बी के झा
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पटना, 6 अक्टूबर
बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव के परिवार को लेकर कोई भी बयान महज पारिवारिक बयान नहीं रहता। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की अगली राजनीतिक दिशा को लेकर चल रही अटकलों के बीच लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने पहली बार उन चर्चाओं पर अपना रुख साफ करने की कोशिश की है, जिनमें सोशल मीडिया पर उन्हें पार्टी की कमान संभालने की संभावित दावेदार बताया जा रहा था।रोहिणी ने साफ कहा है कि वह फिलहाल राजनीति की कमान संभालने के लिए बिहार नहीं आई हैं। उनका कहना है कि वह अपने पिता लालू प्रसाद यादव और मां की सेवा तथा पिता की सेहत का ख्याल रखने के लिए आई हैं।लेकिन उनके बयान की सबसे दिलचस्प बात यही है कि उन्होंने भविष्य की राजनीति की संभावनाओं को पूरी तरह बंद भी नहीं किया।
‘अभी मैं पापा के लिए आई हूं’, लेकिन भविष्य पर चुप्पी
रोहिणी आचार्य ने कहा कि काफी समय से बिहार आने का कार्यक्रम था, लेकिन समय नहीं मिल पा रहा था। जैसे ही समय मिला, वह अपने पिता के पास आ गईं।उन्होंने कहा कि वह सुबह की सैर से लेकर रात के डिनर तक लालू यादव के साथ रहती हैं और फिलहाल उनका पूरा समय अपने पिता को समर्पित है।
RJD की कमान संभालने की सोशल मीडिया पर चल रही चर्चा पर उनका जवाब था कि ऐसी कोई बात नहीं है। उन्होंने कहा कि लोग बोलने के लिए कुछ भी बोलते हैं।लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या वह भविष्य में राजनीति में आएंगी, तो उन्होंने इसे स्पष्ट रूप से खारिज नहीं किया। उनका कहना था कि अभी लंबी उम्र है और आगे क्या होगा, यह वह कैसे बता सकती हैं।
फिलहाल वह क्या कर रही हैं, इतना जरूर बता सकती हैं कि वह माता-पिता की सेवा के लिए आई हैं।यही वाक्य बिहार की राजनीति में नई चर्चा का आधार बन गया है।
सियासत से दूरी या भविष्य के लिए दरवाजा खुला?
रोहिणी का बयान एक साथ दो संदेश देता है।
पहला—फिलहाल उनकी प्राथमिकता राजनीति नहीं, परिवार है।
दूसरा—भविष्य की राजनीति की संभावना पर उन्होंने कोई अंतिम दरवाजा बंद नहीं किया।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, किसी बड़े राजनीतिक परिवार में नेतृत्व को लेकर चल रही चर्चा को केवल बयान के आधार पर खारिज करना मुश्किल होता है। खासकर तब, जब संबंधित व्यक्ति सार्वजनिक जीवन, सोशल मीडिया और राजनीतिक मुद्दों पर लगातार अपनी राय रखता रहा हो।एक राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार, रोहिणी फिलहाल सक्रिय संगठनात्मक भूमिका से दूरी की बात कर रही हैं, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। लालू परिवार की राजनीति में उनकी मौजूदगी पहले से ही एक अलग पहचान रखती है।
RJD के लिए असली सवाल—अगला शक्ति केंद्र कौन?
RJD के सामने मौजूदा समय में सबसे बड़ा सवाल केवल चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि नेतृत्व की अगली पीढ़ी को लेकर स्पष्टता का भी है।तेजस्वी यादव पार्टी के सबसे प्रमुख राजनीतिक चेहरे हैं। ऐसे में रोहिणी आचार्य के सक्रिय राजनीति में आने की चर्चा स्वाभाविक रूप से पार्टी के भीतर शक्ति-संतुलन और परिवार की भूमिका से जोड़कर देखी जा रही है।
हालांकि रोहिणी ने खुद इस चर्चा को खारिज किया है। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगा कि वह RJD में किसी औपचारिक पद या नेतृत्व की भूमिका की तैयारी कर रही हैं।लेकिन राजनीति में संकेतों की अपनी भाषा होती है।
रोहिणी का सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना, पार्टी और बिहार से जुड़े मुद्दों पर प्रतिक्रिया देना तथा हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों पर मुखर होना उन्हें लालू परिवार की सार्वजनिक राजनीतिक आवाजों में से एक जरूर बनाता है।
‘सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना गलत नहीं’—बयान में छिपा राजनीतिक संदेश
रोहिणी ने कहा कि सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना गलत नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत से दूर रहने वाला कोई भी भारतीय अपने देश और परिवार के लिए चिंतित रहेगा।उन्होंने यह भी कहा कि वह चाहती हैं कि बिहार विकसित हो।यहां उनका बयान पारिवारिक दायरे से निकलकर सीधे बिहार के विकास के सवाल तक पहुंच जाता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल वह राजनीतिक टिप्पणी नहीं करना चाहतीं और राजनीति पर बात करने का समय आने पर आराम से बात करेंगी।
यानी रोहिणी ने राजनीति से फिलहाल दूरी जरूर बनाई है, लेकिन राजनीतिक मुद्दों से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई।
दिल्ली के प्रदर्शन को ‘100% समर्थन’ क्यों महत्वपूर्ण?
रोहिणी ने दिल्ली में चल रहे प्रदर्शन को अपना 100 फीसदी समर्थन दिया है।यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह एक तरफ कह रही हैं कि अभी वह राजनीतिक टिप्पणी नहीं करना चाहतीं, वहीं दूसरी तरफ एक चल रहे राजनीतिक प्रदर्शन को खुला समर्थन भी दे रही हैं।राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इससे यह संकेत मिलता है कि रोहिणी की सार्वजनिक राजनीतिक सक्रियता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। वह फिलहाल किसी औपचारिक पार्टी पद से दूरी बना सकती हैं, लेकिन मुद्दों पर अपनी राय रखने से पीछे नहीं हट रही हैं।
BJP-JDU के लिए नया राजनीतिक नैरेटिव?
रोहिणी के बयान के बाद BJP और JDU के सामने भी राजनीतिक प्रतिक्रिया का अवसर बनता है। हालांकि इस बातचीत के आधार पर दोनों दलों की कोई ताजा आधिकारिक प्रतिक्रिया उद्धृत नहीं की जा सकती।सत्ता पक्ष की संभावित राजनीतिक लाइन यह हो सकती है कि RJD अभी भी परिवार-केंद्रित राजनीति से बाहर निकलने के सवाल का सामना कर रही है।
वहीं JDU की ओर से भी यह सवाल उठाया जा सकता है कि लालू परिवार में राजनीतिक भूमिका और संगठनात्मक नेतृत्व का निर्धारण आखिर किस आधार पर होगा।लेकिन विपक्ष की ओर से इसका जवाब भी उतना ही स्पष्ट हो सकता है कि किसी व्यक्ति का राजनीतिक परिवार से होना अपने आप में लोकतांत्रिक अपराध नहीं है और अंतिम फैसला जनता तथा पार्टी के कार्यकर्ताओं का होता है।
इसलिए BJP-JDU बनाम RJD की यह बहस आने वाले दिनों में ‘परिवारवाद बनाम राजनीतिक विरासत’ के पुराने मुद्दे को फिर हवा दे सकती है।
शिक्षाविदों की नजर में परिवार और राजनीति का यह मेल
राजनीतिक शिक्षाविदों के मुताबिक, भारतीय राजनीति में राजनीतिक परिवारों की भूमिका नई नहीं है। सवाल यह नहीं है कि किसी नेता का परिवार राजनीति में क्यों है, बल्कि सवाल यह है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व का चयन कितना लोकतांत्रिक, पारदर्शी और संगठनात्मक रूप से स्वीकार्य है।रोहिणी के मामले में भी असली कसौटी यही होगी कि अगर वह भविष्य में सक्रिय राजनीति में आती हैं, तो उन्हें केवल लालू परिवार की सदस्य के रूप में नहीं बल्कि अपने राजनीतिक दृष्टिकोण, संगठनात्मक क्षमता और जनता के बीच स्वीकार्यता के आधार पर खुद को स्थापित करना होगा।
यही अंतर राजनीतिक विरासत और राजनीतिक नेतृत्व के बीच की रेखा तय करेगा।
पहले RJD की उम्मीदवार सूची पर उठाए थे गंभीर सवाल
रोहिणी आचार्य इससे पहले RJD की छह प्रत्याशियों की सूची सामने आने के बाद भी चर्चा में आई थीं। उस दौरान उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी और गंभीर आरोप लगाए थे।उनके बयानों ने यह सवाल खड़ा किया था कि क्या लालू परिवार के भीतर भी राजनीतिक फैसलों को लेकर मतभेद मौजूद हैं।अब जब वह कह रही हैं कि फिलहाल उनका पूरा ध्यान अपने माता-पिता की सेवा पर है, तो उनके ताजा बयान को उस पुराने घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में भी देखा जा रहा है।
हालांकि, पुराने विवादों को वर्तमान राजनीतिक भूमिका का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।
लालू के साथ रोहिणी की बॉन्डिंग भी बनी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा
रोहिणी ने अपने पिता के साथ अपने रिश्ते को बेहद भावनात्मक तरीके से सामने रखा। उन्होंने बताया कि वह सुबह की सैर से लेकर डिनर तक लालू यादव के साथ रहती हैं।उनका कहना है कि माता-पिता की सेवा से बड़ी प्राथमिकता उनके जीवन में फिलहाल कुछ नहीं है।यह बयान राजनीतिक रणनीति से ज्यादा पारिवारिक भावनाओं से जुड़ा है। लेकिन लालू यादव जैसे बड़े राजनीतिक चेहरे के परिवार में निजी जीवन और राजनीति की सीमाएं अक्सर एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं।यही वजह है कि रोहिणी की व्यक्तिगत प्राथमिकता भी राजनीतिक विश्लेषण का विषय बन गई है।
फिलहाल कमान तेजस्वी के हाथ, लेकिन सवाल भविष्य का
RJD में मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व का सबसे प्रमुख चेहरा तेजस्वी यादव हैं। ऐसे में रोहिणी के पार्टी की कमान संभालने की चर्चा को तत्काल वास्तविक राजनीतिक बदलाव के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी।
फिर भी उनका बयान तीन महत्वपूर्ण संकेत छोड़ता है—पहला, रोहिणी फिलहाल औपचारिक राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका से इनकार कर रही हैं।
दूसरा, भविष्य में राजनीति में आने की संभावना को उन्होंने पूरी तरह बंद नहीं किया है।
तीसरा, राजनीतिक मुद्दों पर उनकी आवाज और सोशल मीडिया सक्रियता जारी रहने वाली है।इसलिए फिलहाल यह कहानी ‘रोहिणी RJD की कमान संभालेंगी’ से ज्यादा ‘रोहिणी की राजनीतिक भूमिका का भविष्य क्या होगा’ के सवाल की कहानी है।
और बिहार की राजनीति में यह सवाल छोटा नहीं है।क्योंकि लालू यादव की विरासत केवल एक परिवार की विरासत नहीं, बल्कि बिहार के एक बड़े राजनीतिक दौर की विरासत है।
अब देखना यह है कि उस विरासत की अगली तस्वीर सिर्फ तेजस्वी यादव के इर्द-गिर्द बनेगी या लालू परिवार की अगली पीढ़ी में रोहिणी आचार्य भी आने वाले समय में अपनी अलग राजनीतिक भूमिका तलाशेंगी।
बी. के. झा
एनएसके राजनीतिक विश्लेषण
