पहले न्यूयॉर्क संभालें ममदानी, फिर भारत को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाएं! भागवत के कार्यक्रम पर मेयर के विरोध से छिड़ी वैचारिक जंग, बहुलतावाद की कसौटी पर खुद घिरे ममदानी

बी के झा

NSK news Ind

नई दिल्ली, 27 अगस्त

न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के 29 अगस्त को मैडिसन स्क्वायर गार्डन में प्रस्तावित कार्यक्रम का विरोध करके एक ऐसा राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका असर न्यूयॉर्क की सीमा से कहीं आगे तक दिखाई दे रहा है।

ममदानी ने कहा है कि वह कार्यक्रम का समर्थन नहीं करते और RSS की विचारधारा को भारत के उस बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के विपरीत मानते हैं, जिसे उन्होंने अपने परिवार से सीखा। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि निजी स्थल पर होने वाले कार्यक्रम को रद्द करने का अधिकार शहर प्रशासन के पास है या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है।

यहीं से असली सवाल शुरू होता है—क्या किसी निर्वाचित मेयर की वैचारिक असहमति किसी निजी और कानूनी कार्यक्रम को सार्वजनिक रूप से कटघरे में खड़ा करने का पर्याप्त आधार हो सकती है?

बहुलतावाद का अर्थ असहमति को रोकना नहीं, सहना भी है

ममदानी स्वयं न्यूयॉर्क को ऐसा शहर बताते हैं जहां हर रंग, धर्म, आस्था और पृष्ठभूमि के व्यक्ति को जगह मिलनी चाहिए। लेकिन बहुलतावाद की असली परीक्षा तब होती है, जब सामने खड़ा विचार हमारे अपने राजनीतिक विश्वास से मेल न खाता हो।

भागवत का कार्यक्रम ‘Universal Oneness Celebration’ के नाम से आयोजित किया जा रहा है। आयोजकों के अनुसार इसका उद्देश्य भारतीय-अमेरिकी समुदाय को जोड़ना, साझा विरासत और अंतरधार्मिक संवाद को बढ़ावा देना है। आयोजकों का दावा है कि अमेरिका के 200 से अधिक हिंदू-अमेरिकी संगठन इस आयोजन से जुड़े हैं।

RSS ने विवाद के बीच कहा है कि कार्यक्रम खुले संवाद, पारस्परिक सम्मान और भारतीय ethos की भावना से आयोजित किया जा रहा है और इसमें विविध समुदायों के लोगों को आमंत्रित किया गया है।इसलिए ममदानी के सामने मूल प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि उन्हें RSS पसंद है या नहीं। प्रश्न यह होना चाहिए कि क्या उन्हें अपने मत से अलग विचार रखने वाले लोगों को भी वही लोकतांत्रिक स्थान देना है, जिसकी वह स्वयं वकालत करते हैं?

अमेरिकी हिंदू संगठनों ने मेयर को याद दिलाई जिम्मेदारी

ममदानी की टिप्पणी के बाद अमेरिकी हिंदू संगठनों ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) ने कार्यक्रम से पहले सुरक्षा सलाह जारी करते हुए लोगों से सतर्क रहने और संयम बनाए रखने की अपील की है। संगठन ने मेयर से सभी न्यूयॉर्क वासियों, जिसमें कार्यक्रम में आने वाले लोग भी शामिल हैं, की सुरक्षा और नागरिक अधिकारों की रक्षा करने की मांग की है।

यह प्रतिक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी निर्वाचित प्रतिनिधि की पहली संवैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी उसके शहर के नागरिकों की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा करना है—चाहे वे उसके समर्थक हों या विरोधी।

लेकिन विरोध का दूसरा पक्ष भी मौजूद है

इस विवाद का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ‘Hindus for Human Rights’, ‘Indian American Muslim Council’ और ‘Interfaith Center of New York’ सहित कुछ संगठनों ने भागवत के कार्यक्रम का विरोध किया है और आयोजन रद्द करने की मांग की है।

उनका तर्क है कि RSS की विचारधारा भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों को प्रभावित करती है।अर्थात यह मामला केवल ममदानी बनाम भागवत नहीं है। यह अमेरिका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, प्रवासी राजनीति और भारत की छवि को लेकर दो बिल्कुल अलग दृष्टिकोणों का टकराव बन चुका है।

USCIRF की टिप्पणी ने विवाद को और अंतरराष्ट्रीय रंग दिया

अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता पर नजर रखने वाली USCIRF ने RSS से जुड़े लोगों और भारतीय अधिकारियों पर लक्षित प्रतिबंधों की मांग की है। भारत के विदेश मंत्रालय ने पहले ही USCIRF की इस तरह की सिफारिशों को पक्षपाती और विश्वसनीयता से रहित बताया है।

हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से ममदानी की ताजा टिप्पणी पर अलग से कोई प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है। इसलिए इस मामले में MEA के नाम से कोई ऐसा बयान जोड़ना उचित नहीं होगा जो आधिकारिक रूप से जारी नहीं हुआ है।

भाजपा ने पूछा—बहुलतावाद का मतलब आखिर क्या है?

ममदानी के बयान पर भाजपा ने उन्हें घेरा है। भाजपा नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता नलिन कोहली ने सवाल उठाया कि यदि मेयर वास्तव में बहुलतावाद में विश्वास करते हैं तो उन्हें RSS प्रमुख के कार्यक्रम का विरोध क्यों करना चाहिए। उनके मुताबिक अलग-अलग विचारों के लिए जगह देना ही बहुलतावाद की वास्तविक कसौटी है।भाजपा विधायक राम कदम ने भी कहा कि लोगों को RSS के बारे में राय बनाने से पहले भागवत की बात सुननी चाहिए।

राजनीतिक रूप से भाजपा का तर्क साफ है—

विचारधारा से असहमति का अधिकार है, लेकिन असहमति को किसी दूसरे के मंच और आवाज के खिलाफ इस्तेमाल करना अलग बात है।

कांग्रेस ने उलटा सवाल खड़ा किया

कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रिया इसके विपरीत रही। कांग्रेस नेता नाना पटोले ने RSS की संगठनात्मक संरचना, फंडिंग और विदेशों में गतिविधियों पर सवाल उठाते हुए भागवत के अमेरिकी दौरे को लेकर जवाब मांगे हैं।

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी पूछा कि न्यूयॉर्क में इस कार्यक्रम का उद्देश्य क्या है और दुनिया को इससे क्या संदेश दिया जा रहा है।कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी भागवत के दौरे को लेकर टिप्पणी की और इसकी राजनीतिक अहमियत को कमतर बताया।

यानी भारत में भी विवाद ने राजनीतिक रेखाएं साफ कर दी

एक तरफ भाजपा इसे वैचारिक असहिष्णुता का मामला बता रही है, दूसरी तरफ कांग्रेस RSS की भूमिका और उसके वैश्विक विस्तार पर सवाल उठा रही है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों के लिए असली मुद्दा

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के नजरिए से यह प्रकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी शहर के मेयर का बयान केवल निजी राय नहीं रह जाता। वह शहर की राजनीतिक संस्कृति का सार्वजनिक संदेश बन जाता है।ममदानी को RSS की आलोचना करने का पूरा लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन उसी लोकतंत्र का दूसरा सिद्धांत यह भी है कि जिस विचार से आप असहमत हैं, उसे बोलने की अनुमति देना ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की असली परीक्षा है।

यदि कार्यक्रम कानून के दायरे में है और निजी स्थल पर आयोजित हो रहा है, तो प्रशासन की भूमिका सुरक्षा और कानून-व्यवस्था सुनिश्चित करने की होनी चाहिए। स्वयं ममदानी ने भी कार्यक्रम को रद्द करने के शहर के अधिकार पर अनिश्चितता जताई है।

क्या ममदानी को न्यूयॉर्क की समस्याओं पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए?

यहां ममदानी की आलोचना का दूसरा राजनीतिक पहलू सामने आता है। न्यूयॉर्क का मेयर दुनिया के सबसे जटिल महानगरों में से एक को चलाता है। आवास, किराए, सार्वजनिक सुरक्षा, बेघर लोगों की समस्या, परिवहन, महंगाई और शहर की प्रशासनिक क्षमता जैसे मुद्दे उसके सामने लगातार खड़े रहते हैं।

ऐसे में आलोचक पूछ सकते हैं कि मेयर का राजनीतिक समय और सार्वजनिक ऊर्जा किसी भारतीय संगठन के निजी कार्यक्रम पर वैचारिक टिप्पणी करने में अधिक खर्च होनी चाहिए या न्यूयॉर्क के नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याओं पर?

लेकिन यहां भी एक सावधानी जरूरी है—यह कहना कि ममदानी हिंदुओं के खिलाफ नफरत फैलाकर केवल मुस्लिम वोट हासिल करना चाहते हैं, फिलहाल उपलब्ध विश्वसनीय प्रमाणों से सिद्ध नहीं है। यह एक राजनीतिक आरोप हो सकता है, तथ्य नहीं। अखबार की विश्वसनीयता के लिए इस अंतर को बनाए रखना जरूरी है।

पाकिस्तान दिवस की मौजूदगी से उठा ‘चयनात्मक बहुलतावाद’ का सवाल

ममदानी की आलोचना करने वाले कुछ लोगों ने उनके हाल के पाकिस्तान दिवस कार्यक्रम में शामिल होने का हवाला देकर सवाल उठाया है कि यदि धार्मिक या राजनीतिक राष्ट्रवाद उन्हें परेशान करता है तो समान कसौटी सभी समुदायों और आयोजनों पर लागू होनी चाहिए।

रिपोर्टों के अनुसार ममदानी ने ब्रुकलिन में पाकिस्तान समुदाय के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था।यहां सवाल पाकिस्तान दिवस में शामिल होने का नहीं, बल्कि एक ही लोकतांत्रिक सिद्धांत को अलग-अलग विचारधाराओं पर समान रूप से लागू करने का है।यही वह बिंदु है जहां ममदानी के बहुलतावाद की राजनीतिक परीक्षा होती है।

कानूनविदों की नजर में मामला बेहद स्पष्ट

कानूनी दृष्टि से किसी संगठन की विचारधारा से असहमति और उसके वैध कार्यक्रम को रोकने की शक्ति दो अलग-अलग बातें हैं। मेयर स्वयं जब यह स्वीकार कर रहे हैं कि शहर को निजी कार्यक्रम रद्द करने का अधिकार शायद नहीं है, तो इससे स्पष्ट होता है कि राजनीतिक असहमति और कानूनी अधिकार की सीमा अलग है।

लोकतंत्र में प्रशासन को किसी आयोजन की सामग्री पसंद न होने के कारण उसे रोकने की जगह कानून, परमिट और सार्वजनिक सुरक्षा के स्थापित मानकों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।

समाजसेवी संगठनों के लिए भी यह बड़ी परीक्षा

समाजसेवी और मानवाधिकार संगठनों की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण है। यदि कोई समूह RSS की विचारधारा का विरोध करना चाहता है तो उसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन और वैचारिक बहस का अधिकार होना चाहिए। लेकिन उसी तरह RSS समर्थकों और कार्यक्रम में आने वाले लोगों को भी सुरक्षित तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार मिलना चाहिए।लोकतंत्र में विरोध का अधिकार तभी सार्थक है, जब असहमति रखने वाले पक्ष के अधिकार की भी रक्षा की जाए।

यह लड़ाई भागवत से ज्यादा ‘लोकतंत्र की कसौटी’ की है

भागवत का कार्यक्रम हो या उसका विरोध—दोनों लोकतांत्रिक गतिविधियां हो सकती हैं, बशर्ते वे कानून की सीमा में हों। RSS की विचारधारा की आलोचना भी लोकतांत्रिक अधिकार है और उसके समर्थन में कार्यक्रम करना भी।मगर न्यूयॉर्क जैसे वैश्विक शहर में असली सवाल यह है कि क्या ‘बहुलतावाद’ केवल अपने पसंदीदा विचारों के लिए जगह का नाम है, या फिर उन विचारों के लिए भी जगह है जिन्हें हम नापसंद करते हैं?

ममदानी को RSS से असहमति रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन न्यूयॉर्क के मेयर के रूप में उनसे अपेक्षा इससे भी बड़ी है—वे हर नागरिक के अधिकार के संरक्षक बनें, न कि किसी एक विचारधारा के राजनीतिक प्रवक्ता।भारत के किसी संगठन या नेता का अमेरिकी धरती पर कार्यक्रम पसंद करना या न करना व्यक्तिगत राजनीतिक पसंद हो सकती है।

लेकिन उसे लोकतांत्रिक अधिकारों की कसौटी पर परखना अलग विषय है।इसलिए ममदानी के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है—भारत की बहुलतावादी परंपरा पर बहस करने से पहले न्यूयॉर्क की लोकतांत्रिक परंपरा को अपनी कसौटी पर कसिए।

विरोध कीजिए, तर्क दीजिए, बहस कीजिए—लेकिन आवाज बंद कराने की राजनीति से बचिए।और शायद यही ‘बहुलतावाद’ का सबसे कठिन, लेकिन सबसे सच्चा अर्थ है।

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