बी के झा
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त्रिशूली,( नेपाल), 31 अगस्त
पानी जब पहाड़ों का मलबा, विशाल चट्टानें और मौत का सैलाब लेकर नीचे उतरा, तब किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला। देखते ही देखते त्रिशूली का बाजार उजड़ने लगा, इमारतें भरभराकर गिरने लगीं और जिंदगी बचाने के लिए हर तरफ अफरातफरी मच गई। लेकिन इसी मौत के तांडव के बीच एक शख्स ऐसा था जिसने घबराने के बजाय फैसला लिया—स्कूल खाली कराओ।
अभी।
इसी वक्त।
वह थे त्रिभुवन त्रिशूली सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रिंसिपल राजेंद्र दुबान।
उनके एक त्वरित फैसले ने करीब 900 बच्चों को मौत के मुंह से निकाल लिया। महज 10 मिनट में बच्चों को स्कूल से सुरक्षित ऊंचाई पर पहुंचा दिया गया। इसके कुछ ही देर बाद जिस स्कूल में बच्चों की आवाजें गूंज रही थीं, वही स्कूल बाढ़ और मलबे की चपेट में आकर तबाही का मंजर बन गया।त्रासदी के पांच दिन बाद भी राजेंद्र उस खौफनाक दृश्य को याद करके सिहर उठते हैं।
उन्होंने बताया कि उस दिन वह स्कूल के क्लासरूम में थे। तभी उन्हें साथियों से सूचना मिली कि ऊपर की तरफ से तेज पानी मलबे और चट्टानों के साथ नीचे आ रहा है। खतरे की गंभीरता समझते ही उन्होंने एक पल गंवाए बिना स्कूल खाली कराने का आदेश दे दिया।
30 सेकंड का उफान, 10 मिनट का फैसला
त्रिभुवन त्रिशूली सीनियर सेकेंडरी स्कूल में करीब 1643 विद्यार्थी पढ़ते हैं। घटना के दिन लगभग 900 बच्चे स्कूल में मौजूद थे। हालात इतने तेजी से बदले कि सामान्य परिस्थितियों में किसी बड़े हादसे से निपटने की तैयारी का समय भी नहीं मिलता।
राजेंद्र दुबान ने बताया कि बच्चों को तत्काल स्कूल बसों में बैठाकर ऊपरी और सुरक्षित इलाके की ओर भेजा गया। शिक्षकों और कर्मचारियों ने भी बच्चों के साथ वहां पहुंचकर राहत की सांस ली।पूरा ऑपरेशन करीब 10 मिनट में पूरा कर लिया गया।और इसके बाद जो हुआ, उसने इस फैसले की अहमियत हमेशा के लिए साबित कर दी।
पानी का प्रचंड बहाव स्कूल तक पहुंचा और अपने रास्ते में आने वाली चीजों को तबाह करता चला गया। आसपास की इमारतें ढह गईं। स्कूल की इमारत भी बुरी तरह तबाह हो गई। अगर उन 900 बच्चों को समय रहते बाहर नहीं निकाला गया होता तो हादसा कितनी बड़ी त्रासदी में बदल सकता था, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।
स्कूल बचा नहीं, लेकिन 900 बच्चे बच गए
राजेंद्र की आंखों के सामने उनका स्कूल तबाह हो गया। जिस परिसर में हर दिन बच्चों की चहल-पहल होती थी, वहां अब मलबा है। आसपास की इमारतें जमींदोज हैं और पुल बह चुके हैं।
त्रिशूली बाजार की हालत भी किसी खंडहर से कम नहीं है।राजेंद्र कहते हैं कि पूरा इलाका इस कदर उजड़ चुका है कि उसे दोबारा खड़ा करने में लंबा वक्त लगेगा। सड़क, पुल, इमारतें और दूसरी बुनियादी सुविधाएं—सबको फिर से खड़ा करना होगा।लेकिन इस विनाश के बीच एक राहत की कहानी भी है—900 बच्चों की जिंदगी।
‘पानी आया तो भागने तक का वक्त नहीं मिला
’त्रिशूली की तबाही केवल आंकड़ों में दर्ज होने वाली आपदा नहीं है। इसके पीछे सैकड़ों परिवारों की जिंदगी भर की कमाई, सपने और रिश्ते मलबे में दबे हैं।इन्हीं में एक नाम है अशोक कुमार चौरसिया का। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रसड़ा गांव से ताल्लुक रखने वाले अशोक का परिवार करीब 44 साल पहले काठमांडू आया था।
लगभग दो दशक पहले उन्होंने त्रिशूली में कारोबार शुरू किया था।धीरे-धीरे कारोबार बढ़ता गया। चार दुकानें, चार गोदाम और कई वाहन—सब कुछ उनके कारोबार का हिस्सा बन गया। लेकिन कुछ ही मिनटों में वर्षों की मेहनत पानी के साथ बह गई।
अशोक बताते हैं कि जब पानी और मलबा आया तो हालात इतने तेजी से बिगड़े कि सामान समेटने तक का समय नहीं मिला। पुलिस की चेतावनी के बाद वह किसी तरह बाइक निकालकर पत्नी और बच्चों के साथ ऊंचाई की ओर चले गए।अगर वह बाइक समय पर नहीं निकाल पाते तो शायद उनकी कहानी भी यहीं खत्म हो जाती।
45 करोड़ से ज्यादा का नुकसान, पहनने को कपड़े तक नहीं
अशोक के मुताबिक उनकी चार दुकानें और चार गोदाम तबाह हो गए। वाहनों समेत उन्हें 45 करोड़ रुपये से अधिक के नुकसान का अनुमान है।लेकिन करोड़ों रुपये का नुकसान भी उस दर्द के आगे छोटा है, जो उन्होंने परिवार के दो सदस्यों को खोकर झेला है।आज स्थिति यह है कि जिस व्यक्ति का कभी करोड़ों का कारोबार था, उसके पास पहनने के लिए कपड़े तक नहीं हैं।
वह दूसरे लोगों से कपड़े मांगकर पहन रहे हैं और किसी तरह भोजन का इंतजाम कर रहे हैं।उन्होंने अपने परिवार के दो सदस्यों को भारत वापस भेज दिया है।
60 से ज्यादा भारतीय परिवार भी तबाही की चपेट में
अशोक बताते हैं कि त्रिशूली बाजार में बड़ी संख्या में भारतीय परिवार भी रहते थे। उनके अनुसार करीब 60 से अधिक भारतीय परिवार वहां बसे हुए थे। अब उन्हीं इलाकों में क्षतिग्रस्त मकान, टूटी दुकानें और मलबे के ढेर दिखाई दे रहे हैं।जिस बाजार में कभी व्यापार की रौनक थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है।दुकानों में सजा सामान नहीं, बल्कि तबाही के निशान हैं। घरों में परिवार नहीं, बल्कि खालीपन है। सड़कें हैं, लेकिन जिंदगी की रफ्तार गायब है।
एक तरफ जलप्रलय, दूसरी तरफ इंसानियत की मिसाल
नेपाल की इस त्रासदी ने एक तरफ प्रकृति की भयावह ताकत दिखाई है तो दूसरी तरफ इंसानी साहस की कीमत भी समझाई है।
सिर्फ 10 मिनट।
इतना ही वक्त मिला था राजेंद्र दुबान को फैसला लेने के लिए। उन्होंने इंतजार नहीं किया, खतरे के पूरी तरह सामने आने का इंतजार नहीं किया और न ही किसी औपचारिक आदेश की प्रतीक्षा की। उन्होंने खतरे को पहचाना और बच्चों को सुरक्षित निकालने का फैसला कर दिया।
कुछ मिनटों की वही तत्परता आज 900 परिवारों के लिए जिंदगी और मौत के बीच खड़ी एक दीवार बन चुकी है।त्रिशूली में बाढ़ ने इमारतें गिरा दीं, बाजार उजाड़ दिया, कारोबार मिटा दिए और कई परिवारों से उनके अपने छीन लिए।
लेकिन इसी तबाही के बीच एक प्रिंसिपल का वह फैसला भी दर्ज हो गया, जिसने साबित किया कि आपदा की घड़ी में कभी-कभी एक सही फैसला सैकड़ों जिंदगियों की पूरी कहानी बदल देता है।
