बी. के. झा
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नई दिल्ली / ढाका , 11 अक्टूबर
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद अब सरकार और सेना के रिश्तों को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) सरकार और सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमां के बीच कथित तनाव की खबरों ने ढाका के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। सवाल यह है कि क्या निर्वाचित सरकार सेना पर अपना नियंत्रण मजबूत करना चाहती है, या फिर यह पूरा घटनाक्रम सत्ता के भीतर प्रभाव और अधिकारों को लेकर चल रही खींचतान का हिस्सा है?
नॉर्थ ईस्ट न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार के कुछ प्रभावशाली लोगों की ओर से सेना प्रमुख की स्थिति और शक्तियों को सीमित करने की कोशिश किए जाने का दावा किया गया है। इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जनरल वकार-उज-जमां को विदेश मंत्रालय में प्रतिनियुक्ति पर भेजने की योजना पर विचार हुआ था। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि सामने आना अभी बाकी है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को फिलहाल रिपोर्ट में सामने आए दावों और सूत्रों के हवाले से समझना जरूरी है।
विदेश मंत्रालय में भेजने की कथित योजना, फिर पीछे क्यों हटी सरकार?
रिपोर्ट के मुताबिक, 7 अक्टूबर को सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमां को विदेश मंत्रालय में प्रतिनियुक्ति पर भेजने का कदम उठाए जाने की चर्चा सामने आई। उस समय वह ऑस्ट्रेलिया की आधिकारिक यात्रा पर थे और कार्यक्रम के अगले चरण में अमेरिका जाने वाले थे।दावा है कि सेना की कमान-व्यवस्था पर जनरल जमां की मजबूत पकड़ को देखते हुए सरकार ने इस फैसले पर आगे बढ़ने से कदम पीछे खींच लिया। यदि यह विवरण सही साबित होता है, तो मामला केवल किसी वरिष्ठ सैन्य अधिकारी की नियुक्ति या तबादले का नहीं रह जाता, बल्कि सरकार और सेना के बीच अधिकारों की सीमा को लेकर बड़े सवाल खड़े करता है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि कथित योजना किस स्तर पर तैयार हुई थी, किस अधिकारी ने इसे आगे बढ़ाया और इसे रोकने का अंतिम फैसला किसने लिया। इन सवालों के जवाब के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
राष्ट्रपति की पूर्व जनरल से मुलाकात ने बढ़ाई चर्चा
इस घटनाक्रम के बीच राष्ट्रपति मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर की सेवानिवृत्त जनरल नूरुद्दीन खान से मुलाकात भी चर्चा में है। नॉर्थ ईस्ट न्यूज के मुताबिक, राष्ट्रपति ने 9 अक्टूबर को ढाका में खान के आवास पर जाकर उनसे मुलाकात की। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस मुलाकात का उद्देश्य सरकार और सेना प्रमुख के बीच कथित बढ़ती दूरी को कम करने के लिए मध्यस्थता का रास्ता तलाशना था।राष्ट्रपति आलमगीर सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर भी हैं। हालांकि, बांग्लादेश की संसदीय व्यवस्था में वास्तविक कार्यकारी अधिकार प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के पास होते हैं। ऐसे में राष्ट्रपति की भूमिका किसी संभावित टकराव में संवाद का माध्यम बनने तक कितनी प्रभावी हो सकती है, यह राजनीतिक परिस्थितियों और संबंधित पक्षों की सहमति पर निर्भर करेगा।
राष्ट्रपति की मुलाकात का उद्देश्य मध्यस्थता करना ही था, इसकी आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए इसे फिलहाल रिपोर्ट में बताए गए घटनाक्रम के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
कौन हैं नूरुद्दीन खान, जिनका नाम फिर चर्चा में आया?
सेवानिवृत्त जनरल नूरुद्दीन खान को बांग्लादेश की सैन्य और राजनीतिक व्यवस्था का अनुभवी चेहरा माना जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमां उनसे सलाह लेते रहे हैं। जनरल खान का नाम 1990 के दशक में तत्कालीन राष्ट्रपति और सैन्य शासक हुसैन मुहम्मद इरशाद के खिलाफ चले राजनीतिक आंदोलन के अंतिम दौर से भी जुड़ा रहा है।सेना से सेवानिवृत्ति के बाद खान अवामी लीग की राजनीति में शामिल हुए। वह नरसिंगदी से सांसद चुने गए और ऊर्जा तथा खनिज संसाधन मंत्री के पद पर भी रहे।
यानी उनका अनुभव केवल सैन्य प्रतिष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने राजनीतिक सत्ता और प्रशासन के भीतर भी काम किया है।
5 अगस्त 2024 को शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद बने नए राजनीतिक माहौल में अंतरिम सरकार के संभावित नेतृत्व को लेकर जिन नामों की चर्चा हुई, उनमें नूरुद्दीन खान का नाम भी रिपोर्टों में सामने आया था। यही पृष्ठभूमि उन्हें मौजूदा विवाद में एक संभावित मध्यस्थ के रूप में महत्वपूर्ण बनाती है।
बांग्लादेश के लिए यह टकराव इतना संवेदनशील क्यों?
बांग्लादेश की राजनीति में सेना की भूमिका ऐतिहासिक रूप से बेहद संवेदनशील रही है। देश ने सैन्य शासन, राजनीतिक संघर्ष, लोकतांत्रिक आंदोलनों और सत्ता परिवर्तन के कई दौर देखे हैं। अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद बनी नई राजनीतिक व्यवस्था के सामने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने और नागरिक शासन की विश्वसनीयता स्थापित करने की चुनौती रही है।ऐसे माहौल में सेना प्रमुख और निर्वाचित सरकार के बीच किसी भी संभावित टकराव का असर केवल दो संस्थाओं के संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे प्रशासनिक स्थिरता, सुरक्षा व्यवस्था, राजनीतिक भरोसे और देश की लोकतांत्रिक दिशा पर भी सवाल उठ सकते हैं।
एक ओर निर्वाचित सरकार के लिए यह स्वाभाविक है कि वह संविधान और कानून के तहत प्रशासन तथा सुरक्षा संस्थाओं पर नागरिक नियंत्रण सुनिश्चित करे। दूसरी ओर सेना के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े निर्णयों में संस्थागत प्रक्रिया, स्पष्ट नियम और पारदर्शिता भी जरूरी हैं। यदि किसी अधिकारी को हटाने या दूसरी जिम्मेदारी देने की कोशिश राजनीतिक दबाव के तहत होती है, तो वह विवाद का कारण बन सकती है। लेकिन यदि ऐसा कदम विधिसम्मत प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है, तो उसका मूल्यांकन तथ्यों और आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर ही होना चाहिए।
असली परीक्षा: सत्ता का संतुलन या संस्थाओं की टकराहट?
जनरल वकार-उज-जमां की ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका यात्रा की आधिकारिक जानकारी बांग्लादेश की सरकारी समाचार एजेंसी और सैन्य जनसंपर्क विभाग के हवाले से प्रकाशित हुई थी। इसलिए उनकी विदेश यात्रा को अकेले सरकार और सेना के बीच टकराव का प्रमाण नहीं माना जा सकता। विवाद का केंद्र वह कथित योजना है, जिसके तहत उन्हें विदेश मंत्रालय में प्रतिनियुक्ति पर भेजे जाने की बात कही गई है।
अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि सरकार, राष्ट्रपति कार्यालय और सेना मुख्यालय इस मामले पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण देते हैं या नहीं।
क्या राष्ट्रपति की मुलाकात के बाद संवाद का रास्ता खुला है?
क्या सेना प्रमुख की नियुक्ति और भविष्य की भूमिका को लेकर कोई निर्णय लंबित है?
या फिर मीडिया रिपोर्टों में सामने आए दावे वास्तविकता से अधिक व्यापक राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर रहे हैं?
इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन इतना तय है कि बांग्लादेश में नई सत्ता व्यवस्था की स्थिरता का आकलन केवल चुनावी जीत से नहीं, बल्कि इस बात से भी होगा कि सरकार और सेना जैसी शक्तिशाली संस्थाएं संविधान के दायरे में रहते हुए अपने संबंधों को कैसे संचालित करती हैं।
निष्कर्ष:
बांग्लादेश के सामने चुनौती किसी एक नेता या जनरल की ताकत तय करने भर की नहीं है।
असली कसौटी यह है कि देश की संस्थाएं व्यक्तिगत प्रभाव और पर्दे के पीछे की खींचतान से ऊपर उठकर संवैधानिक मर्यादाओं के अनुसार काम करती हैं या नहीं।
यदि सरकार और सेना के बीच तनाव की खबरें सही हैं, तो संवाद और पारदर्शिता ही समाधान का रास्ता हो सकते हैं।
अन्यथा, सत्ता के गलियारों में उठती यह हलचल बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिरता के लिए एक नई परीक्षा बन सकती है।
बी. के. झा, एन एस के
