दिनकर की कविता में सिर्फ शब्द नहीं, राष्ट्र की चेतना थी: रोहिणी में साहित्यिक सम्मेलन में गूंजा राष्ट्रकवि का ओज; डॉ. राजेश पांडे ने सेवा-कार्य से जुड़ा अपना आत्मीय रिश्ता साझा किया

बी के झा

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नई दिल्ली, 27 सितंबर

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती के अवसर पर राजधानी दिल्ली के रोहिणी स्थित टेक्निया इंस्टीट्यूट के विशाल सभागार में साहित्य, समाज और राष्ट्रचेतना का अनूठा संगम देखने को मिला। डॉ. रमेश प्रसाद सिंह, भारतीय नेत्रहीन कल्याण परिषद के अध्यक्ष तथा दिनकर सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सम्मेलन में देश के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े बुद्धिजीवियों, कवियों और विद्वानों ने राष्ट्रकवि दिनकर के जीवन, साहित्य और राष्ट्र के प्रति उनके योगदान पर विस्तार से विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि दिनकर केवल कविता लिखने वाले साहित्यकार नहीं थे। उनकी रचनाओं में राष्ट्र की आत्मा, सामाजिक चेतना, स्वाभिमान, संघर्ष और परिवर्तन की पुकार दिखाई देती है।

उन्होंने अपनी ओजस्वी लेखनी से ऐसी लौ प्रज्वलित की, जिसने साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम न रहने देकर उसे समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का स्वर दिया।

दिनकर की कविता में दिखाई देती थी भारत की आत्मा

सम्मेलन में वक्ताओं ने दिनकर के साहित्य की विभिन्न धाराओं पर चर्चा करते हुए कहा कि उनकी कविताओं में जहां एक ओर वीरता और राष्ट्रभक्ति का स्वर मुखर था, वहीं दूसरी ओर सामाजिक विषमता, अन्याय और मानवीय संवेदनाओं को लेकर भी गहरी चिंता दिखाई देती थी।

दिनकर की रचनाएं उस दौर की परिस्थितियों से संवाद करती थीं और आम भारतीय के भीतर आत्मसम्मान तथा अपने अधिकारों के प्रति चेतना पैदा करती थीं। यही कारण है कि समय बीतने के बावजूद उनकी कविताएं आज भी सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय विमर्श में उद्धृत होती हैं।

वक्ताओं का कहना था कि दिनकर को याद करना केवल उनकी जयंती मनाना नहीं, बल्कि उस विचारधारा और चेतना को याद करना है जिसमें राष्ट्र सर्वोपरि था और साहित्य समाज को दिशा देने का माध्यम।

साहित्य से सेवा तक पहुंची दिनकर की प्रेरणा

कार्यक्रम के दौरान डॉ. राजेश पांडे से हुई बातचीत में दिनकर से उनका एक आत्मीय पारिवारिक और भावनात्मक रिश्ता सामने आया।

दिल्ली में वर्षों से फिजियोथैरेपिस्ट सेंटर संचालित कर रहे डॉ. पांडे अपने चैरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से भी लंबे समय से जरूरतमंद और पीड़ित लोगों की सहायता से जुड़े हुए हैं।बातचीत में उन्होंने बताया कि समाजसेवा की दिशा में काम करने की प्रेरणा से उनका रिश्ता उनके पारिवारिक और बचपन के अनुभवों से भी जुड़ा है।

उनका ननिहाल राष्ट्रकवि दिनकर के गांव से संबंधित है और उनका बचपन भी ननिहाल में बीता। उन्होंने बताया कि बचपन में अपने ननिहाल में बिताए समय के दौरान दिनकर की धरती और उनकी साहित्यिक विरासत से उनका परिचय बना। बाद में उच्च शिक्षा के लिए वे दरभंगा आए, जहां उनके मामा पहले से रहते थे।

शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने दिल्ली का रुख किया और अपनी मेहनत, योग्यता तथा सेवा भावना के बल पर राजधानी में अपनी अलग पहचान बनाई।

राजधानी में पेशे के साथ समाजसेवा का संकल्प

डॉ. राजेश पांडे की कहानी केवल एक चिकित्सकीय पेशेवर के रूप में आगे बढ़ने की कहानी नहीं है। उन्होंने अपने पेशे के साथ समाज के कमजोर और जरूरतमंद वर्गों तक सहायता पहुंचाने का प्रयास भी जारी रखा।उनके चैरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से लंबे समय से विभिन्न सेंटरों के जरिए जरूरतमंद लोगों की मदद की जा रही है।

उनका कहना है कि चिकित्सा केवल पेशा नहीं, बल्कि जरूरतमंद व्यक्ति के जीवन में राहत पहुंचाने का माध्यम भी हो सकती है।

दिनकर की जयंती के अवसर पर उनकी यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय रही कि जिस मिट्टी और परिवेश ने राष्ट्रकवि को जन्म दिया, उसी विरासत से जुड़े परिवार की एक पीढ़ी आज राजधानी दिल्ली में चिकित्सा और समाजसेवा के माध्यम से लोगों तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।

दिनकर की विरासत का अर्थ सिर्फ स्मरण नहीं, संकल्प भी

रोहिणी में आयोजित यह सम्मेलन इस अर्थ में भी महत्वपूर्ण रहा कि यहां दिनकर को केवल एक महान कवि के रूप में याद नहीं किया गया, बल्कि उनके विचारों को वर्तमान समाज से जोड़ने का प्रयास किया गया।

दिनकर की लेखनी ने जिस आत्मविश्वास, संघर्ष और राष्ट्रचेतना की आवाज उठाई थी, आज उनकी जयंती पर उसी चेतना को सामाजिक जिम्मेदारी और सेवा के साथ जोड़कर देखने की जरूरत महसूस की गई।

सम्मेलन का मूल संदेश यही रहा कि दिनकर की विरासत पुस्तकों में बंद रखने के लिए नहीं, बल्कि समाज के भीतर जीवित रखने के लिए है।

उनकी कविता की लौ तभी सार्थक होगी, जब वह शब्दों से निकलकर सामाजिक संवेदना, राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी और जरूरतमंदों की सेवा में दिखाई दे।

बी. के. झा, एन एस के

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