बी. के. झा
मुंबई, 25 अगस्त
मुंबई की पहचान सिर्फ लोकल ट्रेन, समुद्र और मायानगरी से नहीं, बल्कि उस मेहनतकश परिवहन व्यवस्था से भी है जो हर दिन लाखों लोगों को उनके घर से स्टेशन, दफ्तर और बाजार तक पहुंचाती है। लेकिन इन दिनों इसी मुंबई की सड़कों पर भाषा की एक नई परीक्षा चल रही है—और इस परीक्षा का असर सीधे यात्री की जेब, ड्राइवर की रोजी-रोटी और महाराष्ट्र की राजनीति पर दिखाई देने लगा है।
ऑटो और टैक्सी चालकों के एक वर्ग की तीन दिन की हड़ताल ने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सार्वजनिक परिवहन चालक के लिए स्थानीय भाषा का व्यावहारिक ज्ञान जरूरी है या भाषा की अनिवार्यता रोजगार की शर्त बनकर आर्थिक दबाव पैदा कर रही है?
विवाद की ताजा वजह आरटीओ की ओर से शुरू की गई मराठी भाषा की जांच है। 21 अगस्त से चल रही जांच में अधिकारियों की ओर से चालकों से रोजमर्रा के काम से जुड़े सवाल पूछे जा रहे हैं। पहले चरण में महाराष्ट्र में 8,217 चालकों की जांच हुई, जिनमें 1,268 को नोटिस दिया गया। मुंबई महानगर क्षेत्र में 3,995 चालकों की जांच में 604 चालक आवश्यक मराठी ज्ञान प्रदर्शित नहीं कर सके।
‘मराठी सीखने से ऐतराज नहीं, परीक्षा के तरीके पर सवाल’
ड्राइवरों का कहना है कि उन्हें मराठी सीखने में आपत्ति नहीं है। असली शिकायत यह है कि जिस भाषा का प्रशिक्षण दिया गया, परीक्षा में उससे बाहर के सवाल पूछे जा रहे हैं। कुछ चालकों का तर्क है कि बड़ी संख्या में ड्राइवर सीमित औपचारिक शिक्षा वाले हैं और रोज कमाने-खाने वाले इस वर्ग को अचानक भाषा परीक्षा की कसौटी पर कसना आसान नहीं है।
कांदिवली में विरोध प्रदर्शन और सड़क जाम के बाद अब तीन दिन की हड़ताल ने इस विवाद को और बड़ा कर दिया है। बारिश से पहले ही परेशान मुंबईकरों को ऑटो-टैक्सी की कमी ने अतिरिक्त मुश्किल में डाल दिया है। कई यात्रियों को वाहन के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा, जबकि रेलवे स्टेशनों तक पहुंचने वाले फीडर रूट भी प्रभावित हुए।
सरकार का तर्क—‘मराठी के प्रोफेसर नहीं बनाना है’
महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि इसे भाषा की कट्टर राजनीति के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के मुताबिक व्यावहारिक मराठी की शर्त नई नहीं है और महाराष्ट्र मोटर वाहन नियमों में इसका आधार पहले से मौजूद था। सरकार अब इसे सख्ती से लागू कर रही है। करीब 1.65 लाख गैर-मराठी भाषी ऑटो-टैक्सी चालकों को प्रशिक्षण दिए जाने और प्रमाणपत्र जारी किए जाने का सरकार का दावा है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी स्पष्ट किया है कि सरकार ड्राइवरों को मराठी का विशेषज्ञ नहीं बनाना चाहती। अपेक्षा केवल इतनी है कि वे यात्रियों से सामान्य बातचीत और कामकाज के लिए जरूरी मराठी समझ और बोल सकें। सरकार की यह दलील व्यावहारिक दिखाई देती है, क्योंकि सार्वजनिक परिवहन में यात्री और चालक के बीच बुनियादी संवाद यातायात सुरक्षा और सेवा की गुणवत्ता से भी जुड़ा है।
लेकिन यहीं दूसरा सवाल सामने आता है—अगर उद्देश्य केवल व्यावहारिक मराठी है तो परीक्षा भी उतनी ही व्यावहारिक, पारदर्शी और प्रशिक्षण आधारित क्यों नहीं होनी चाहिए?
16 सवालों की परीक्षा और ‘आउट ऑफ सिलेबस’ का विवाद
आरटीओ की जांच में 16 सवालों के जरिए ड्राइवरों की कामचलाऊ मराठी परखी जा रही है। इनमें यात्री का गंतव्य, किराया, यात्रा का समय, रास्ता और डिजिटल भुगतान जैसे रोजमर्रा के विषय शामिल बताए गए हैं।सरकार के लिए यह व्यवस्था इसलिए उचित हो सकती है क्योंकि चालक से साहित्य, व्याकरण या मराठी भाषा की उच्च स्तरीय परीक्षा नहीं ली जा रही। लेकिन चालकों के ‘आउट ऑफ सिलेबस’ आरोप को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि प्रशिक्षण में जो सिखाया गया है और मैदान में जो पूछा जा रहा है, दोनों में अंतर है तो विवाद भाषा से हटकर प्रशासनिक निष्पक्षता का बन जाता है।
शिक्षाविदों की दृष्टि से भी वयस्कों को नई भाषा सिखाने का सबसे प्रभावी तरीका परीक्षा का डर नहीं, बल्कि क्रमिक प्रशिक्षण, बोलचाल का अभ्यास और पर्याप्त समय है। रोज 10-12 घंटे सड़क पर रहने वाले ड्राइवरों के लिए नियमित कक्षा में जाना भी आय का नुकसान है। इसलिए सरकार को मोबाइल आधारित पाठ्यक्रम, ऑडियो प्रशिक्षण, कार्यस्थल के निकट कक्षाएं और कई चरणों में परीक्षा जैसे विकल्पों पर विचार करना चाहिए।
सरकार के भीतर से भी उठी नरमी की आवाज
दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे पर केवल विपक्ष ही सरकार को घेर नहीं रहा। सत्तारूढ़ शिवसेना के कुछ विधायकों ने भी ड्राइवरों को मराठी सीखने के लिए अतिरिक्त समय देने और उदार रुख अपनाने की मांग की है। शिवसेना नेता संजय निरुपम ने भी परिवहन मंत्री से कार्रवाई को लेकर नरमी बरतने की अपील की और कहा कि नियम लागू हो, लेकिन इससे परिवारों की रोजी-रोटी खतरे में नहीं पड़नी चाहिए।
भाजपा के परिवहन प्रकोष्ठ की ओर से भी अतिरिक्त 100 दिन देने की मांग सामने आ चुकी है। यानी सत्ता पक्ष के भीतर भी यह महसूस किया जा रहा है कि भाषा नीति और रोजगार की सुरक्षा के बीच संतुलन जरूरी है।
विपक्ष के लिए मुद्दा, शिवसेना के लिए ‘मराठी अस्मिता’
यह विवाद अब पूरी तरह राजनीतिक हो चुका है। महाराष्ट्र में मराठी भाषा का सवाल लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण आधार रहा है। यही वजह है कि इस बार भी दो शिवसेनाओं के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा दिखाई दे रही है।एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना सरकार के माध्यम से नियम लागू कर रही है, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने भाषा के सवाल पर मराठी हितों की चिंता तो जताई है, लेकिन साथ ही मराठी ऑटो चालकों की आय और रोजगार से जुड़े दूसरे मुद्दे भी उठाए हैं।
संजय राउत ने बाइक टैक्सी के मुद्दे को भी इससे जोड़ते हुए कहा है कि सरकार को मराठी ऑटो चालकों की रोजी-रोटी पर चोट नहीं करनी चाहिए।
कांग्रेस ने भी सख्त कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष वर्षा गायकवाड़ ने नीति से ड्राइवरों के रोजगार पर खतरा बताया, जबकि कांग्रेस नेता नाना पटोले ने भाषाई स्वतंत्रता की बात कही। पूर्व सांसद संजय निरुपम ने भी कार्रवाई में नरमी की मांग की है।
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी महाराष्ट्र सरकार के फैसले पर सवाल उठाए, जिसके जवाब में मंत्री प्रताप सरनाईक ने पलटवार करते हुए कहा कि महाराष्ट्र की राजनीति पर टिप्पणी करने के बजाय अखिलेश को उत्तर प्रदेश के चुनावों पर ध्यान देना चाहिए।
कानून का सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं
इस विवाद का एक गंभीर पहलू कानूनी भी है। भाषा को सार्वजनिक परिवहन सेवा से जोड़ने की सरकारी शक्ति और रोजगार के अधिकार के बीच संतुलन का प्रश्न उठना स्वाभाविक है। इसी मुद्दे पर बॉम्बे हाईकोर्ट के पुराने रुख का भी संदर्भ सामने आ रहा है। 2017 में अदालत ने ऑटो परमिट से जुड़ी ऐसी ही एक मराठी भाषा संबंधी शर्त को खारिज किया था। मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ जनहित याचिका दायर किए जाने की तैयारी की खबरें भी सामने आई हैं।
कानूनविदों के लिए असली परीक्षा यही होगी कि क्या राज्य की भाषाई नीति सार्वजनिक सेवा की गुणवत्ता सुधारने के लिए आनुपातिक और गैर-भेदभावपूर्ण तरीके से लागू की जा रही है, या इसका प्रभाव किसी खास वर्ग के रोजगार पर असंगत रूप से पड़ रहा है।
कानून की कसौटी पर केवल उद्देश्य नहीं, बल्कि प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी—
नियम स्पष्ट है या नहीं, परीक्षा पारदर्शी है या नहीं, प्रशिक्षण पर्याप्त है या नहीं और कार्रवाई से पहले उचित अवसर दिया जा रहा है या नहीं।मुंबई का सवाल सिर्फ मराठी का नहीं मुंबई देश के हर हिस्से से आए लोगों को रोजगार देने वाला शहर रहा है।
उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, गुजरात, दक्षिण भारत और देश के दूसरे हिस्सों से आए लाखों लोग यहां की अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। दूसरी ओर मराठी भाषा और महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान का सम्मान भी उतना ही स्वाभाविक अधिकार है।
इसलिए बहस को ‘मराठी बनाम हिंदी’ या ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ में बदल देना शायद समस्या का सबसे आसान, लेकिन सबसे खतरनाक समाधान होगा।एक व्यावहारिक रास्ता यह हो सकता है कि सरकार मराठी सीखने की बाध्यता को बनाए रखे, लेकिन सजा को अंतिम विकल्प बनाए।
ड्राइवर को पर्याप्त प्रशिक्षण, मुफ्त या कम लागत की कक्षाएं, ऑडियो-वीडियो पाठ्यक्रम, दो-तीन चरणों में परीक्षा और अपील का स्पष्ट अवसर दिया जाए। परीक्षा में वही पूछा जाए जो प्रशिक्षण में पढ़ाया गया है और हर टेस्ट की रिकॉर्डिंग तथा मूल्यांकन की प्रक्रिया पारदर्शी हो।
सरकार ने नए बैज की भाषा जांच की वीडियोग्राफी शुरू करने का निर्णय भी लिया है, जो पारदर्शिता की दिशा में उपयोगी कदम हो सकता है।
राजनीति की ‘भाषा’ और मुंबई की ‘जरूरत’
आज मुंबई के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि ड्राइवर मराठी सीखें या नहीं। सवाल यह है कि मराठी सीखने की प्रक्रिया सम्मानजनक होगी या भय पैदा करने वाली?
भाषा किसी शहर से जुड़ने का पुल बन सकती है, लेकिन यदि वही भाषा रोजगार छिनने के डर से जुड़ जाए तो पुल दीवार भी बन सकता है।महाराष्ट्र सरकार के पास इस विवाद को अपनी भाषाई नीति की जीत बनाने का विकल्प है, लेकिन उससे बड़ा अवसर इसे समावेशी भाषा नीति का मॉडल बनाने का है।
विपक्ष के पास भी केवल विरोध का नहीं, बल्कि ऐसा वैकल्पिक रास्ता सुझाने का अवसर है जिसमें मराठी का सम्मान भी रहे और मेहनतकश ड्राइवर की रोजी-रोटी भी सुरक्षित रहे।
फिलहाल मुंबई की सड़कों पर ऑटो-टैक्सी की कमी ने इस विवाद को किताबों और सरकारी फाइलों से निकालकर आम आदमी के सफर तक पहुंचा दिया है।
आने वाले दिनों में यह तय करेगा कि मराठी की यह परीक्षा सिर्फ ड्राइवरों की भाषा जांच थी—या महाराष्ट्र की राजनीति, कानून और सामाजिक सह-अस्तित्व की भी एक बड़ी परीक्षा।
NSK news Ind

