बी के झा
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पटना, 6 अक्टूबर
बिहार की राजनीति में गठबंधन जितने महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण उनकी अंदरूनी दरारें भी हैं। विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता के समीकरण भले ही एनडीए के पक्ष में हों, लेकिन राष्ट्रीय लोक मोर्चा यानी RLM के भीतर उठी नई बगावत ने गठबंधन की राजनीति के साथ-साथ उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।एमएलसी चुनाव में रालोमो के चार में से तीन विधायक एनडीए समर्थित उम्मीदवार के बजाय निर्दलीय प्रत्याशी रामपुकार सिन्हा के समर्थन में खड़े दिखाई दे रहे हैं। इन तीन चेहरों में रालोमो विधायक दल के नेता माधव आनंद, प्रदेश अध्यक्ष आलोक सिंह और बाजपट्टी विधायक रामेश्वर महतो शामिल हैं।दिलचस्प बात यह है कि बगावत के बीच भी माधव आनंद इसे ‘पार्टी में टूट’ मानने को तैयार नहीं हैं।
उनका तर्क है—जब चार में से तीन विधायक एक साथ हैं, तो टूट कैसी? यही एक सवाल अब उपेंद्र कुशवाहा के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गया है।
माधव आनंद का संदेश—कुशवाहा से लड़ाई नहीं, नेतृत्व के फैसलों से असहमति
मंगलवार को मीडिया से बातचीत में माधव आनंद ने सीधे तौर पर उपेंद्र कुशवाहा का नाम लेकर हमला नहीं किया, लेकिन उनके बयान का निशाना पार्टी का शीर्ष नेतृत्व साफ तौर पर था।उनका कहना है कि नेतृत्व के कुछ फैसलों से कार्यकर्ताओं और नेताओं में असंतोष पैदा हुआ। कई पुराने नेता पार्टी छोड़कर चले गए। अब कार्यकर्ताओं के मान-सम्मान को वापस दिलाने के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।माधव आनंद ने रामपुकार सिन्हा को रालोमो का पुराना नेता बताते हुए दावा किया कि एमएलसी चुनाव में पार्टी के चार में से तीन विधायक उनके साथ हैं। सोमवार को नामांकन के दौरान बड़ी संख्या में रालोमो कार्यकर्ताओं की मौजूदगी और 20 से ज्यादा जिलाध्यक्षों के समर्थन का भी उन्होंने दावा किया।अगर यह दावा संगठनात्मक स्तर पर भी जमीन पर कायम रहता है, तो मामला केवल एक एमएलसी चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा।
‘कुशवाहा का सम्मान करते हैं’, फिर संदेश किसके लिए?
माधव आनंद ने साफ किया कि उनकी उपेंद्र कुशवाहा से कोई निजी लड़ाई नहीं है। उन्होंने कहा कि कुशवाहा का सम्मान पहले भी था और आगे भी रहेगा।लेकिन राजनीति में कई बार सबसे तीखा संदेश सीधे हमले से नहीं, बल्कि शब्दों के चयन से जाता है।एक तरफ कुशवाहा के सम्मान की बात और दूसरी तरफ उनके नेतृत्व के फैसलों पर सवाल—यह संकेत देता है कि रालोमो के भीतर विवाद व्यक्ति बनाम व्यक्ति का कम और नेतृत्व की शैली तथा संगठनात्मक नियंत्रण का ज्यादा हो सकता है।
माधव आनंद का यह कहना कि कार्यकर्ताओं का सम्मान लौटाने के लिए ‘जो भी करना होगा’ किया जाएगा, आने वाले दिनों में रालोमो के भीतर शक्ति-संतुलन की नई लड़ाई की जमीन तैयार कर सकता है।
NDA में रहकर NDA उम्मीदवार के खिलाफ समर्थन—यही सबसे बड़ा राजनीतिक पेंच
पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि रालोमो के तीनों विधायक खुद को एनडीए से अलग नहीं बता रहे हैं।माधव आनंद का कहना है कि वे एनडीए के साथ हैं और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बिहार सरकार के साथ काम करते रहेंगे। लेकिन एमएलसी चुनाव में उनका समर्थन एनडीए के घोषित उम्मीदवार आनंद पुष्कर के बजाय रामपुकार सिन्हा को है।यानी राजनीतिक संदेश कुछ ऐसा है—गठबंधन कायम, लेकिन हर चुनाव में नेतृत्व का आदेश जरूरी नहीं।
यही स्थिति एनडीए के लिए भी असहज सवाल खड़ा करती है। अगर गठबंधन के भीतर कोई सहयोगी दल अपने ही गठबंधन के उम्मीदवार के खिलाफ रणनीति बनाने लगे, तो आने वाले चुनावों में सीट बंटवारे और उम्मीदवार चयन के समय नेतृत्व की पकड़ कितनी मजबूत रहेगी?
राजनीतिक विश्लेषक बोले—यह सिर्फ MLC चुनाव नहीं
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक रालोमो का मौजूदा विवाद संख्या से ज्यादा नेतृत्व की स्वीकार्यता से जुड़ा है।एक राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक, “चार विधायकों वाली पार्टी में तीन विधायकों का एक साथ खड़ा होना सामान्य मतभेद से बड़ा संकेत है। हालांकि इसे तत्काल टूट कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व के सामने गंभीर संगठनात्मक चुनौती जरूर है।
”वहीं राजनीतिक शिक्षाविदों का मानना है कि बिहार की राजनीति में छोटे सहयोगी दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि वे गठबंधन में रहते हुए अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान कैसे बचाए रखें।उनके अनुसार, “अगर किसी छोटे दल के निर्वाचित प्रतिनिधि यह महसूस करने लगें कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भूमिका सीमित है, तो असंतोष धीरे-धीरे संगठनात्मक शक्ति संघर्ष में बदल सकता है। रालोमो में फिलहाल वही प्रक्रिया दिखाई दे रही है।
”विपक्ष के लिए मिला नया राजनीतिक हथियार
रालोमो का यह संकट विपक्ष के लिए भी राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। विपक्षी दल एनडीए की एकजुटता पर सवाल उठाते हुए यह तर्क दे सकते हैं कि सत्ता गठबंधन के भीतर ही सहयोगी दलों के विधायक अपने नेतृत्व के फैसलों से असहमत हैं।खासकर ऐसे समय में जब बिहार की राजनीति में छोटे दलों और सामाजिक समीकरणों की भूमिका महत्वपूर्ण है, विपक्ष इस घटनाक्रम को ‘एनडीए के भीतर असंतोष’ के उदाहरण के तौर पर पेश कर सकता है।
हालांकि विपक्ष के लिए चुनौती यह भी होगी कि रालोमो के तीनों विधायक फिलहाल एनडीए छोड़ने की बात से इनकार कर रहे हैं। ऐसे में इसे सरकार के संकट के बजाय सहयोगी दल के अंदरूनी शक्ति संघर्ष के रूप में देखना ज्यादा सटीक होगा।
पुराना जख्म फिर हरा—दीपक प्रकाश की एंट्री से शुरू हुआ था विवाद
रालोमो में मौजूदा घटनाक्रम को समझने के लिए पिछले साल का विवाद याद करना जरूरी है।बिहार में एनडीए सरकार बनने के बाद उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को रालोमो कोटे से मंत्री बनाया था। उस समय दीपक न तो विधायक थे और न ही एमएलसी।यही फैसला पार्टी के चार विधायकों में से तीन के बीच असंतोष का कारण बना था। उस समय भी पार्टी में टूट की अटकलें तेज हुई थीं।स्थिति संभालने के लिए कुशवाहा ने संगठन में शक्ति-संतुलन बनाने की कोशिश की। माधव आनंद को विधायक दल का नेता और आलोक सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया।
लेकिन अब वही दोनों नेता—और बाजपट्टी विधायक रामेश्वर महतो—एक बार फिर एक मंच पर दिखाई दे रहे हैं।यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है।
क्या कुशवाहा ने जिस संतुलन से संकट टाला था, वही संतुलन अब चुनौती बन गया?
राजनीतिक तौर पर देखें तो पिछली बार कुशवाहा ने जिन चेहरों को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर असंतोष को शांत करने की कोशिश की थी, आज उन्हीं में से प्रमुख चेहरे नेतृत्व के फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं।यानी संकट केवल बाहर से नहीं आया है। संकट उस संगठनात्मक ढांचे के भीतर से उभर रहा है, जिसे कुशवाहा ने खुद संतुलित करने के लिए तैयार किया था।
माधव आनंद का दावा—“चार में से तीन विधायक साथ हैं, तो टूट कैसी”—दरअसल रालोमो के भीतर मौजूदा शक्ति-समीकरण का सबसे बड़ा संकेत है।
क्या RLM में नेतृत्व परिवर्तन की जमीन तैयार हो रही है?
फिलहाल इसका सीधा जवाब ‘हां’ कहना जल्दबाजी होगी। तीनों विधायक न तो पार्टी छोड़ने की घोषणा कर रहे हैं और न ही एनडीए से अलग होने की।लेकिन राजनीति में संकट हमेशा इस्तीफे या पार्टी छोड़ने के ऐलान से शुरू नहीं होता। कई बार इसकी शुरुआत समानांतर शक्ति केंद्र बनने से होती है।अगर माधव आनंद, आलोक सिंह और रामेश्वर महतो संगठन के भीतर अपने समर्थकों को एकजुट करने में सफल होते हैं और पुराने नेताओं-कार्यकर्ताओं को वापस लाने की मुहिम चलाते हैं, तो रालोमो में उपेंद्र कुशवाहा के सामने वास्तविक नेतृत्व चुनौती खड़ी हो सकती है।और अगर कुशवाहा समय रहते तीनों विधायकों के साथ राजनीतिक समझौता कर लेते हैं, तो मौजूदा विवाद एक बार फिर शांत हो सकता है।
अब गेंद उपेंद्र कुशवाहा के पाले में
रालोमो का मौजूदा घटनाक्रम तीन सवाल छोड़ रहा है—पहला, क्या यह सिर्फ एमएलसी चुनाव तक सीमित असहमति है?
दूसरा, क्या तीनों विधायक वास्तव में पार्टी के भीतर नेतृत्व के समानांतर शक्ति केंद्र का निर्माण कर रहे हैं?
और तीसरा, क्या उपेंद्र कुशवाहा इस बार भी बातचीत और संगठनात्मक संतुलन के जरिए संकट को टाल पाएंगे?
फिलहाल रालोमो में न औपचारिक टूट हुई है, न कोई विधायक पार्टी छोड़ने की घोषणा कर रहा है। लेकिन इतना जरूर है कि चार में से तीन विधायकों का एक साथ खड़ा होना उपेंद्र कुशवाहा के लिए मामूली चेतावनी नहीं है।
एमएलसी चुनाव में रामपुकार सिन्हा का समर्थन शायद एक चुनावी फैसला हो, लेकिन इसके पीछे चल रही संगठनात्मक राजनीति का असर इससे कहीं बड़ा हो सकता है।
क्योंकि सवाल अब सिर्फ एक एमएलसी सीट का नहीं है—सवाल यह है कि रालोमो में अंतिम फैसला किसका चलेगा: उपेंद्र कुशवाहा का या तीन विधायकों के उभरते नए शक्ति-केंद्र का?
एनएसके–राजनीतिक विश्लेषण
