मध्य प्रदेश के नर्सिंग रजिस्ट्रेशन पोर्टल की ‘जांच व्यवस्था’ पर बड़ा सवाल; गधा बना ‘नर्स’, ऑनलाइन सिस्टम ने जारी कर दिया सर्टिफिकेट! नाम ‘डंकी’, पिता ‘डंकी फादर’ और जाति ‘एनिमल’

बी के झा

NSK news Ind

भोपाल, 30 सितंबर

मध्य प्रदेश में नर्सिंग रजिस्ट्रेशन की ऑनलाइन व्यवस्था ने ऐसा कारनामा सामने ला दिया है, जिसने सरकारी डिजिटल सिस्टम की जांच-पड़ताल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला इतना चौंकाने वाला है कि पहली नजर में इसे मजाक समझना मुश्किल है—एक गधे के नाम से नर्सिंग रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट जारी होने का दावा किया गया है।

मध्य प्रदेश नर्सेस रजिस्ट्रेशन काउंसिल (MPNRC) के ऑनलाइन पोर्टल की कार्यप्रणाली को परखने के लिए NSUI के प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार ने कथित तौर पर एक टेस्ट आवेदन किया। आवेदन में इंसान की जगह गधे की तस्वीर लगाई गई और नाम से लेकर माता-पिता, जाति, शैक्षणिक योग्यता तथा पते तक की जानकारी मनगढ़ंत भरी गई।इसके बावजूद आवेदन आगे बढ़ गया और दावा है कि 2,050 रुपये शुल्क जमा करने के कुछ ही मिनट बाद ऑनलाइन नर्सिंग रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट भी जारी हो गया।

फोटो गधे की, नाम ‘डंकी’… फिर भी सिस्टम ने नहीं पूछा सवाल!

टेस्ट आवेदन में आवेदक का नाम ‘डंकी’ लिखा गया। फोटो के स्थान पर गधे की तस्वीर अपलोड की गई। पिता के नाम वाले कॉलम में लिखा गया—‘डंकी फादर’, जबकि माता के नाम में ‘डंकी मदर’ दर्ज किया गया।जाति के कॉलम में ‘एनिमल’ लिख दिया गया। पता भी कथित तौर पर गलत दर्ज किया गया। इतना ही नहीं, शैक्षणिक योग्यता के नाम पर 10वीं और 12वीं के अंक तथा रोल नंबर भी मनमाने तरीके से भरे गए।

ट्रेनिंग सेंटर के तौर पर भोपाल नर्सिंग कॉलेज और भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (BMHRC) जैसी संस्थाओं की जानकारी दर्ज की गई।

सवाल यह है कि इतनी सारी असामान्य और स्पष्ट रूप से संदिग्ध जानकारियों के बावजूद ऑनलाइन सिस्टम ने आवेदन को रोकने के बजाय उसे आगे कैसे बढ़ा दिया?

2,050 रुपये और कुछ मिनट में ‘नर्सिंग’ प्रमाणपत्र?

रवि परमार का दावा है कि टेस्ट आवेदन के लिए 2,050 रुपये का शुल्क ऑनलाइन जमा किया गया और इसके कुछ ही मिनटों बाद नर्सिंग रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट जारी हो गया। यदि यह दावा और उपलब्ध प्रमाण आधिकारिक जांच में सही पाए जाते हैं, तो मामला महज किसी वेबसाइट की तकनीकी गड़बड़ी तक सीमित नहीं रहेगा। यह सवाल भी उठेगा कि नर्सिंग जैसे संवेदनशील पेशे में पंजीकरण से पहले आवेदक की पहचान, शैक्षणिक योग्यता और दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर किया जाता है?

क्योंकि नर्सिंग कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां केवल नाम, फोटो और फीस के आधार पर प्रमाणपत्र जारी कर दिया जाए। यहां सीधे मरीजों की देखभाल और उनकी सुरक्षा का सवाल जुड़ा होता है।

NSUI ने मांगी स्वतंत्र जांच

इस पूरे मामले को सामने लाने वाले रवि परमार ने रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया की तकनीकी और प्रशासनिक जांच की मांग की है। NSUI का कहना है कि जांच से यह स्पष्ट होना चाहिए कि कथित रूप से फर्जी और असंगत जानकारी वाला आवेदन सिस्टम में स्वीकार कैसे हुआ और प्रमाणपत्र जारी होने की प्रक्रिया तक कैसे पहुंचा। संगठन ने यह भी मांग की है कि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए और यदि सिस्टम में गंभीर खामी पाई जाती है तो उसे तत्काल दुरुस्त किया जाए।

‘डिजिटल इंडिया’ की रफ्तार बनाम सत्यापन की व्यवस्था

भारत डिजिटल तकनीक के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। अंतरिक्ष अनुसंधान से लेकर डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सरकारी सेवाओं तक देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन डिजिटल व्यवस्था की असली सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि कोई प्रमाणपत्र कितनी तेजी से ऑनलाइन जारी हो गया।सवाल यह है कि वह प्रमाणपत्र सही व्यक्ति को ही मिला या नहीं?

अगर एक टेस्ट आवेदन में गधे की तस्वीर, ‘डंकी’ नाम, ‘डंकी फादर’, ‘डंकी मदर’ और ‘एनिमल’ जैसी जानकारियां दर्ज होने के बाद भी सिस्टम ने उसे गंभीरता से नहीं पकड़ा, तो यह ऑनलाइन सत्यापन तंत्र के लिए निश्चित रूप से गंभीर सवाल है।

NSK का सवाल:

कहीं सिस्टम ‘आंखों पर पट्टी’ बांधकर तो नहीं चल रहा?

यहां व्यंग्य अपने आप जन्म लेता है।एक तरफ भारत अपने वैज्ञानिकों की उपलब्धियों पर गर्व करता है, चंद्रमा तक पहुंच चुका है और अंतरिक्ष के नए अभियानों की तैयारी कर रहा है। दूसरी तरफ अगर किसी सरकारी ऑनलाइन पोर्टल पर गधे की तस्वीर देखकर भी सिस्टम यह तय नहीं कर पाता कि आवेदक इंसान है या जानवर, तो डिजिटल व्यवस्था की जमीन पर खड़े सवालों से भी आंख नहीं चुराई जा सकती।

और फिर कल्पना कीजिए—अगर सिस्टम इसी तरह चलता रहा तो कल कोई मजाक में किसी दूसरे ग्रह का पता लिखकर आवेदन कर दे और शुल्क जमा करते ही प्रमाणपत्र भी जारी हो जाए !

तब शायद सवाल यह नहीं होगा कि गधा नर्स कैसे बना?

सवाल यह होगा कि सिस्टम ने सत्यापन करना कब छोड़ा?

NSK का संपादकीय सवाल

यह घटना सच है या किसी तकनीकी प्रक्रिया की ऐसी खामी है जिसे अब बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है—इसका अंतिम फैसला आधिकारिक जांच के बाद ही होना चाहिए। लेकिन यदि टेस्ट आवेदन और प्रमाणपत्र जारी होने का दावा दस्तावेजों के साथ सत्यापित होता है, तो मध्य प्रदेश नर्सेस रजिस्ट्रेशन काउंसिल को केवल सफाई देने के बजाय यह बताना होगा कि उसके डिजिटल सिस्टम में वास्तविक आवेदक की पहचान और योग्यता की जांच का सुरक्षा कवच आखिर कहां था?

क्योंकि नर्सिंग प्रमाणपत्र कोई ऑनलाइन कूपन नहीं है कि जानकारी कुछ भी भरो और प्रमाणपत्र स्क्रीन पर हाजिर हो जाए।

डिजिटल व्यवस्था की असली परीक्षा उसकी रफ्तार नहीं, उसकी विश्वसनीयता है।

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