बी के झा
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नई दिल्ली, 28 अगस्त
भारतीय राजनीति में कुछ चीजें ऐसी हैं जिनका भाव सिर्फ बाजार तय नहीं करता, बल्कि उनकी कीमत सत्ता के गलियारों तक पहुंच जाती है। प्याज उन्हीं में से एक है। जब इसकी कीमत रसोई में बढ़ती है तो उसकी तपिश संसद से लेकर सड़क तक महसूस की जाती है। दिल्ली में प्याज की कीमतों में हालिया उछाल के बीच नासिक के लासलगांव से 450 टन प्याज लेकर पहुंची ‘कांदा एक्सप्रेस’ इसी राजनीतिक और आर्थिक संवेदनशीलता की नई कहानी लिख रही है।
सरकार ने दिल्ली में 35 रुपये प्रति किलो की रियायती दर पर प्याज उपलब्ध कराने का फैसला किया है। बफर स्टॉक से प्याज की आपूर्ति बढ़ाकर सरकार ने साफ संकेत दिया है कि वह कीमतों को बेलगाम नहीं छोड़ना चाहती। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कदम सिर्फ तत्काल राहत देगा या महंगाई की उस चुनौती को भी संबोधित करेगा, जिसने मध्यमवर्ग के घरेलू बजट को लगातार दबाव में रखा है?
प्याज की कीमत और राजनीति का पुराना रिश्ता
प्याज भारतीय राजनीति में सिर्फ खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि कई बार चुनावी मुद्दा बन चुका है। इसकी कीमत बढ़ती है तो सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठते हैं और विपक्ष के हाथ में जनता की रसोई का सबसे आसान राजनीतिक हथियार आ जाता है।यही वजह है कि 50-60 रुपये किलो तक पहुंचा प्याज विपक्ष के लिए महंगाई का प्रतीक बन सकता है।
दूसरी ओर सरकार के लिए 35 रुपये किलो की बिक्री यह बताने का अवसर है कि उसने बाजार में हस्तक्षेप कर उपभोक्ताओं को राहत देने की कोशिश की।लेकिन राजनीति का सवाल यह नहीं है कि आज प्याज 35 रुपये किलो मिलेगा या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या आम आदमी को अगले महीने भी इतनी ही राहत मिलेगी?
‘कांदा एक्सप्रेस’ सरकार की त्वरित प्रतिक्रिया, मगर असली चुनौती आपूर्ति की
450 टन प्याज लेकर पहुंची विशेष मालगाड़ी और बफर स्टॉक से कुल 840 टन प्याज दिल्ली भेजने का निर्णय तत्काल आपूर्ति बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।अर्थशास्त्र की बुनियादी समझ यही कहती है कि जब बाजार में किसी वस्तु की आपूर्ति कम होती है और मांग बनी रहती है तो कीमत बढ़ने लगती है। ऐसे में सरकारी बफर स्टॉक बाजार में उतारना कीमतों पर दबाव कम करने का प्रभावी अल्पकालिक उपाय हो सकता है।
लेकिन विशेषज्ञों के नजरिए से दीर्घकालिक समाधान सिर्फ सरकारी स्टॉक बेचने में नहीं है। प्याज की खेती, भंडारण, परिवहन, मंडी व्यवस्था और खुदरा वितरण की पूरी श्रृंखला को मजबूत करना जरूरी है।वरना हर बार कीमत बढ़ने के बाद ‘कांदा एक्सप्रेस’ चलानी पड़ेगी और सवाल फिर वहीं खड़ा रहेगा।
विपक्ष को मिला महंगाई का मुद्दा
सरकार के फैसले ने विपक्ष के लिए भी राजनीतिक मैदान तैयार कर दिया है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने भाजपा और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पर निशाना साधते हुए महंगाई, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार पर हमला बोला है।
विपक्ष का तर्क है कि यदि सरकार को बफर स्टॉक से प्याज निकालकर 35 रुपये किलो बेचना पड़ रहा है तो इसका मतलब है कि बाजार में कीमतों का दबाव गंभीर है। विपक्ष इस मुद्दे को मध्यमवर्ग की रसोई, घरेलू खर्च और बढ़ती महंगाई से जोड़कर सरकार को घेरने की कोशिश करेगा।
राजनीतिक दृष्टि से यह रणनीति स्वाभाविक है। क्योंकि बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर राजनीतिक बहस लंबी और जटिल हो सकती है, लेकिन महंगे प्याज का असर जनता सीधे अपनी जेब में महसूस करती है।यही कारण है कि रसोई का हिसाब-किताब अक्सर चुनावी गणित को प्रभावित कर देता है।
भाजपा के सामने दोहरी चुनौती
भाजपा और सरकार के सामने चुनौती सिर्फ प्याज की कीमत घटाने की नहीं है। चुनौती यह भी है कि इस राहत को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया जाए।यदि सरकारी बिक्री के बावजूद आम उपभोक्ता को बाजार में प्याज महंगा मिलता रहा, तो विपक्ष सरकार के दावे पर सवाल उठाएगा। यदि 35 रुपये किलो प्याज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहा और बाजार की कीमतों में भी गिरावट आई, तो सरकार इसे अपनी त्वरित कार्रवाई की सफलता के रूप में पेश कर सकती है।
अर्थात आने वाले दिनों में प्याज की कीमत सिर्फ आर्थिक आंकड़ा नहीं रहेगी, बल्कि सरकार की प्रशासनिक क्षमता का राजनीतिक पैमाना भी बन सकती है।दिल्ली का मध्यमवर्ग सबसे महत्वपूर्ण कड़ी
दिल्ली में इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मध्यमवर्ग है। आय बढ़ने की रफ्तार और घरेलू खर्च के बीच संतुलन बिगड़ने पर सबसे पहले रसोई प्रभावित होती है।प्याज, टमाटर, आलू, दाल, चीनी और खाद्य तेल जैसे उत्पादों की कीमतें परिवार के मासिक बजट को सीधे प्रभावित करती हैं। एक वस्तु की कीमत में मामूली वृद्धि भले ही अलग से बड़ी न लगे, लेकिन कई वस्तुओं की कीमत एक साथ बढ़ने पर इसका संचयी प्रभाव बड़ा हो जाता है।
यही वजह है कि स्थानीय नागरिकों के लिए सरकारी प्याज सिर्फ 35 रुपये की कीमत नहीं है। यह उस सवाल का जवाब है कि क्या सरकार उनकी रोजमर्रा की जिंदगी के खर्च को समझ रही है?
शिक्षाविदों की नजर में असली सवाल
शिक्षाविदों और अर्थशास्त्र के जानकारों की दृष्टि से सरकार का यह कदम तत्काल राहत देने वाला है, लेकिन इसे स्थायी नीति का विकल्प नहीं माना जा सकता।यदि किसान को उत्पादन का उचित मूल्य मिलता है और उपभोक्ता को भी उचित कीमत पर प्याज उपलब्ध होता है, तभी कृषि बाजार की व्यवस्था टिकाऊ मानी जाएगी। सरकार के लिए सबसे कठिन काम यही संतुलन बनाना है।
बहुत कम कीमत किसान के लिए नुकसानदेह हो सकती है और बहुत अधिक कीमत उपभोक्ता की रसोई पर बोझ डालती है। इसलिए चुनौती सिर्फ ‘सस्ता प्याज’ उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि किसान और उपभोक्ता दोनों के हितों के बीच संतुलन कायम करने की है।
क्या ‘कांदा एक्सप्रेस’ चुनावी एक्सप्रेस बनेगी?
यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है।विपक्ष पहले ही संकेत दे चुका है कि प्याज, चीनी और अन्य घरेलू सामान की कीमतों को लेकर वह सरकार को घेरने की तैयारी में है। भाजपा के लिए जवाब सीधा है—सरकार ने कीमत बढ़ने के बाद हाथ पर हाथ रखकर बैठने के बजाय बफर स्टॉक का इस्तेमाल किया और 35 रुपये किलो प्याज उपलब्ध कराया।अब जनता तय करेगी कि उसे सरकार की कार्रवाई राहत के रूप में दिखाई देती है या महंगाई की विफलता के बाद उठाया गया कदम।
राजनीति में अक्सर जनता भाषण नहीं, अपनी जेब का हिसाब सुनती है। दिल्ली की रसोई में यदि प्याज सस्ता रहता है तो सरकार को इसका राजनीतिक लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि कुछ दिनों की राहत के बाद कीमत फिर चढ़ती है तो विपक्ष के पास सरकार को घेरने के लिए तैयार मुद्दा मौजूद रहेगा।
निष्कर्ष:
ट्रेन पहुंची है, मंजिल अभी दूर है ‘कांदा एक्सप्रेस’ दिल्ली पहुंच चुकी है
35 रुपये किलो का सरकारी प्याज भी उपभोक्ताओं के लिए राहत की उम्मीद लेकर आया है। लेकिन यह अभियान तभी सफल माना जाएगा जब इसका असर सिर्फ सरकारी बिक्री केंद्रों तक सीमित न रहकर पूरे बाजार की कीमतों पर दिखाई दे।सरकार के लिए यह सिर्फ प्याज बेचने का अभियान नहीं, बल्कि महंगाई के मोर्चे पर भरोसा कायम करने की परीक्षा है। विपक्ष के लिए यह जनता की रसोई को राजनीतिक मुद्दा बनाने का अवसर है। और आम आदमी के लिए यह किसी राजनीतिक बहस से कहीं ज्यादा सीधा सवाल है—
महीने के अंत में उसकी जेब में कितना पैसा बचता है?
क्योंकि लोकतंत्र में चुनावी नारों की आवाज भले ही तेज हो, लेकिन रसोई का खाली बजट उससे कहीं ज्यादा गहरी आवाज करता है।
और यही वजह है कि नासिक से दिल्ली पहुंची ‘कांदा एक्सप्रेस’ की असली कहानी रेलवे ट्रैक पर नहीं, दिल्ली की रसोई और आने वाले चुनावी मैदान में लिखी जाएगी।
