बी के झा
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नई दिल्ली, 20 सितंबर
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले सियासी बिसात तेजी से बदलती नजर आ रही है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख एवं केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी के बीच ‘चवन्नी-रुपया’ वाले बयान से शुरू हुई जुबानी जंग में अब AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की एंट्री हो गई है। ओवैसी ने जयंत चौधरी का खुलकर बचाव करते हुए अखिलेश यादव के बयान पर सवाल उठाए हैं। साथ ही उन्होंने मायावती के राजनीतिक सफर की तारीफ करते हुए यूपी में बीजेपी के खिलाफ संभावित विपक्षी गठजोड़ का दरवाजा भी खोल दिया है।’जयंत और उनकी पत्नी को अच्छी तरह जानता हूं’ओवैसी ने जयंत चौधरी के बारे में कहा कि वह उन्हें और उनकी पत्नी को अच्छी तरह जानते हैं और जयंत से आज भी मुलाकात होती है।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक असहमति अपनी जगह हो सकती है, लेकिन किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना, जो कभी आपके साथ रहा हो, उचित नहीं है।ओवैसी के मुताबिक, वह जयंत से आमने-सामने यह सवाल भी पूछते हैं कि वह बीजेपी के साथ क्यों गए। उनके अनुसार, जयंत इस सवाल पर मुस्कुराकर कहते हैं कि इस बारे में बाद में बात करेंगे।
AIMIM प्रमुख ने अखिलेश के उस बयान पर भी निशाना साधा जिसमें उन्होंने कहा था कि जिन लोगों को उन्होंने ‘चवन्नी से रुपया’ बनाया, वे भी उन्हें छोड़कर चले गए। जयंत चौधरी इस टिप्पणी पर पहले ही पलटवार कर चुके हैं और इसे राजनीतिक अहंकार तथा जाट समाज को निशाना बनाने से जोड़ चुके हैं।
ओवैसी का नया दांव—’BJP को रोकना है तो बात करो
‘सबसे महत्वपूर्ण संदेश ओवैसी ने 2027 के यूपी चुनाव को लेकर दिया। उन्होंने कहा कि AIMIM नहीं चाहती कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी लगातार तीसरी बार सरकार बनाए। उनका कहना है कि जो दल भी बीजेपी को सत्ता में आने से रोकना चाहते हैं, वे AIMIM से बातचीत कर सकते हैं।ओवैसी ने साफ कहा कि कोई एक दल अकेले बीजेपी को रोकने की स्थिति में नहीं है और इसके लिए विपक्षी दलों को साथ आकर काम करने की जरूरत है।यह बयान ऐसे समय आया है जब यूपी में चुनावी तैयारियां तेज हो चुकी हैं और अलग-अलग दल अपने सामाजिक एवं राजनीतिक समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं। AIMIM इससे पहले भी यूपी में गठबंधन की संभावना को लेकर सार्वजनिक रूप से बातचीत की पेशकश कर चुकी है।
मायावती की तारीफ, लेकिन भविष्य पर ओवैसी ने छोड़ा सवाल
ओवैसी ने बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती को लेकर भी सकारात्मक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि मायावती उन चुनिंदा नेताओं में रही हैं जिन्होंने बिना किसी पारिवारिक राजनीतिक विरासत के अपना राजनीतिक सफर बनाया और पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं।ओवैसी ने मायावती के इस राजनीतिक सफर को बड़ी उपलब्धि बताया। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में वैसा राजनीतिक परिणाम दोबारा होगा या नहीं, यह अलग सवाल है।यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यूपी की राजनीति में बीजेपी, सपा, बसपा, कांग्रेस और छोटे क्षेत्रीय दल अपने-अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में ओवैसी का मायावती के राजनीतिक कद को स्वीकार करना संभावित विपक्षी संवाद के लिए एक संकेत के तौर पर देखा जा सकता है—हालांकि किसी औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं हुई है।
अखिलेश बनाम जयंत की तल्खी ने खोली नई राजनीतिक खिड़की
अखिलेश यादव और जयंत चौधरी कभी सहयोगी रहे हैं, लेकिन अब दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक तल्खी बढ़ती दिखाई दे रही है। अगस्त में अखिलेश की ‘चवन्नी से रुपया’ वाली टिप्पणी के बाद जयंत ने जवाब देते हुए कहा था कि राजनीतिक लड़ाई में उन्हें निशाना बनाना हो तो सीधे उनका नाम लिया जाए और जाट समाज को निशाना न बनाया जाए। बाद में दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे पर कई राजनीतिक आरोप लगाए गए।अब ओवैसी का जयंत के बचाव में उतरना इस विवाद को एक अलग राजनीतिक कोण देता है। एक तरफ अखिलेश यादव विपक्षी राजनीति में अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं AIMIM लगातार यह संदेश दे रही है कि अल्पसंख्यक राजनीति के सवाल पर उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
20 सितंबर को AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता शादाब चौहान ने भी कहा कि उनकी पार्टी को विपक्षी सामाजिक गठजोड़ से बाहर रखकर PDA की राजनीति अधूरी है और बीजेपी के खिलाफ विपक्षी एकजुटता के लिए AIMIM से बातचीत होनी चाहिए।यूपी की सियासत में अब सिर्फ ‘कौन साथ है’ नहीं, ‘कौन किससे बात करेगा’ भी सवाल
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में दिलचस्प स्थिति बन रही है। सपा और आरएलडी के रिश्तों में तल्खी है, बसपा अपनी अलग राजनीतिक जमीन तलाश रही है और AIMIM गठबंधन की संभावनाओं को लेकर लगातार संकेत दे रही है।ऐसे में ओवैसी का संदेश सीधे तौर पर विपक्षी दलों के लिए है—अगर बीजेपी को रोकने के लिए व्यापक गठजोड़ की जरूरत है, तो AIMIM से बातचीत को भी राजनीतिक विकल्प के रूप में देखा जाए।
लेकिन यूपी की राजनीति में गठबंधन सिर्फ सीटों का जोड़ नहीं होता। पश्चिमी यूपी में जाट राजनीति, पूर्वांचल में सामाजिक समीकरण, दलित वोट, मुस्लिम मतदाता, पिछड़े वर्गों का समर्थन और क्षेत्रीय दलों की अपनी महत्वाकांक्षाएं—इन सभी के बीच संतुलन बनाना किसी भी गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती होगी।
यही वजह है कि ओवैसी का बयान फिलहाल किसी गठबंधन की घोषणा से ज्यादा 2027 की चुनावी बातचीत का एक खुला निमंत्रण है।
अब देखना यह है कि अखिलेश यादव, मायावती, कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल इस निमंत्रण को किस रूप में लेते हैं और क्या यूपी की चुनावी राजनीति में नए समीकरणों की कोई जमीन तैयार होती है।
