
हालांकि किसी भी सरकार की नीतियों और उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल दावों से नहीं, बल्कि स्वतंत्र आंकड़ों, जमीनी परिणामों और दीर्घकालिक प्रभावों के आधार पर किया जाना चाहिए।
लेकिन एक अधिकारी की नजर से देखें तो इस पूरी कहानी में एक विचार लगातार दिखाई देता है—विकास की शुरुआत अक्सर उस बिंदु से होती है, जहां कोई व्यक्ति मौजूदा सीमा को अंतिम सीमा मानने से इनकार कर देता है।
बी. के. झा,
एन एस के न्यूज इंडिया
