दिल्ली भी कश्मीर बन गई!’ CJP प्रदर्शन पर उमर-महबूबा का केंद्र पर हमला, अनुच्छेद 370 के बाद की पाबंदियों से की तुलना; फारूक अब्दुल्ला बोले—मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की जरूरत, सुरक्षा बनाम नागरिक अधिकारों की बहस फिर तेज

बी. के. झा

NSK news Ind

नई दिल्ली/श्रीनगर , 11 अक्टूबर

राजधानी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन पर की गई सुरक्षा व्यवस्था अब राजनीतिक विवाद का बड़ा मुद्दा बन गई है। जंतर-मंतर की ओर प्रस्तावित मार्च से पहले इंटरनेट सेवाओं पर अस्थायी रोक, भारी बैरिकेडिंग और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की कार्रवाई ने जम्मू-कश्मीर के प्रमुख विपक्षी नेताओं को केंद्र सरकार पर हमला बोलने का मौका दे दिया है।

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने दिल्ली में लगाए गए प्रतिबंधों की तुलना अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी किए जाने के बाद कश्मीर में लागू पाबंदियों से की। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने भी विरोध की आवाज को दबाने और विपक्ष को अपनी चिंताएं उठाने से रोकने पर सवाल खड़े किए।इस घटनाक्रम ने एक बार फिर लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की सरकार की जिम्मेदारी और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन की बहस को केंद्र में ला दिया है।

सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि दिल्ली में सुरक्षा के कितने इंतजाम किए गए, बल्कि यह भी है कि ऐसे प्रतिबंधों की आवश्यकता, अवधि और अनुपातिकता का आकलन किस आधार पर किया जाना चाहिए।

उमर अब्दुल्ला का तंज—‘नए जम्मू-कश्मीर वाली दिल्ली में स्वागत

’जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने दिल्ली में CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले लगाए गए प्रतिबंधों पर कटाक्ष किया। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कश्मीर मॉडल अब दिल्ली में लागू होता दिखाई दे रहा है और नए जम्मू-कश्मीर की तर्ज पर बनी नई दिल्ली में लोगों का स्वागत है।उमर अब्दुल्ला की यह टिप्पणी मध्य दिल्ली में जंतर-मंतर के आसपास मोबाइल इंटरनेट सेवाओं के अस्थायी निलंबन और व्यापक सुरक्षा इंतजामों के संदर्भ में आई। प्रशासन ने प्रदर्शन के दौरान संभावित कानून-व्यवस्था संबंधी समस्याओं को रोकने के लिए ये कदम उठाए थे।उमर का तंज राजनीतिक रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी किए जाने के बाद लगाए गए प्रतिबंध लंबे समय तक राष्ट्रीय बहस का विषय रहे। उस दौरान संचार सेवाओं पर रोक, आवाजाही संबंधी पाबंदियों और राजनीतिक नेताओं की हिरासत को लेकर सरकार तथा विपक्ष के बीच तीखा विवाद हुआ था।

अब दिल्ली में प्रदर्शन से पहले उठाए गए कदमों को उसी अनुभव से जोड़कर उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार की नीति पर सवाल उठाया है। हालांकि, दिल्ली में लागू किए गए सीमित अवधि के प्रतिबंधों और 2019 में जम्मू-कश्मीर में लागू व्यापक पाबंदियों की परिस्थितियां पूरी तरह समान थीं या नहीं, इसका आकलन दोनों मामलों के आदेशों, अवधि और परिस्थितियों की तुलना करके ही किया जा सकता है।

महबूबा मुफ्ती ने 2019 की याद दिलाई

पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने भी दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था और संचार प्रतिबंधों पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने एक्स पर अपनी टिप्पणी में कहा कि आज की दिल्ली उन्हें अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के बाद कश्मीर में बने हालात की याद दिलाती है।महबूबा के अनुसार, अगस्त 2019 में लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाए गए, इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं और पूरे क्षेत्र में व्यापक सुरक्षा व्यवस्था लागू की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय भी विरोध की संभावनाओं को सीमित करने के बाद यह दावा किया गया कि लोगों ने प्रदर्शन नहीं किया।महबूबा ने आशंका जताई कि दिल्ली में भी प्रदर्शन को रोकने के बाद सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान यह कह सकता है कि कोई विरोध हुआ ही नहीं।

उनकी टिप्पणी का मूल राजनीतिक संदेश यह है कि विरोध प्रदर्शन को रोक देना और असहमति का समाप्त हो जाना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी सार्वजनिक आंदोलन की वास्तविक स्थिति समझने के लिए केवल सड़कों पर दिखाई देने वाली भीड़ नहीं, बल्कि उसके पीछे उठाए जा रहे सवालों और प्रशासन की प्रतिक्रिया को भी देखना आवश्यक है।

हालांकि, महबूबा की तुलना एक राजनीतिक आलोचना है। दिल्ली की कार्रवाई और कश्मीर के 2019 वाले घटनाक्रम के बीच समानता की सीमा का निर्णय संबंधित तथ्यों और कानूनी परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।

फारूक अब्दुल्ला बोले—विपक्ष को कमजोर करना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं

नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने भी दिल्ली में प्रदर्शन से निपटने के तरीके पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विपक्षी आवाजों को दबाना और लोगों को अपनी जायज चिंताएं उठाने से वंचित करना लोकतंत्र की भावना को कमजोर करता है।फारूक अब्दुल्ला के मुताबिक, सुशासन और प्रभावी प्रशासन के लिए मजबूत, सक्रिय तथा सशक्त विपक्ष आवश्यक है। विपक्ष जनता की शिकायतों को सामने लाता है और सरकार को जवाबदेह बनाने में भूमिका निभाता है।यह तर्क लोकतांत्रिक व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत की ओर ध्यान दिलाता है।

चुनाव के बाद सरकार को प्रशासन चलाने का अधिकार मिलता है, लेकिन लोकतंत्र में असहमति, आलोचना और शांतिपूर्ण विरोध की जगह भी बनी रहनी चाहिए।दूसरी ओर, किसी भी प्रदर्शन के दौरान हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका को प्रशासन नजरअंदाज नहीं कर सकता। इसलिए वास्तविक प्रश्न यह है कि सुरक्षा संबंधी उपाय जरूरी सीमा तक ही लागू किए गए या नहीं और क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकारों को पर्याप्त संरक्षण मिला।

आखिर CJP प्रदर्शन को लेकर दिल्ली में क्या हुआ?

CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया था। आंदोलन का संबंध मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों से है।प्रदर्शन से पहले दिल्ली के मध्यवर्ती इलाकों में सुरक्षा बढ़ाई गई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जंतर-मंतर और जनपथ-कर्तव्य पथ चौराहे के आसपास निर्धारित क्षेत्र में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं अस्थायी रूप से निलंबित की गईं। पुलिस ने बैरिकेडिंग और अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती भी की।प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आईं।

CJP के प्रमुख नेता अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरभ दास भी पुलिस कार्रवाई के दायरे में आए। बाद में तीनों को शांति बनाए रखने से संबंधित कानूनी औपचारिकताओं के बाद रिहा किया गया।पुलिस की ओर से सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की जरूरतों को कार्रवाई का आधार बताया गया।

वहीं प्रदर्शनकारियों और विपक्षी नेताओं ने इन कदमों को विरोध की आवाज सीमित करने की कोशिश के रूप में देखा।यहां दो प्रश्न अलग-अलग हैं।

पहला, क्या प्रशासन के पास प्रतिबंध लगाने के लिए पर्याप्त और कानूनी आधार था?

दूसरा, क्या उठाए गए कदम आवश्यक और अनुपातिक थे?

इनका जवाब केवल राजनीतिक बयानों से नहीं, बल्कि संबंधित आदेशों, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों से निकलेगा।

केंद्र सरकार की दलील और विपक्ष के आरोप—दोनों की जांच जरूरी

प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बढ़ाने के पीछे प्रशासन का घोषित उद्देश्य सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और संभावित अव्यवस्था को रोकना था। किसी भी बड़े प्रदर्शन में यातायात, आपातकालीन सेवाओं और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी होती है।लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार असीमित नहीं है। यदि इंटरनेट सेवाओं को बंद किया जाता है या लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाया जाता है, तो ऐसे कदमों के लिए कानूनी आधार, स्पष्ट उद्देश्य और आवश्यक अवधि का होना महत्वपूर्ण है।

विपक्ष का आरोप है कि प्रतिबंधों और हिरासत की कार्रवाई ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को प्रभावित किया। दूसरी ओर, प्रशासन की दलील है कि सुरक्षा संबंधी कदम संभावित अव्यवस्था को रोकने के लिए उठाए गए।इन दोनों दावों का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए यह देखना जरूरी है कि प्रदर्शन की अनुमति की स्थिति क्या थी, निषेधाज्ञा किस आधार पर लागू की गई, इंटरनेट निलंबन का आदेश किस क्षेत्र और अवधि के लिए था तथा हिरासत में लिए गए लोगों के साथ कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि सुरक्षा का तर्क अपने आप में हर प्रतिबंध को उचित नहीं बना देता, और विरोध के अधिकार का हवाला देना भी हिंसा या कानून के उल्लंघन को स्वतः वैध नहीं बनाता। लोकतांत्रिक शासन की कसौटी इन दोनों के बीच उचित संतुलन स्थापित करना है।

कानूनविदों के नजरिये से इंटरनेट बंदी और विरोध का अधिकार

भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने का अधिकार देता है। हालांकि, इन अधिकारों पर संविधान में निर्धारित शर्तों के तहत उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।सुप्रीम कोर्ट ने अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले में जनवरी 2020 के फैसले में इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक संरक्षण और इंटरनेट सेवाओं के निलंबन से संबंधित महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट किए थे। अदालत ने कहा था कि इंटरनेट निलंबन के आदेश अनिश्चितकालीन नहीं हो सकते और प्रतिबंधों को आवश्यकता तथा अनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।

ऐसे आदेश न्यायिक समीक्षा के अधीन भी होते हैं।इस फैसले का व्यापक महत्व यह है कि सार्वजनिक सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन केवल प्रशासनिक विवेक पर नहीं छोड़ा जा सकता; प्रतिबंधों को लागू कानून और संवैधानिक मानकों के अनुरूप होना चाहिए।

दिल्ली में CJP प्रदर्शन के दौरान लागू आदेशों की वैधता का निष्कर्ष निकालने के लिए उनके वास्तविक पाठ और परिस्थितियों का अध्ययन जरूरी होगा। केवल यह तथ्य कि इंटरनेट बंद किया गया, अपने आप में आदेश को वैध या अवैध साबित नहीं करता।

शिक्षाविदों और सामाजिक संस्थाओं के लिए भी अहम सवाल

इस घटनाक्रम का असर राजनीति से आगे नागरिक जीवन और लोकतांत्रिक शिक्षा पर भी पड़ता है। शिक्षाविदों के दृष्टिकोण से शांतिपूर्ण विरोध, असहमति का सम्मान और संवैधानिक अधिकारों की जानकारी लोकतांत्रिक समाज के महत्वपूर्ण तत्व हैं।

सामाजिक संस्थाओं और नागरिक अधिकार समूहों के लिए यह देखना जरूरी है कि प्रदर्शन के दौरान आम नागरिकों, विद्यार्थियों, पत्रकारों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ा। यदि किसी व्यक्ति को अनुचित रूप से हिरासत में लिया गया हो या कानूनी प्रक्रिया का पालन न हुआ हो, तो शिकायत और न्यायिक समीक्षा के रास्ते उपलब्ध रहने चाहिए। चर्चा संवैधानिक सिद्धांतों और सार्वजनिक जवाबदेही के आधार पर की जानी चाहिए।

अनुच्छेद 370 की बहस फिर केंद्र में क्यों?

अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी किए जाने और राज्य के पुनर्गठन के बाद सुरक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, नागरिक स्वतंत्रताओं और केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर लगातार बहस होती रही है।केंद्र सरकार ने उस फैसले को राष्ट्रीय एकीकरण और विकास से जोड़कर प्रस्तुत किया था।

वहीं, जम्मू-कश्मीर के कई क्षेत्रीय नेताओं ने इसके तरीके, राजनीतिक परिणामों और उस दौरान लगाए गए प्रतिबंधों की आलोचना की।

CJP प्रदर्शन के दौरान दिल्ली में लागू पाबंदियों की तुलना उसी दौर से करना उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी है। इसके माध्यम से वे राष्ट्रीय राजधानी में हुई कार्रवाई को जम्मू-कश्मीर के अपने अनुभवों से जोड़कर प्रस्तुत कर रहे हैं। लेकिन तुलना का राजनीतिक महत्व और कानूनी समानता दो अलग विषय हैं।

2019 में जम्मू-कश्मीर में लागू प्रतिबंधों की व्यापकता, अवधि और परिस्थितियों को दिल्ली में सीमित अवधि के इंटरनेट निलंबन के साथ बिना तथ्यात्मक जांच के समान नहीं माना जा सकता।

फिर भी इस तुलना से एक बड़ा सवाल सामने आता है: क्या लोकतंत्र में सुरक्षा संबंधी फैसलों की समीक्षा और उनके औचित्य पर खुली बहस के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध है?

निष्कर्ष:

लोकतंत्र की मजबूती असहमति को संभालने में भी है

CJP प्रदर्शन को लेकर उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुल्ला के बयान केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्षी आलोचना का नया अध्याय हैं। तीनों नेताओं ने दिल्ली में लागू प्रतिबंधों को नागरिक स्वतंत्रताओं और लोकतांत्रिक असहमति के व्यापक सवाल से जोड़ते हुए अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं।

दूसरी ओर, प्रशासन की जिम्मेदारी भी स्पष्ट है कि वह सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिक सुरक्षा सुनिश्चित करे। लेकिन यह जिम्मेदारी निभाते समय किसी भी प्रतिबंध की आवश्यकता, अवधि और अनुपातिकता का परीक्षण उतना ही जरूरी है।

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने या सरकार बनाने तक सीमित नहीं है। इसमें नागरिकों को सवाल पूछने, शांतिपूर्ण विरोध करने और सत्ता से जवाब मांगने की जगह भी मिलनी चाहिए। साथ ही, राजनीतिक आंदोलनों को भी शांतिपूर्ण और कानूनसम्मत तरीकों का पालन करना चाहिए।

दिल्ली को कश्मीर से जोड़ने वाले बयान राजनीतिक बहस को तीखा जरूर बनाते हैं, लेकिन इस पूरे विवाद का निर्णायक प्रश्न इससे अधिक बुनियादी है—क्या सुरक्षा व्यवस्था कायम रखते हुए असहमति के संवैधानिक अधिकार को भी पर्याप्त संरक्षण दिया गया?

इस प्रश्न का जवाब राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि तथ्यों, लागू आदेशों और कानून के निष्पक्ष परीक्षण से सामने आना चाहिए।

यही लोकतांत्रिक जवाबदेही की असली कसौटी है।

बी. के. झा, एन एस के

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