बी के झा
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पटना, 16 सितंबर
बिहार की राजनीति में समान नागरिक संहिता यानी UCC अब महज एक कानूनी या वैचारिक मुद्दा नहीं रह गया है। यह सवाल सीधे सत्तारूढ़ NDA के भीतर राजनीतिक समीकरणों और जनता के सामने दलों की स्थिति से जुड़ता दिखाई दे रहा है। एक तरफ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले BJP-NDA शासित 21 राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य सार्वजनिक किया है, तो दूसरी तरफ बिहार में BJP की सहयोगी JDU इस मुद्दे पर अभी अपने पत्ते पूरी तरह खोलने को तैयार नहीं है।
इसी बीच मुख्यमंत्री रहते हुए नीतीश कुमार की 2017 की वह चिट्ठी फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है, जो उन्होंने तत्कालीन विधि आयोग के अध्यक्ष बीएस चौहान को लिखी थी। उस पत्र में नीतीश कुमार ने UCC को लेकर व्यापक सामाजिक और धार्मिक सहमति, संवाद और संसदीय बहस की जरूरत पर जोर दिया था। 2017 के उनके रुख का हवाला देते हुए JDU के कुछ नेता आज भी यह तर्क दे रहे हैं कि इतने संवेदनशील विषय पर बिना व्यापक सहमति के आगे बढ़ना उचित नहीं होगा।
2017 की चिट्ठी में क्या था?
नीतीश कुमार का तत्कालीन रुख यह था कि UCC को केवल राजनीतिक मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक समुदायों के बीच व्यापक संवाद और सहमति जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा था कि ऐसे विषय पर संसद, राज्यों की विधानसभाओं और नागरिक समाज के विभिन्न मंचों पर चर्चा होनी चाहिए।यही पुराना दस्तावेज आज इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि 2026 में UCC का मुद्दा फिर राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में आ चुका है।
अमित शाह का 2029 वाला ऐलान और बिहार का सवाल
13 सितंबर 2026 को मुंबई में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले BJP-NDA द्वारा शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कई राज्यों में UCC पहले ही लागू किया जा चुका है और बाकी NDA शासित राज्यों में भी इसे आगे बढ़ाया जाएगा।इस ऐलान के बाद स्वाभाविक रूप से बिहार को लेकर सवाल उठा, क्योंकि यहां BJP और JDU मिलकर सरकार चला रहे हैं।लेकिन यहीं से पटना की राजनीति में असली कहानी शुरू होती है।
JDU का जवाब—पहले ड्राफ्ट दिखाइए, फिर फैसला होगा
अमित शाह के बयान के बाद JDU ने तत्काल किसी अंतिम समर्थन या विरोध की घोषणा नहीं की। बिहार के उपमुख्यमंत्री और JDU के वरिष्ठ नेता विजय कुमार चौधरी ने कहा कि प्रस्तावित UCC के प्रावधान सामने आने और उनका अध्ययन होने के बाद ही पार्टी अपना रुख तय करेगी।उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी प्रावधान को लेकर आपत्ति होगी तो NDA के भीतर उस पर बातचीत की जाएगी।
JDU के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा के अमित शाह से बातचीत करने की बात भी सामने आई है।यानी फिलहाल JDU की आधिकारिक भाषा ‘हां’ या ‘नहीं’ से ज्यादा ‘पहले प्रस्ताव देखिए’ वाली है।
श्याम रजक ने खोला दूसरा मोर्चा
इसी बीच JDU के वरिष्ठ नेता श्याम रजक ने UCC को लेकर ज्यादा स्पष्ट और कड़ा रुख सामने रखा। उन्होंने नीतीश कुमार के पुराने रुख का हवाला देते हुए कहा कि बिहार में UCC लागू नहीं होना चाहिए। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने नीतीश कुमार की उस राय को अपने लिए बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए ‘गीता समान’ कहा।
यहीं से JDU के भीतर दो अलग-अलग राजनीतिक सुर दिखाई देने लगे हैं—एक तरफ विजय चौधरी का प्रावधान देखकर फैसला करने वाला रुख और दूसरी तरफ श्याम रजक का नीतीश कुमार के पुराने रुख के आधार पर विरोध।यह अंतर ही फिलहाल बिहार की UCC राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
RJD ने मौका देखते ही दिया नीतीश को ऑफर
UCC पर NDA के भीतर उठे सवालों के बीच RJD विधायक भाई वीरेंद्र ने नीतीश कुमार को BJP का साथ छोड़कर RJD के साथ सरकार बनाने का खुला प्रस्ताव दे दिया।उन्होंने सार्वजनिक रूप से JDU और नीतीश कुमार से BJP से अलग होकर साथ आने की अपील की और कहा कि समाजवादी विचारधारा वाले दलों को एक साथ आना चाहिए।लेकिन फिलहाल यह केवल RJD की ओर से दिया गया राजनीतिक प्रस्ताव है।
JDU ने इसे स्वीकार करने का कोई संकेत नहीं दिया है। उलटे विजय चौधरी ने साफ किया है कि पार्टी अपने NDA सहयोगियों के साथ बातचीत करते हुए UCC के प्रस्तावित प्रावधानों पर विचार करेगी।
पटना में सवाल सिर्फ UCC का नहीं, NDA की राजनीतिक दिशा का भी
बिहार की राजनीति को करीब से देखने वाले एक वरिष्ठ शिक्षाविद और एक स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर एन एस के से बातचीत में कहा कि UCC का विवाद आने वाले दिनों में केवल कानून के प्रावधानों तक सीमित रहने की संभावना नहीं है।उनके मुताबिक, पटना में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि JDU इस मुद्दे पर अपने पुराने रुख, मौजूदा गठबंधन की राजनीति और BJP के घोषित लक्ष्य के बीच संतुलन कैसे साधती है।
शिक्षाविद के अनुसार, नीतीश कुमार की 2017 की चिट्ठी को आज के संदर्भ में पढ़ने पर एक बात साफ होती है कि उन्होंने UCC पर निर्णय से पहले व्यापक संवाद और सहमति की जरूरत बताई थी। अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और केंद्र की ओर से 2029 तक NDA शासित राज्यों में इसे लागू करने का स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य सामने है।
स्थानीय पत्रकार ने कहा कि Bihar NDA के भीतर असली परीक्षा तब होगी, जब UCC का ठोस ड्राफ्ट सामने आएगा। अभी तक बहस प्रस्ताव और राजनीतिक बयानों के स्तर पर है। कानून के वास्तविक प्रावधान आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि JDU की आपत्तियां किन मुद्दों पर हैं और BJP उन पर कितना समझौता करने को तैयार है।
क्या UCC JDU के लिए ‘नीति’ का सवाल है या ‘राजनीतिक संतुलन’ का?
यही वह प्रश्न है जो आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति को प्रभावित कर सकता है।एक ओर BJP UCC को अपने प्रमुख नीतिगत एजेंडे के तौर पर आगे बढ़ा रही है। दूसरी ओर JDU कह रही है कि पहले कानून का स्वरूप और प्रावधान सामने आएं। वहीं JDU के कुछ नेता नीतीश कुमार के पुराने रुख को आधार बनाकर विरोध का संकेत दे रहे हैं।
इसके समानांतर RJD ने इस मतभेद को राजनीतिक अवसर के रूप में इस्तेमाल करते हुए नीतीश कुमार को गठबंधन बदलने का सार्वजनिक प्रस्ताव दे दिया है।लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य भी है—किसी राजनीतिक प्रस्ताव को वास्तविक गठबंधन परिवर्तन मान लेना अभी जल्दबाजी होगी।
नीतीश के सामने तीन रास्तों का राजनीतिक दबाव
पटना की राजनीति पर नजर रखने वाले उक्त स्थानीय पत्रकार के विश्लेषण के अनुसार, UCC पर नीतीश कुमार के सामने एक साथ कई राजनीतिक दबाव हैं।
पहला दबाव NDA के भीतर सहयोगी दल की भूमिका का है।
दूसरा दबाव JDU के अपने नेताओं के अलग-अलग बयानों का है।
और तीसरा दबाव विपक्ष की ओर से मिल रहे राजनीतिक संदेशों का है। ऐसे में नीतीश कुमार के लिए इस मुद्दे पर जल्दबाजी में कोई अंतिम घोषणा करने के बजाय कानून के वास्तविक प्रारूप का इंतजार करना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
हालांकि, इस विश्लेषण में किए गए कुछ दावे—जैसे JDU के भीतर किसी विशेष संख्या में नेताओं के संभावित अलग होने की तैयारी या भविष्य में सरकार बदलने की निश्चितता—की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से नहीं होती। इसलिए इन्हें अभी राजनीतिक अटकल के स्तर पर ही देखा जाना चाहिए।
BJP के लिए बिहार क्यों महत्वपूर्ण?
BJP के लिए बिहार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमित शाह ने जिस 21 राज्यों में UCC लागू करने की बात कही है, उसमें NDA शासित बिहार भी शामिल है। ऐसे में बिहार में सहयोगी JDU की अंतिम स्थिति राष्ट्रीय स्तर पर NDA के भीतर सहमति के सवाल से जुड़ सकती है।
दूसरी तरफ JDU के लिए यह केवल BJP के साथ रिश्ते का सवाल नहीं है। पार्टी को अपने पुराने राजनीतिक रुख, सामाजिक समीकरण और NDA की साझा राजनीति—तीनों के बीच संतुलन साधना होगा।यही वजह है कि नीतीश कुमार की 2017 की चिट्ठी अचानक 2026 की राजनीति में फिर से प्रासंगिक हो गई है।
‘चिट्ठी बनाम घोषणा’—बिहार में UCC की असली कहानी
एक तरफ आठ-नौ साल पुराना वह दस्तावेज है जिसमें नीतीश कुमार ने व्यापक संवाद और सहमति की जरूरत बताई थी।दूसरी तरफ 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की स्पष्ट घोषणा है कि 2029 से पहले NDA शासित 21 राज्यों में UCC लागू किया जाएगा।और इन दोनों के बीच खड़ा है बिहार का सत्तारूढ़ गठबंधन—जहां BJP की दिशा स्पष्ट दिखाई दे रही है, जबकि JDU अभी ‘ड्राफ्ट देखेंगे, प्रावधान पढ़ेंगे और फिर फैसला करेंगे’ की स्थिति में है।
यही अंतर आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन सकता है।
क्या 2017 का नीतीश मॉडल—पहले व्यापक सहमति, फिर कानून—2026 के UCC एजेंडे के साथ तालमेल बैठा पाएगा?
या फिर UCC का वास्तविक ड्राफ्ट सामने आते ही JDU को अपने पुराने रुख और NDA की वर्तमान राजनीतिक दिशा के बीच कोई स्पष्ट रास्ता चुनना पड़ेगा?
फिलहाल इसका जवाब भविष्य के गर्भ में है।
लेकिन इतना जरूर है कि UCC ने बिहार NDA के भीतर एक ऐसी बहस को जन्म दे दिया है, जिसमें कानून से ज्यादा महत्वपूर्ण अब गठबंधन की राजनीति, पुराने बयानों की विश्वसनीयता और आने वाले राजनीतिक फैसलों की दिशा हो गई है।
एन एस के विश्लेषण:
बिहार में UCC की लड़ाई अभी सड़क पर नहीं, बल्कि बयानों, पुराने दस्तावेजों और गठबंधन की बंद कमरे वाली बातचीत में लड़ी जा रही है।
असली सियासी तस्वीर तब साफ होगी, जब UCC का ठोस प्रारूप सामने आएगा और JDU को सिर्फ सवाल पूछने के बजाय उस पर अपना औपचारिक रुख तय करना होगा।

