बी के झा
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लखनऊ / नई दिल्ली, 29 सितंबर
तेरह साल तक प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर रहकर सरकारी मशीनरी को करीब से देखने वाली पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने आखिरकार अपने भविष्य को लेकर चल रहे लंबे सस्पेंस से पर्दा उठा दिया है।
मंगलवार को जारी वीडियो संदेश में उन्होंने साफ कर दिया कि वह अब राजनीति में प्रवेश करेंगी। लेकिन उनका रास्ता फिलहाल किसी स्थापित राजनीतिक दल के दरवाजे से होकर नहीं गुजरेगा।
दिव्या मित्तल ने कहा है कि वह आम लोगों के साथ मिलकर एक स्वतंत्र राजनीतिक मंच खड़ा करना चाहती हैं।उनके ऐलान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि वह राजनीति को केवल सत्ता या चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं देखतीं। उनके मुताबिक, राजनीति के जरिए उन सवालों को उठाना जरूरी है जो सरकारी फाइलों में दर्ज होने के बावजूद जमीन पर समाधान का इंतजार करते रह जाते हैं।
दिव्या मित्तल ने उत्तर प्रदेश को अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत का केंद्र बनाया है। उन्होंने प्रदेश को अपनी ‘कर्मभूमि’ बताते हुए कहा कि यहां के लोगों ने उन्हें अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह स्वीकार किया। अब उसी जनता के बीच से अपनी नई राजनीतिक यात्रा शुरू करने की बात उन्होंने कही है।
‘मुझे मसीहा नहीं बनना, लोगों की आवाज बनना है’
दिव्या मित्तल के राजनीतिक संदेश में एक बात बार-बार उभरकर सामने आती है—जनता को किसी एक व्यक्ति के भरोसे बैठने के बजाय व्यवस्था में अपनी भागीदारी बढ़ानी होगी।उन्होंने कहा कि वह उन लोगों की आवाज बनना चाहती हैं, जिनकी समस्याएं सरकारी कार्यालयों की चौखट तक पहुंच ही नहीं पातीं और पहुंचने के बाद भी कई बार कार्रवाई की प्रतीक्षा करती रहती हैं।यही वह बिंदु है जहां उनकी प्रशासनिक पृष्ठभूमि उनकी प्रस्तावित राजनीति से जुड़ती दिखाई देती है। उनका तर्क है कि उन्होंने व्यवस्था के भीतर रहकर देखा है कि कई बार नियम मौजूद होते हैं, स्वीकृति मिल चुकी होती है और संसाधन भी उपलब्ध होते हैं, फिर भी जमीन पर काम नहीं होता।
उनका सवाल है—अगर व्यवस्था में नियम भी हैं, पैसा भी है और मंजूरी भी है, तो फिर जनता को समाधान के लिए वर्षों इंतजार क्यों करना पड़े?
एक गांव का स्कूल और ‘इरादे’ का सवाल
दिव्या मित्तल ने अपने प्रशासनिक अनुभव का जिक्र करते हुए मिर्जापुर के लहुरियादह क्षेत्र का उदाहरण दिया।उन्होंने बताया कि पहाड़ी इलाके में पानी पहुंचाने के काम के दौरान एक महिला उनसे मिली। उन्हें उम्मीद थी कि महिला पेंशन, आवास या पानी जैसी सुविधा की मांग करेगी। लेकिन उसकी मांग अलग थी—गांव के स्कूल में पांचवीं कक्षा के बाद की पढ़ाई शुरू कराई जाए।
महिला का सवाल सीधा था। बच्चे पांचवीं तक पढ़ने के बाद आगे की शिक्षा के लिए दूर क्यों जाएं?
दिव्या मित्तल के अनुसार, इस मामले में प्रक्रिया आगे बढ़ी और स्वीकृति भी मिली, लेकिन वर्षों बाद भी निर्माण शुरू नहीं हुआ। उन्होंने इसी अनुभव के आधार पर सवाल उठाया कि जब नियम और मंजूरी मौजूद थे तो काम क्यों नहीं हुआ।उनका निष्कर्ष था कि कई बार समस्या संसाधनों की नहीं, बल्कि ‘इरादे’ की होती है। यही शब्द उनकी प्रस्तावित राजनीतिक सोच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर सामने आया है।
एक पन्नी में रखे कागज और सत्ता के ‘ऊपर’ का सवाल
दिव्या मित्तल ने राजस्व विभाग में विशेष सचिव के रूप में अपने कार्यकाल का एक और अनुभव साझा किया।उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति का जिक्र किया जिसके पास सरकारी जमीन के पट्टे से संबंधित दस्तावेज थे। कागज उसके अधिकार की पुष्टि करते थे, लेकिन जमीन पर वास्तविक कब्जा नहीं मिला था।उनके मुताबिक, जांच में संबंधित रिपोर्ट में गड़बड़ियां मिलीं और कार्रवाई भी हुई। लेकिन इसके बाद भी जब जमीन पर अधिकार दिलाने की बात आई तो कथित तौर पर उन्हें यह जवाब सुनने को मिला कि ‘ऊपर से मना किया गया है।
’यहीं से दिव्या मित्तल का सवाल राजनीतिक हो जाता है—आखिर यह ‘ऊपर’ कौन है?
उनका कहना है कि संविधान में जनता को सर्वोच्च माना गया है। ऐसे में किसी नागरिक को अपने वैध अधिकार के लिए किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश या फोन की जरूरत क्यों पड़े?
यह सवाल केवल एक जमीन के मामले तक सीमित नहीं है। दिव्या मित्तल इसे उस व्यापक प्रशासनिक संस्कृति से जोड़ती हैं, जहां सामान्य नागरिक और व्यवस्था के बीच प्रभाव, पहुंच और सिफारिश की दीवार खड़ी हो जाती है।
सड़क के गड्ढों से लेकर जवाबदेही तक
पूर्व आईएएस अधिकारी ने ग्रामीण सड़कों, पुलों और बुनियादी सुविधाओं को भी अपने राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाया है।उनका कहना है कि आज भी ऐसे गांव हैं जहां सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं। बारिश के दिनों में संपर्क टूट जाता है और लोगों को वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है।दूसरी ओर, जहां सड़कें मौजूद हैं, वहां गड्ढे दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं।
दिव्या मित्तल का सवाल केवल यह नहीं है कि सड़क खराब क्यों है। उनका सवाल यह है कि जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसियों को जब समस्या की जानकारी है, तब समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं होती?
उनके मुताबिक, किसी खराब सड़क पर हुई मौत को सिर्फ ‘हादसा’ कहकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं है। व्यवस्था में यह भी तय होना चाहिए कि गलती कहां हुई और जवाबदेही किसकी है।
पेपर लीक से AI तक—युवाओं के भविष्य पर नजर
दिव्या मित्तल ने अपने राजनीतिक एजेंडे में युवाओं को भी प्रमुख स्थान दिया है।उन्होंने पेपर लीक की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में युवा वर्षों लगा देते हैं। परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी उनकी मेहनत, समय और भविष्य को प्रभावित करती है।इसके साथ ही उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेजी से विस्तार को भी भविष्य की बड़ी चुनौती के रूप में उठाया। उनका सवाल है कि जब तकनीक कई पारंपरिक नौकरियों और काम करने के तरीकों को बदल रही है, तब युवाओं के रोजगार और कौशल को लेकर सार्वजनिक विमर्श कितना तैयार है?
दो बेटियों की मां होने के नाते उन्होंने बच्चों के भविष्य को लेकर अपनी चिंता भी जाहिर की। उनका जोर इस बात पर है कि राजनीति केवल आज की समस्याओं का हिसाब न करे, बल्कि अगले दशक की चुनौतियों पर भी विचार करे।
‘राजनेता बदलना नहीं, राजनीति का तरीका बदलना है’
दिव्या मित्तल की प्रस्तावित राजनीति का सबसे स्पष्ट संदेश शायद यही है।उन्होंने कहा कि उनका लक्ष्य केवल किसी एक राजनेता को हटाकर उसकी जगह दूसरा चेहरा लाना नहीं है। वह राजनीति के काम करने के तरीके में बदलाव की बात करती हैं।इसके लिए उन्होंने चार शब्द सामने रखे हैं—इरादा।
न्याय।
फिक्र।
सोच।
इन चार शब्दों में उनकी राजनीतिक अवधारणा का प्रारंभिक खाका दिखाई देता है।उनका कहना है कि जनता को केवल चुनावी आंकड़ा या वोट बैंक समझने के बजाय उसकी वास्तविक समस्याओं को राजनीति के केंद्र में लाना चाहिए।
हालांकि यह मंच किस स्वरूप में बनेगा, उसका संगठनात्मक ढांचा क्या होगा, चुनावी राजनीति में इसकी भूमिका क्या होगी और उम्मीदवारों का चयन कैसे किया जाएगा—इन सवालों के जवाब अभी सामने आना बाकी हैं।
किसी पार्टी में नहीं जाएंगी, जनता के साथ मंच बनाने का दावा
दिव्या मित्तल ने साफ कहा है कि वह फिलहाल किसी राजनीतिक दल में शामिल नहीं होंगी। उनका कहना है कि जिन व्यवस्थाओं से आम लोगों की समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया, उनके भीतर जाकर वही सवाल उठाना उनके लिए पर्याप्त नहीं होगा।
वह शिक्षकों, किसानों, छात्रों, डॉक्टरों, मजदूरों और वकीलों सहित समाज के अलग-अलग वर्गों को इस पहल से जोड़ने की अपील कर रही हैं।उनका कहना है कि सार्थक राजनीतिक बदलाव केवल सामूहिक जनभागीदारी से संभव है।यानी दिव्या मित्तल का अगला प्रयोग किसी पार्टी के टिकट से ज्यादा एक नए राजनीतिक संगठन या मंच की जमीन तैयार करने पर केंद्रित हो सकता है। इसके वास्तविक स्वरूप का खुलासा आने वाले समय में होगा।
इस्तीफे के बाद शुरू हुआ था अटकलों का दौर
दिव्या मित्तल ने 30 अगस्त 2026 को 13 साल की प्रशासनिक सेवा के बाद आईएएस से इस्तीफा देने की घोषणा की थी। उस समय वह उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व विभाग में विशेष सचिव के पद पर थीं। इस्तीफे के बाद उनके अगले कदम को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई थीं।
27 सितंबर को उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए संकेत दिया था कि 29 सितंबर की सुबह वह अपने भविष्य की दिशा स्पष्ट करेंगी। उस पोस्ट में राजनीति के साथ-साथ विदेश में नौकरी, कोचिंग और परिवार जैसे विकल्पों का भी उल्लेख था।
अब वीडियो संदेश के जरिए उन्होंने राजनीति को अपनी अगली मंजिल के रूप में स्पष्ट कर दिया है।लंदन से IAS और अब IAS से राजनीति तकदिव्या मित्तल की कहानी का एक और महत्वपूर्ण पहलू उनकी शैक्षणिक और पेशेवर यात्रा है।
उन्होंने IIT दिल्ली से पढ़ाई की और IIM बेंगलुरु से MBA किया। इसके बाद लंदन में नौकरी की। विदेश में करियर बनाने के बाद उन्होंने भारत लौटकर UPSC की तैयारी की और 2013 बैच की IAS अधिकारी बनीं।उत्तर प्रदेश कैडर में उन्होंने संत कबीर नगर, मिर्जापुर और देवरिया समेत कई जिलों में प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालीं। मिर्जापुर में एक दूरस्थ पहाड़ी गांव तक पाइप से पानी पहुंचाने की पहल ने उन्हें व्यापक सार्वजनिक पहचान दिलाई।
अब वही प्रशासनिक अनुभव उनकी राजनीतिक पहचान की बुनियाद बनने जा रहा है।इस्तीफे के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आईं
दिव्या मित्तल के इस्तीफे के बाद कांग्रेस नेता अजय राय ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि यदि वह चुनाव लड़ना चाहें तो पार्टी उनके नाम पर विचार कर सकती है। वहीं समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने उनके इस्तीफे के संदर्भ में अधिकारियों पर कथित दबाव का मुद्दा उठाया था। ये राजनीतिक नेताओं के अपने दावे और प्रतिक्रियाएं थीं।
दिव्या मित्तल ने अपने इस्तीफे को निजी प्राथमिकताओं और जीवन के नए लक्ष्यों से जोड़ा था।अब दिव्या मित्तल ने खुद किसी दल में जाने की संभावना से अलग स्वतंत्र राजनीतिक मंच बनाने की बात कही है।
असली चुनौती अब शुरू होगी
दिव्या मित्तल के पास प्रशासन का अनुभव है, लेकिन राजनीति की जमीन अलग होती है।सरकारी व्यवस्था में एक अधिकारी के पास पद, अधिकार और प्रशासनिक तंत्र होता है। राजनीति में जनता का भरोसा, संगठन, कार्यकर्ता, संसाधन और लंबे समय तक जमीन पर मौजूद रहने की क्षमता निर्णायक होती है।दिव्या मित्तल ने पैसा, बाहुबल और जातीय समीकरणों पर आधारित राजनीति से दूरी की बात कही है। लेकिन स्वतंत्र राजनीतिक मंच को वास्तविक जनसंगठन में बदलना अपने आप में बड़ी संगठनात्मक चुनौती होगी।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और राजनीतिक रूप से अत्यंत विविध राज्य में किसी नए मंच के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या प्रशासनिक अनुभव को व्यापक जनराजनीति में बदला जा सकता है?
इसका जवाब न तो उनके आईएएस रिकॉर्ड में पूरी तरह छिपा है और न ही उनके वीडियो संदेश में। इसका जवाब अब उस राजनीतिक यात्रा में मिलेगा, जिसे उन्होंने आज से शुरू करने की घोषणा की है।
दिव्या मित्तल ने आईएएस की कुर्सी छोड़ दी है।
अब उनके सामने सरकारी फाइलें नहीं, जनता के बीच की राजनीति है।और उनकी अपनी घोषणा के अनुसार—यह राजनीति किसी एक चेहरे को बदलने के लिए नहीं, बल्कि ‘राजनीति कैसे की जाए’, इस सवाल का नया जवाब खोजने के लिए होगी।
यही वह दावा है, जिसकी असली परीक्षा अब उत्तर प्रदेश की जमीन पर होगी।
