बी के झा
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ढाका / न ई दिल्ली, 21 अगस्त
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के दो वर्ष बाद अब सबसे बड़ा सवाल लोकतंत्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा बन गया है। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन और मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बने अंतरिम शासन के बाद जिन कट्टरपंथी तत्वों को राहत मिली, वही आज देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए नई चुनौती बनते दिखाई दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के महीनों में सामने आई घटनाएं इस आशंका को मजबूत करती हैं कि बांग्लादेश में उग्रवादी नेटवर्क फिर से सक्रिय हो रहे हैं। ढाका ट्रिब्यून में प्रकाशित विश्लेषण में पत्रकार साबिर मुस्तफा ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए, तो देश एक बार फिर 2000 के दशक जैसी आतंकवादी चुनौती का सामना कर सकता है।
सत्ता बदली, सुरक्षा समीकरण भी बदल गए
जुलाई–अगस्त 2024 के जनविद्रोह के दौरान कई जेलों में हिंसा हुई और अनेक आतंकवादियों के फरार होने की खबरें सामने आईं। बाद में अंतरिम प्रशासन के दौरान कुछ उग्रवादियों की रिहाई ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता और बढ़ा दी।आलोचकों का आरोप है कि इन रिहाइयों को राजनीतिक प्रतिशोध के मामलों के नाम पर उचित ठहराया गया, जबकि सुरक्षा विशेषज्ञ इसे दीर्घकालिक जोखिम मानते रहे।
सावर में छापेमारी ने खोली बड़ी साजिश
12 अगस्त को ढाका के निकट सावर इलाके में पुलिस की छापेमारी में बड़ी मात्रा में विस्फोटक, बम बनाने का सामान और संदिग्ध सामग्री बरामद हुई। अगले ही दिन बम निरोधक दस्ते ने एक शक्तिशाली विस्फोटक को निष्क्रिय किया।
जांच में गिरफ्तार आरोपियों की पहचान नियो-जमातुल मुजाहिदीन बांग्लादेश (Neo-JMB) के सदस्यों के रूप में हुई। इन्हीं पर आतंकवाद निरोधक कानून के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। यह घटना सुरक्षा एजेंसियों के लिए स्पष्ट संकेत मानी जा रही है कि प्रतिबंधित संगठन फिर से संगठित होने की कोशिश कर रहे हैं।
अल-कायदा का बढ़ता प्रभाव
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की हालिया रिपोर्ट में भी चेतावनी दी गई है कि अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) बांग्लादेश में अपने सक्रिय सेल्स के माध्यम से नेटवर्क विस्तार की कोशिश कर रहा है।विश्लेषकों के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी और सावर में Neo-JMB मॉड्यूल के पकड़े जाने की घटनाएं एक-दूसरे से अलग नहीं मानी जा सकतीं। इससे क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा हुई हैं।
‘बोमारू मामून’ केस बना बहस का केंद्र
पुलिस जिस नजमुल हसन उर्फ बोमारू मामून की तलाश कर रही थी, उसे नौ वर्ष पहले बम धमाके के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। हालांकि जनवरी 2026 में अदालत ने उसे 2017 के एक मामले में बरी कर दिया और फैसले में उसे फासीवाद-विरोधी कार्यकर्ता बताया गया।अब उसका नाम फिर से आतंकवाद संबंधी जांच में सामने आने से न्यायिक फैसलों और सुरक्षा मूल्यांकन पर भी बहस तेज हो गई है।
इतिहास दोहराने का डर क्यों?
बांग्लादेश पहले भी कट्टरपंथी हिंसा का दौर देख चुका है। 2001 से 2006 के बीच बीएनपी-जमात गठबंधन सरकार के दौरान जेएमबी और उसका कुख्यात चेहरा बांग्ला भाई पूरे देश में आतंक का पर्याय बन गए थे। सिलसिलेवार बम धमाकों ने बांग्लादेश की कानून-व्यवस्था को हिला दिया था।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि फरार चरमपंथियों की गिरफ्तारी, वित्तीय नेटवर्क पर कार्रवाई और कट्टरपंथी संगठनों की निगरानी में ढिलाई रही, तो वही इतिहास नए रूप में लौट सकता है।
तारिक रहमान सरकार के सामने सबसे बड़ी परीक्षा
अब देश में बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार है और वास्तविक चुनौती उसके सामने है। सवाल यह नहीं कि खतरा मौजूद है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या सरकार उसे स्वीकार कर निर्णायक कार्रवाई करेगी।
बांग्लादेश की स्थिरता केवल उसकी आंतरिक राजनीति का विषय नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न बन चुकी है।
