बी के झा
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नई दिल्ली, 18 सितंबर
अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से जारी सैन्य टकराव के बीच अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक असाधारण दृश्य सामने आने वाला है। युद्ध के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और विदेश मंत्री अब्बास अराघची अगले सप्ताह न्यूयॉर्क पहुंच सकते हैं। ट्रंप प्रशासन ने ईरान के शीर्ष अधिकारियों वाले प्रतिनिधिमंडल को संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्चस्तरीय सत्र में हिस्सा लेने की अनुमति दे दी है। अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक, यह फैसला संयुक्त राष्ट्र के मेजबान देश के रूप में अमेरिका की जिम्मेदारियों के अनुरूप लिया गया है।यानी एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध जारी है, दूसरी तरफ दोनों देशों के शीर्ष अधिकारी उसी अमेरिकी शहर में पहुंचने वाले हैं जहां दुनिया के तमाम राष्ट्राध्यक्ष एक मंच पर बैठेंगे। ऐसे में न्यूयॉर्क की संयुक्त राष्ट्र महासभा केवल भाषणों का मंच नहीं, बल्कि युद्ध, परमाणु कार्यक्रम और संभावित कूटनीतिक रास्ते पर दुनिया की नजरों का केंद्र भी बन सकती है।
युद्ध के बीच कूटनीति का दरवाजा बंद नहीं हुआ
अमेरिका और ईरान के बीच 28 फरवरी से शुरू हुए सैन्य संघर्ष के बाद दोनों देशों के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। हालांकि संघर्ष समाप्त करने को लेकर बातचीत के प्रयास पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं और बीच-बीच में संपर्क जारी रहा है।इसी पृष्ठभूमि में पेजेशकियान और अराघची का न्यूयॉर्क पहुंचना महत्वपूर्ण है। ईरानी राष्ट्रपति के संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने की भी उम्मीद है।
हालांकि वीजा जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका और ईरान के बीच विवाद समाप्त होने जा रहा है। वॉशिंगटन ने प्रतिनिधिमंडल के लिए कई प्रतिबंध बरकरार रखे हैं।
वीजा मिला, लेकिन अमेरिका में खुली आजादी नहीं
अमेरिका ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल को प्रवेश की अनुमति जरूर दी है, लेकिन उनकी आवाजाही पर सख्त सीमाएं लागू रहेंगी। प्रतिनिधिमंडल का आकार भी पिछले वर्ष की तुलना में छोटा होगा। अधिकारियों के मुताबिक, न्यूयॉर्क में ईरानी अधिकारियों पर पहले से लागू यात्रा प्रतिबंध जारी रहेंगे और लग्जरी सामान खरीदने पर भी रोक रहेगी।पिछले वर्षों में ईरानी अधिकारियों की न्यूयॉर्क में आवाजाही को संयुक्त राष्ट्र परिसर, ईरान के संयुक्त राष्ट्र मिशन, ईरानी राजदूत के आवास और हवाई अड्डे जैसे निर्धारित स्थानों तक सीमित किया गया था।इसलिए यह अमेरिका की ओर से सामान्य राजकीय यात्रा की अनुमति नहीं, बल्कि यूएन महासभा में भागीदारी के लिए नियंत्रित प्रवेश है।
आखिर अमेरिका ने वीजा क्यों दिया?
इस पूरे फैसले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है 1947 का संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय समझौता। अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र के मेजबान देश के तौर पर सामान्य परिस्थितियों में विदेशी प्रतिनिधियों को यूएन मुख्यालय तक पहुंच उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी निभाता है। वॉशिंगटन ने इसी मेजबान देश की जिम्मेदारी को वीजा देने के फैसले का आधार बताया है।यही वजह है कि युद्धरत देश के शीर्ष अधिकारियों को भी न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहुंचने का रास्ता दिया गया है।
एक दिन पहले फिलिस्तीन को ना, ईरान को हां
अमेरिका का यह फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसके ठीक एक दिन पहले ट्रंप प्रशासन ने फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास और फिलिस्तीनी अधिकारियों को अमेरिका आने के लिए वीजा देने से इनकार किया था। हालांकि संयुक्त राष्ट्र ने अब्बास को वीडियो के जरिए महासभा को संबोधित करने की अनुमति दी है।इस तरह एक ही अंतरराष्ट्रीय मंच के लिए अमेरिका के दो अलग-अलग फैसले सामने आए हैं—ईरानी नेतृत्व को प्रवेश की अनुमति और फिलिस्तीनी नेतृत्व के लिए प्रवेश पर रोक।अमेरिकी प्रशासन ने दोनों मामलों में अलग-अलग कानूनी और नीतिगत आधार बताए हैं। इसलिए इन दोनों फैसलों को एक ही कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा।
न्यूयॉर्क में क्या होगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पेजेशकियान संयुक्त राष्ट्र के मंच से क्या संदेश देते हैं और अमेरिका उस संदेश पर कैसी प्रतिक्रिया देता है।
क्या ईरान युद्ध समाप्त करने की कोई नई पेशकश करेगा?
क्या परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत की संभावना बनेगी?
क्या अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच औपचारिक या अनौपचारिक संपर्क होगा?
और सबसे अहम—क्या संयुक्त राष्ट्र महासभा युद्ध के मैदान से निकलकर कूटनीति की मेज तक पहुंचने का नया रास्ता खोल पाएगी?
इन सवालों का जवाब अगले सप्ताह न्यूयॉर्क में होने वाली उच्चस्तरीय बैठकों के दौरान मिल सकता है।
दुश्मनी कायम, लेकिन बातचीत की खिड़की खुली
फिलहाल तस्वीर बेहद विरोधाभासी है। एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य संघर्ष जारी है, दूसरी तरफ दोनों देशों के बीच बातचीत के प्रयास पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। इसी बीच दोनों पक्षों के शीर्ष अधिकारी एक ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंचने वाले हैं।इसलिए पेजेशकियान और अराघची का अमेरिका पहुंचना केवल वीजा की खबर नहीं है। यह उस अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक व्यवस्था की भी परीक्षा है, जहां युद्धरत देशों के नेता भी संयुक्त राष्ट्र के मंच पर आमने-सामने बैठ सकते हैं।
अब निगाह न्यूयॉर्क पर होगी—जहां मिसाइलों और सैन्य हमलों के बीच बातचीत की वह मेज सजेगी, जिस पर शायद युद्ध से आगे का रास्ता तलाशने की कोशिश होगी।
एनएसके डेस्क , नई दिल्ली
