बी के झा
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पटना, 18 अक्टूबर
बिहार में शिक्षकों की नौकरी और सेवा सुरक्षा का मुद्दा एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हजारों नियोजित शिक्षकों की सेवा पर संकट की आशंका जताते हुए नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। तेजस्वी ने खास तौर पर वर्ष 2015-16 में नियुक्त उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षकों के भविष्य को लेकर चिंता जताई है।
उन्होंने सरकार से सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने और प्रभावित शिक्षकों की सेवा बचाने के लिए प्रभावी कानूनी पैरवी करने की अपील की है। हालांकि, इस मामले में अंतिम स्थिति संबंधित न्यायिक आदेश और सरकार की कानूनी कार्रवाई पर निर्भर करेगी।
तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र को अपने एक्स हैंडल पर भी साझा किया है। उनका कहना है कि जुलाई में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद बिहार में हजारों नियोजित शिक्षकों, विशेषकर वर्ष 2015 के बाद नियुक्त अप्रशिक्षित शिक्षकों की सेवा को लेकर गंभीर अनिश्चितता पैदा हो गई है। इस स्थिति ने वर्ष 2015-16 में बहाल उर्दू एवं बांग्ला विशेष शिक्षकों के बीच भी चिंता और असमंजस बढ़ा दिया है।
नियुक्ति की तारीख के आधार पर सेवा समाप्त करना कितना उचित?
तेजस्वी यादव ने अपने पत्र में तर्क दिया है कि उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षकों का नियोजन किसी बिल्कुल नई प्रक्रिया के तहत नहीं हुआ था। उनकी नियुक्तियां वर्ष 2014 में शुरू हुई नियोजन प्रक्रिया और विभागीय निर्देशों के अनुपालन में की गई थीं। ऐसे में केवल नियुक्ति की तारीख 31 मार्च 2015 के बाद होने के आधार पर इन शिक्षकों को सेवा समाप्ति के दायरे में रखना न्यायसंगत नहीं होगा। तेजस्वी का कहना है कि प्रभावित शिक्षकों में कई ऐसे हैं, जिन्होंने बाद में प्रशिक्षण प्राप्त किया, सक्षमता परीक्षा उत्तीर्ण की और वर्तमान में विशिष्ट शिक्षक, प्रधान शिक्षक अथवा विद्यालयों में अध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ऐसे शिक्षकों के भविष्य का फैसला करते समय उनकी मौजूदा योग्यता, प्रशिक्षण और वर्षों की सेवा को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
इस तर्क के जरिए तेजस्वी ने सरकार के सामने एक अहम सवाल खड़ा किया है—यदि शिक्षक निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत नियुक्त हुए, प्रशिक्षण हासिल किया और आवश्यक परीक्षाएं भी उत्तीर्ण कर लीं, तो उनकी सेवा सुरक्षा के लिए सरकार क्या कदम उठाएगी?
सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका की मांग
नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि सरकार इस मामले में कानूनी विकल्पों पर गंभीरता से विचार करे और जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करे। उन्होंने मांग की है कि डीएलएड प्रशिक्षण, सक्षमता परीक्षा अथवा बीपीएससी के माध्यम से नियुक्त शिक्षकों की योग्यता और सेवा संबंधी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें उचित संरक्षण देने की पहल की जाए।तेजस्वी ने नियोजन से जुड़े अभिलेखों के गायब होने और प्रशासनिक स्तर पर हुई संभावित गड़बड़ियों का मुद्दा भी उठाया है। उनका कहना है कि यदि रिकॉर्ड के रखरखाव में लापरवाही हुई या प्रशासनिक कमियों के कारण शिक्षकों के सामने संकट खड़ा हुआ, तो उसकी जवाबदेही संबंधित अधिकारियों की तय होनी चाहिए।
ऐसी कमियों की सजा उन शिक्षकों को नहीं मिलनी चाहिए, जिन्होंने नियोजन प्रक्रिया के तहत नियुक्त होकर वर्षों तक विद्यालयों में सेवाएं दी हैं।तेजस्वी ने सरकार से अपील की है कि वह इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करे, ताकि हजारों शिक्षकों और उनके परिवारों का भविष्य अनिश्चितता के भंवर में न फंसे।
भाजपा का पलटवार, वोट बैंक की राजनीति का आरोप
शिक्षकों की सेवा सुरक्षा को लेकर तेजस्वी यादव की मांग पर भाजपा की ओर से भी राजनीतिक पलटवार किया गया है। भाजपा नेता ने आरोप लगाया कि मुस्लिम वोट बैंक खिसकने की आशंका के कारण तेजस्वी यादव उर्दू-बांग्ला शिक्षकों के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रहे हैं। भाजपा नेता के मुताबिक, सम्राट चौधरी सरकार किसी खास वर्ग के लिए अलग से विशेष प्रावधान करने के बजाय कानून के अनुरूप ही फैसला करेगी।भाजपा नेता ने तंज कसते हुए कहा कि तेजस्वी यादव की बेचैनी से किसी खास वर्ग को अलग से विशेष सुविधाएं नहीं मिलने वाली हैं। सरकार वही कदम उठाएगी, जो कानून के दायरे में सही होगा।
हालांकि, भाजपा नेता के इस बयान को राजनीतिक आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। शिक्षकों की नियुक्ति, उनकी योग्यता और सेवा सुरक्षा का सवाल केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें न्यायिक आदेशों, नियोजन के दस्तावेजों और लागू सेवा नियमों की अहम भूमिका होगी।
शिक्षकों के भविष्य पर सरकार के रुख की परीक्षा
बिहार में यह मामला अब केवल उर्दू और बांग्ला विशेष शिक्षकों की नियुक्ति तक सीमित नहीं रह गया है। इसके केंद्र में यह बड़ा सवाल है कि नियोजन प्रक्रिया में संभावित प्रशासनिक खामियों का खामियाजा आखिर किसे भुगतना चाहिए और वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए सरकार के पास कौन-से कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं।एक ओर तेजस्वी यादव सेवा सुरक्षा के नाम पर सरकार से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर भाजपा कानून के अनुरूप कार्रवाई की बात कह रही है। ऐसे में निगाहें मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।
अब असली परीक्षा सरकार की है। क्या वह प्रभावित शिक्षकों के मामले में कानूनी राहत के रास्ते तलाशेगी, पुनर्विचार याचिका पर फैसला लेगी और प्रशासनिक खामियों की जवाबदेही तय करेगी, या फिर शिक्षकों को न्यायिक प्रक्रिया के नतीजे का इंतजार करना पड़ेगा?
इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि हजारों शिक्षकों की सेवा और उनके परिवारों के भविष्य को लेकर बनी अनिश्चितता किस दिशा में आगे बढ़ती है।
एनएसके की संपादकीय टिप्पणी:
शिक्षकों की सेवा सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर न्यायिक आदेश, नियुक्ति के अभिलेख और सरकार की कानूनी जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए।
यदि प्रशासनिक चूक हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही जरूरी है। साथ ही, किसी भी शिक्षक को राहत देने या उसकी सेवा जारी रखने का फैसला लागू कानून और न्यायालय के आदेशों के अनुरूप ही होना चाहिए।
