बी के झा
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पटना, 6 अक्टूबर
बिहार की राजनीति में रिश्ते सिर्फ व्यक्तिगत नहीं होते, उनके पीछे सत्ता, संगठन और चुनावी गणित भी चलता है। यही वजह है कि मोकामा विधायक अनंत सिंह और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह की दोस्ती आज JDU के भीतर एक बड़े राजनीतिक संकेत के तौर पर देखी जा रही है।
एक समय दोनों के बीच राजनीतिक दूरी थी। 2019 में मुंगेर लोकसभा चुनाव में ललन सिंह JDU के उम्मीदवार थे, जबकि अनंत सिंह महागठबंधन के साथ थे और उनकी पत्नी नीलम देवी कांग्रेस के टिकट पर ललन सिंह के सामने चुनाव मैदान में थीं।
समय बदला, राजनीतिक समीकरण बदले और दोनों के बीच की दूरी धीरे-धीरे नजदीकी में बदल गई।आज स्थिति यह है कि अनंत सिंह और JDU के वरिष्ठ नेता नीरज कुमार के बीच टकराव के समय ललन सिंह ने जिस तरह अनंत का पक्ष रखा है, उसने पार्टी के भीतर नई बहस छेड़ दी है।
और यह पहली बार नहीं है।2025 में जब अनंत जेल गए, ललन सिंह ने संभाली मोकामा की कमान
2025 के विधानसभा चुनाव में मोकामा की राजनीति अचानक हिंसक विवाद में घिर गई।
जन सुराज समर्थक दुलारचंद यादव की हत्या के बाद अनंत सिंह समेत कई लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ और अनंत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया।चुनाव सिर पर था और JDU प्रत्याशी जेल में।यहीं ललन सिंह का राजनीतिक रोल बदलकर सामने आया।उन्होंने मोकामा में खुद चुनाव प्रचार की कमान संभाली।
उनके साथ उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी रोड शो में उतरे। ललन सिंह ने कार्यकर्ताओं से कहा कि अनंत सिंह के जेल में होने की स्थिति में हर व्यक्ति को खुद को अनंत सिंह मानकर चुनाव लड़ना होगा।यह सिर्फ चुनावी औपचारिकता नहीं थी।एक केंद्रीय मंत्री का किसी जेल में बंद प्रत्याशी के लिए इस स्तर पर मैदान में उतरना बताता था कि JDU और NDA के लिए मोकामा कितना महत्वपूर्ण था—और ललन सिंह के लिए अनंत सिंह कितने महत्वपूर्ण।
‘अनंत बाबू—एक संबोधन, जिसके राजनीतिक अर्थ दूर तक जाते हैं
राजनीति में शब्द छोटे होते हैं, लेकिन उनके संकेत बड़े।
ललन सिंह का अनंत सिंह को सार्वजनिक रूप से ‘अनंत बाबू’ कहना उनके रिश्ते की गर्माहट को दिखाता है। लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है वह राजनीतिक संरक्षण, जो पिछले एक साल में कई मौकों पर दिखाई दिया।2025 में जब विरोधी अनंत सिंह को लेकर हमलावर थे, तब ललन सिंह ने मोकामा में उनके पक्ष में मोर्चा संभाला। उन्होंने हत्याकांड को साजिश बताए जाने की बात कही और निष्पक्ष जांच की बात भी रखी।
यहां एक बात स्पष्ट रखना जरूरी है—दुलारचंद यादव हत्याकांड में लगे आरोपों और जांच को अदालत तथा जांच एजेंसी की प्रक्रिया से ही तय किया जाना है। राजनीतिक बयान किसी आरोप को अपराध सिद्ध नहीं करते।लेकिन राजनीति में सवाल यह था कि अनंत के सबसे कठिन चुनावी वक्त में उनके साथ कौन खड़ा हुआ?
जवाब था—ललन सिंह।
अब 2026 में फिर वही कहानी, लेकिन इस बार लड़ाई घर के भीतर है
2026 का विवाद 2025 से बिल्कुल अलग है।
इस बार सामने विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी का उम्मीदवार है।
पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से JDU ने नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया है।
दूसरी ओर अनंत सिंह ने नीरज के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया और जन सुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह को समर्थन देने का ऐलान किया।अनंत सिंह ने साफ कहा कि वह नीरज के लिए वोट नहीं मांगेंगे।उन्होंने अपने विरोध को व्यक्तिगत बताया और नीतीश कुमार के प्रति व्यक्तिगत सम्मान की बात भी कही।
यानी उनके संदेश में एक दिलचस्प विभाजन दिखाई देता है—नीतीश से रिश्ता अलग और नीरज से राजनीतिक टकराव अलग।
यही वह बिंदु है जहां ललन सिंह की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
ललन सिंह ने कहा—‘ताली एक हाथ से नहीं बजती’
5 अक्टूबर को ललन सिंह ने अनंत सिंह से बातचीत की। इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि अनंत की नाराजगी के पीछे शिकायतें हैं और ‘ताली एक हाथ से नहीं बजती।’ उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई कार्रवाई होती है तो उसकी प्रतिक्रिया भी होती है।ललन सिंह का यह बयान साधारण बयान नहीं माना जा सकता।
क्यों?
क्योंकि उन्होंने अनंत सिंह की नाराजगी को सिर्फ व्यक्तिगत गुस्सा बताकर खारिज नहीं किया, बल्कि JDU की ओर से हुई ‘चूक’ की ओर भी संकेत किया।यह पार्टी के भीतर असंतोष को स्वीकार करने जैसा राजनीतिक संदेश है।
ललन का सवाल असल में किस पर है?
अनंत सिंह का आरोप है कि विधानसभा चुनाव में उनके खिलाफ दुष्प्रचार किया गया और पार्टी ने उस समय उनके पक्ष में पर्याप्त कदम नहीं उठाया। ललन सिंह ने भी कहा कि जब अनंत ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन किया और बाद में नीतीश के कहने पर चुनाव मैदान में उतरे, तब उनके खिलाफ प्रचार हुआ।यही वह बिंदु है जिसे राजनीतिक विश्लेषक गंभीरता से देख रहे हैं।अगर किसी नेता को चुनाव के समय पार्टी का सिपाही माना जाए, लेकिन चुनाव के बाद उसके आरोपों और शिकायतों को पर्याप्त महत्व न मिले, तो क्या उसके भीतर असंतोष पैदा नहीं होगा?
ललन सिंह का संदेश शायद यही है—पार्टी में अनुशासन जरूरी है, लेकिन संगठन के भीतर पैदा हुई नाराजगी के कारणों को भी समझना होगा।
नीरज कुमार का जवाब—‘पावर सेंटर सिर्फ नीतीश कुमार’
दूसरी तरफ नीरज कुमार ने भी अपना राजनीतिक संदेश साफ कर दिया है।जब उनसे पूछा गया कि पार्टी के भीतर एक ताकत उनके खिलाफ अलग राह पर चल रही है, तो उन्होंने कहा कि पार्टी में एक ही शक्ति है और वह नीतीश कुमार हैं। उन्होंने पार्टी और गठबंधन को बड़ा बताते हुए अपनी लड़ाई को संगठन के नेतृत्व के भरोसे रखा।
यानी तस्वीर अब कुछ ऐसी बनती दिखाई दे रही है—एक तरफ अनंत सिंह।
दूसरी तरफ नीरज कुमार।
बीच में पार्टी का संगठन।और पूरे विवाद के ऊपर नीतीश कुमार का नेतृत्व।लेकिन इसी फ्रेम में ललन सिंह की भूमिका सबसे ज्यादा चर्चा पैदा कर रही है।
क्या ललन सिंह अनंत के ‘राजनीतिक संरक्षक’ बन गए हैं?
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इसे लेकर दो तरह की व्याख्या है।एक वर्ग मानता है कि ललन सिंह मोकामा की जमीनी राजनीति और अनंत सिंह के प्रभाव को अच्छी तरह समझते हैं। इसलिए वे जानते हैं कि अनंत को पूरी तरह अलग-थलग करना JDU के लिए राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है।
दूसरा वर्ग इसे सिर्फ मोकामा का समीकरण नहीं मानता।उसके अनुसार ललन सिंह का संदेश पार्टी के भीतर सम्मान, हिस्सेदारी और पुराने राजनीतिक योगदान की अहमियत से जुड़ा है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि ‘अनंत किसके साथ हैं?
’सवाल यह भी है कि JDU में अनंत जैसे प्रभावशाली क्षेत्रीय नेता को किस तरह साथ रखा जाएगा?
शिक्षाविदों की नजर में—यह सिर्फ व्यक्तियों का संघर्ष नहीं
राजनीति और समाजशास्त्र के जानकारों का मानना है कि क्षेत्रीय राजनीति में ऐसे नेताओं का महत्व केवल उनके पद से तय नहीं होता। किसी नेता का स्थानीय सामाजिक नेटवर्क, व्यक्तिगत प्रभाव, समर्थक वर्ग और चुनावी पकड़ उसे पार्टी के भीतर अलग राजनीतिक वजन देता है।
मोकामा इसका उदाहरण है।
अनंत सिंह लंबे समय से मोकामा की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं और 2025 के चुनाव में भी गिरफ्तारी के बावजूद NDA ने उनका चुनावी मुकाबला जारी रखा। बाद में वे चुनाव जीते भी।इसलिए JDU के लिए प्रश्न यह नहीं है कि अनंत सिंह पार्टी से नाराज हैं या नहीं।बड़ा प्रश्न यह है कि उनकी नाराजगी कितनी दूर तक जाती है और पार्टी उसे किस तरह संभालती है।
–विपक्ष को मिला JDU पर हमला करने का मौका
इस पूरे विवाद ने विपक्ष को भी सरकार और JDU पर निशाना साधने का अवसर दिया है।RJD विधायक भाई वीरेंद्र ने 6 अक्टूबर को दावा किया कि नीतीश कुमार और निशांत कुमार को सतर्क रहने की जरूरत है और आरोप लगाया कि दो लोग JDU को तोड़ना चाहते हैं।
विपक्ष का यह नैरेटिव स्पष्ट है—वह JDU के अंदर के विवाद को नेतृत्व संकट और आंतरिक खींचतान के रूप में पेश करना चाहता है।हालांकि विपक्ष के इन आरोपों को भी राजनीतिक बयान के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
क्योंकि फिलहाल JDU के भीतर कोई औपचारिक टूट सामने नहीं आई है।लेकिन राजनीति में टूट से पहले दरार दिखाई देती है और दरार से पहले असंतोष की आवाज।अनंत सिंह की नाराजगी उसी आवाज की तरह देखी जा रही है।
निशांत कुमार का नीरज के पक्ष में उतरना भी महत्वपूर्ण
इस कहानी में एक और नया राजनीतिक आयाम जुड़ गया है।नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार ने नीरज कुमार के पक्ष में चुनाव प्रचार किया है। इससे एक तरफ नीरज को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के समर्थन का संकेत मिलता है, तो दूसरी तरफ ललन सिंह का अनंत सिंह के साथ संवाद एक अलग शक्ति-संतुलन की तस्वीर पेश करता है।यहीं से JDU का अंदरूनी पावर गेम दिलचस्प हो जाता है।
अनंत के साथ ललन।
नीरज के साथ पार्टी का घोषित उम्मीदवार तंत्र और निशांत।और सबसे ऊपर नीतीश कुमार।
क्या यह महज चुनावी परिस्थिति है या आने वाले समय के लिए JDU के भीतर नए समीकरण बन रहे हैं?
इसका जवाब अभी जल्दबाजी में देना ठीक नहीं होगा।
सबसे बड़ा सवाल—क्या ललन सिंह नीतीश के खिलाफ खड़े हैं?
राजनीतिक रूप से अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।ललन सिंह ने अनंत सिंह की शिकायतों को सुना है, उनका बचाव किया है और उन्हें सार्वजनिक बयानबाजी से रोकने की कोशिश भी की है।
दूसरी ओर उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अनंत की प्रतिक्रिया के पीछे कोई कारण है।इससे ज्यादा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ललन सिंह ने अनंत को नीरज के खिलाफ लगातार सार्वजनिक हमले करने से रोकने की कोशिश की।
अर्थात उनका मौजूदा रोल बगावत का नेतृत्व करने वाले नेता से ज्यादा संकट प्रबंधन करने वाले वरिष्ठ नेता का दिखाई देता है।
राजनीतिक विश्लेषण: ललन सिंह का ‘अनंत कार्ड’ कितना मजबूत?
ललन सिंह जानते हैं कि राजनीति में स्थायी दोस्त और दुश्मन कम होते हैं, स्थायी हित ज्यादा।मोकामा में अनंत सिंह की जमीन है।
JDU को विधानसभा और स्थानीय राजनीति में उस जमीन की जरूरत है।
अनंत सिंह को पार्टी के भीतर सम्मान और राजनीतिक स्पेस चाहिए।
ललन सिंह दोनों के बीच पुल की भूमिका निभाते दिखाई दे रहे हैं।
इसलिए यह दोस्ती केवल व्यक्तिगत संबंध नहीं मानी जा सकती।यह एक राजनीतिक आवश्यकता भी हो सकती है।लेकिन यही समीकरण ललन सिंह के लिए चुनौती भी है।
अगर वे अनंत का बहुत ज्यादा खुलकर साथ देते हैं तो सवाल उठेगा कि क्या पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ एक वरिष्ठ नेता अलग राजनीतिक लाइन बना रहे हैं?
और अगर वे अनंत से पूरी दूरी बना लेते हैं तो मोकामा जैसे क्षेत्र में पार्टी को नुकसान का जोखिम हो सकता है।
यानी ललन सिंह के सामने रास्ता सीधा नहीं, बल्कि बेहद संकरा है।
-‘अनंत बाबू’ की कहानी में अगला अध्याय क्या होगा?
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अनंत सिंह ने नीरज कुमार के खिलाफ अपना मोर्चा खोल दिया था। ललन सिंह ने उनसे बातचीत कर विवाद शांत करने की कोशिश की और उन्हें सार्वजनिक बयानबाजी से बचने के लिए कहा।
JDU अध्यक्ष संजय झा ने भी ललन सिंह की पहल को पार्टी हित में बताया है।लेकिन मूल राजनीतिक सवाल अभी भी जिंदा है—क्या अनंत सिंह और JDU के बीच यह सिर्फ नीरज कुमार को लेकर व्यक्तिगत टकराव है, या पार्टी के भीतर बदलते शक्ति-संतुलन का संकेत?
और उससे भी बड़ा सवाल—आखिर ललन सिंह पिछले एक साल से लगातार अनंत सिंह के साथ क्यों खड़े दिखाई दे रहे हैं?
इसका एक जवाब मोकामा की जमीन देती है।
दूसरा जवाब JDU की संगठनात्मक राजनीति।
तीसरा जवाब दोनों नेताओं के बीच बदले हुए व्यक्तिगत रिश्ते।
और चौथा जवाब शायद आने वाला बिहार का राजनीतिक भविष्य देगा।
क्योंकि राजनीति में किसी नेता का किसी नेता को ‘अनंत बाबू’ कहकर संबोधित करना सिर्फ संबोधन नहीं होता।
कभी-कभी वह बताता है कि संकट के समय कौन किसके साथ खड़ा है।
और पिछले एक साल का रिकॉर्ड यही कहता है—जब अनंत सिंह मुश्किल में पड़े, ललन सिंह ने दूरी बनाने के बजाय उनके करीब जाना चुना।
अब देखना यह है कि यह दोस्ती सिर्फ मोकामा तक सीमित रहती है या JDU के भीतर आने वाले दिनों में एक नए राजनीतिक ध्रुव का आधार बनती है।
