बिना वीटो पावर स्थायी सदस्यता मंजूर नहीं! संयुक्त राष्ट्र में भारत का दोटूक संदेश, टुकड़ों में नहीं, एक साथ हों सुधार, कहा- दुनिया अब 1945 के ढर्रे पर नहीं चलेगी

बी के झा, एनएसके – अंतरराष्ट्रीय डेस्क

NSK news India

न्यूयॉर्क / नई दिल्ली, 27 अक्टूबर

दुनिया बदल चुकी है, वैश्विक शक्ति संतुलन बदल रहा है और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की चुनौतियां भी पहले जैसी नहीं रहीं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की व्यवस्था आज भी काफी हद तक 1945 की वैश्विक परिस्थितियों के आधार पर चल रही है। इसी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के नाम पर किसी देश को दूसरे दर्जे का अधिकार देना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।

भारत ने कहा कि जब तक वीटो की व्यवस्था कायम है, तब तक सभी स्थायी सदस्यों को समान अधिकार मिलने चाहिए। बिना वीटो पावर वाली नई स्थायी सीटें वैश्विक असमानता को खत्म करने के बजाय उसे संस्थागत रूप दे सकती हैं।संयुक्त राष्ट्र महासभा की पूर्ण बैठक में भारत ने सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधारों की जोरदार वकालत की। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने वीटो अधिकार के इस्तेमाल, उसके राजनीतिक प्रभाव और सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना पर गंभीर सवाल उठाए।

भारत का संदेश साफ है—सुरक्षा परिषद में सुधार केवल सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रतिनिधित्व और अधिकारों में समानता भी सुनिश्चित करनी होगी।

वीटो अधिकार: जिम्मेदारी या राजनीतिक हथियार?

भारत ने वीटो पावर के इस्तेमाल को लेकर सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस—की भूमिका पर सवाल उठाए। इन पांच देशों को P5 कहा जाता है। इनके पास सुरक्षा परिषद के महत्वपूर्ण प्रस्तावों को वीटो के जरिए रोकने का विशेषाधिकार है।पर्वतनेनी हरीश ने कहा, “वीटो एक जिम्मेदारी है, न कि संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ साधने का कोई साधन।

” उन्होंने वीटो के इस्तेमाल के रिकॉर्ड का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले साढ़े तीन दशकों से अधिक समय में P5 के दो देशों ने इसका इस्तेमाल नहीं किया, जबकि अधिकांश वीटो या वीटो की धमकियां तीन देशों की ओर से आई हैं।भारत की आपत्ति केवल वीटो के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि जब कुछ देशों को वैश्विक सुरक्षा से जुड़े फैसलों पर विशेषाधिकार हासिल है, तो नई स्थायी सदस्यता पाने वाले देशों को उसी स्तर के अधिकारों से वंचित क्यों रखा जाए? भारत के मुताबिक, ऐसी व्यवस्था सुरक्षा परिषद में असमानता को और मजबूत करेगी।

बिना वीटो वाली स्थायी सीटें क्यों मंजूर नहीं?

सुरक्षा परिषद में सुधार की बहस का एक प्रमुख मुद्दा यह है कि नए स्थायी सदस्यों को किस तरह के अधिकार दिए जाएं। भारत ने स्पष्ट किया कि बिना वीटो अधिकार वाली नई दीर्घकालिक या स्थायी सीटें समानता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं होंगी।

भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि सभी स्थायी सदस्यों को—चाहे वे पुराने हों या नए—समान अधिकार मिलने चाहिए। भारत का तर्क है कि यदि किसी देश को स्थायी सदस्य तो बना दिया जाए, लेकिन उसे पुराने सदस्यों के बराबर अधिकार न दिए जाएं, तो इससे परिषद में दो श्रेणियों के स्थायी सदस्यों की व्यवस्था बन जाएगी।भारत का यह रुख सुरक्षा परिषद में अपनी स्थायी सदस्यता की मांग से भी जुड़ा है।

नई दिल्ली लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र की निर्णय प्रक्रिया में विकासशील देशों और वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप अधिक प्रतिनिधित्व की वकालत करती रही है।

‘टुकड़ों में सुधार’ से नहीं बदलेगी व्यवस्था

भारत ने सुरक्षा परिषद में आंशिक सुधारों के बजाय व्यापक और समग्र बदलाव की मांग की। पर्वतनेनी हरीश के मुताबिक, सुरक्षा परिषद सुधारों से जुड़े सभी पांच पहलुओं पर एक साथ काम किया जाना चाहिए। केवल कुछ मुद्दों पर सहमति बनाकर बाकी विवादों को अनिश्चितकाल तक टालना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।भारत ने स्पष्ट समय-सीमा के साथ दस्तावेज आधारित वार्ता शुरू करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उसका कहना है कि सुधार प्रक्रिया को केवल चर्चाओं और सामान्य सहमति के दायरों में सीमित रखने के बजाय ठोस प्रस्तावों पर आगे बढ़ाना चाहिए।

इस बहस में ‘कॉमन अफ्रीकन पोजीशन’ का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। अफ्रीकी देशों के साझा रुख का समर्थन करते हुए भारत ने कहा कि जब तक वीटो की व्यवस्था मौजूद है, तब तक सभी स्थायी सदस्यों को समान अधिकार मिलने चाहिए। यह मुद्दा केवल भारत की आकांक्षाओं तक सीमित नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की संरचना में व्यापक प्रतिनिधित्व और समानता की मांग से भी जुड़ा है।

‘छिपे हुए वीटो’ पर भी भारत की आपत्ति

भारत ने वीटो अधिकार के प्रत्यक्ष इस्तेमाल के अलावा उन प्रक्रियाओं पर भी सवाल उठाए, जिनके जरिए औपचारिक वीटो के बिना फैसलों को प्रभावित किया जा सकता है।पर्वतनेनी हरीश ने कहा कि आम सहमति के अनलिखे नियम सुरक्षा परिषद के फैसलों और प्रतिबंध समितियों में अघोषित वीटो जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं।

उन्होंने अंतर-सरकारी वार्ताओं (IGN) में आम सहमति की प्रक्रिया का इस्तेमाल छिपे हुए वीटो के रूप में किए जाने पर भी आपत्ति जताई।भारत की चिंता यह है कि यदि किसी प्रस्ताव को औपचारिक रूप से वीटो नहीं किया जाता, लेकिन प्रक्रियागत अड़चनों या आम सहमति की व्याख्या के जरिए उसे आगे बढ़ने से रोक दिया जाता है, तो सुधार की प्रक्रिया अपने उद्देश्य तक नहीं पहुंच पाएगी।

2022 की पहल के बाद भी सवाल कायम

भारत ने 2022 में शुरू की गई वीटो पहल और उसके बाद वीटो के इस्तेमाल के रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया। संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव 76/262 के तहत वीटो इस्तेमाल होने पर महासभा में चर्चा का अवसर मिलता है। इसका उद्देश्य सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के वीटो इस्तेमाल पर व्यापक जवाबदेही और विचार-विमर्श को बढ़ावा देना है।

हालांकि, भारत के मुताबिक, इस व्यवस्था के बाद भी वीटो के इस्तेमाल से जुड़े घटनाक्रम यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या मौजूदा तंत्र वास्तव में परिषद के कामकाज में अपेक्षित बदलाव ला पाया है।भारत का रुख है कि जवाबदेही बढ़ाने वाली पहलें महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे सुरक्षा परिषद की संरचनात्मक असमानता का विकल्प नहीं हो सकतीं। इसके लिए व्यापक संस्थागत सुधार आवश्यक हैं।

1945 की व्यवस्था नहीं, आज की दुनिया का प्रतिनिधित्व करे UNSC

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था की उपज है। लेकिन आज दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। ऐसे में भारत चाहता है कि सुरक्षा परिषद की संरचना वर्तमान अंतरराष्ट्रीय वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करे।भारत की मांग का सार यह है कि सुरक्षा परिषद में सुधार केवल नई सीटें जोड़ने का अभ्यास न बने। प्रतिनिधित्व, अधिकार, जवाबदेही और निर्णय प्रक्रिया में समानता को भी इसका हिस्सा बनाया जाए।

हालांकि, सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन और व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति की जरूरत होती है। इसलिए भारत की मांग को अमली जामा पहनाना आसान नहीं होगा। स्थायी सदस्यों के विशेषाधिकार, नए सदस्यों की संख्या और वीटो के भविष्य जैसे मुद्दों पर देशों के बीच मतभेद इस प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं।इसके बावजूद भारत ने अपनी प्राथमिकता स्पष्ट कर दी है।

नई दिल्ली ऐसी व्यवस्था की पक्षधर है, जिसमें स्थायी सदस्यता केवल नाम और पद तक सीमित न हो, बल्कि उसके साथ समान अधिकार भी जुड़े हों।

भारत का संदेश यही है कि 21वीं सदी की वैश्विक चुनौतियों का सामना 1945 की असमानताओं को जस का तस बनाए रखकर नहीं किया जा सकता।

अब सवाल केवल यह नहीं है कि सुरक्षा परिषद में नए देशों को जगह कब मिलेगी, बल्कि यह भी है कि उन्हें किस दर्जे और कितने अधिकारों के साथ जगह दी जाएगी।

एनएसके विश्लेषण – अंतरराष्ट्रीय राजनीति

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