NH-27 पर कपड़ा कारोबारी की कार पर ताबड़तोड़ फायरिंग, तीन गोलियों ने खोल दी बिहार की कानून-व्यवस्था की परतें, चलती कार पर गोलियां बरसाकर फरार हुए बदमाश

बी के झा

NSK news India

पटना/सुपौल, 7 अक्टूबर

बिहार में अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के सरकारी दावों के बीच सुपौल से सामने आई गोलीबारी की घटना ने एक बार फिर कानून-व्यवस्था को लेकर बहस तेज कर दी है। भपटियाही थाना क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग-27 पर मंगलवार रात एक कपड़ा व्यवसायी की इनोवा कार को निशाना बनाकर अपराधियों ने तीन राउंड फायरिंग कर दी। संयोग रहा कि कार में सवार व्यवसायी महेश आनंद बाल-बाल बच गए।घटना माकर गढ़िया के समीप उस समय हुई, जब करजाइन बाजार निवासी कपड़ा व्यवसायी महेश आनंद सुपौल से अपना कारोबारी काम निपटाकर घर लौट रहे थे।

रात करीब साढ़े नौ से दस बजे के बीच उनकी कार जैसे ही माकर गढ़िया के पास पहुंची, पहले से घात लगाए बदमाशों ने वाहन पर लगातार गोलियां चला दीं।गोलियों की आवाज और तेज रफ्तार ने बचाई जानअचानक हुई फायरिंग से व्यवसायी घबरा गए, लेकिन उन्होंने गाड़ी रोकने के बजाय उसकी रफ्तार बढ़ा दी। उनका फैसला शायद उनकी जान बचाने में निर्णायक साबित हुआ।

फायरिंग के बाद वह सीधे सिमराही बाजार पहुंचे और वहां राघोपुर थाना पुलिस को घटना की जानकारी दी।मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने व्यवसायी को सुरक्षा उपलब्ध कराई। एक जवान को उनकी कार में बैठाया गया और पुलिस गश्ती वाहन के साथ उन्हें सुरक्षित करजाइन बाजार स्थित उनके घर तक पहुंचाया गया।घटना के बाद करजाइन, राघोपुर और भपटियाही थानों की पुलिस सक्रिय हुई। तीनों थानों की पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंची और आसपास के इलाकों में पूछताछ शुरू की।

तीन थानों की पुलिस, फिर भी अपराधियों का सुराग नहीं

पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर अपराधियों ने व्यवसायी की कार को निशाना क्यों बनाया?

क्या यह रंगदारी का मामला था?

क्या कारोबारी को पहले से धमकी दी जा रही थी?

क्या अपराधियों का मकसद लूट था?

या फिर इसके पीछे कोई व्यक्तिगत रंजिश अथवा पुराना विवाद है?

फिलहाल इनमें से किसी भी संभावना की पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर जांच कर रही है। अपराधियों की पहचान और गिरफ्तारी के लिए तकनीकी तथा मानवीय स्रोतों की मदद लिए जाने की बात कही गई है।

सवाल सिर्फ तीन गोलियों का नहीं, सुरक्षा के भरोसे का है

इस घटना को महज एक आपराधिक वारदात मानकर आगे बढ़ जाना शायद पर्याप्त नहीं होगा। सवाल यह है कि जिस राष्ट्रीय राजमार्ग पर रात-दिन हजारों वाहन गुजरते हैं, वहां अपराधी एक कारोबारी की कार को निशाना बनाकर तीन राउंड फायरिंग करने का दुस्साहस कैसे कर पाए?

व्यवसायी का आरोप नहीं, बल्कि घटना का घटनाक्रम स्वयं सुरक्षा व्यवस्था के सामने कई सवाल खड़े करता है। अगर अपराधियों का मकसद लूट या रंगदारी था, तो यह मामला कारोबारी सुरक्षा से जुड़ा है। यदि व्यक्तिगत रंजिश थी, तब भी पुलिस के लिए अपराधियों तक पहुंचना और घटना के पीछे की पूरी साजिश का खुलासा करना जरूरी है।और यदि यह महज एक राहगीर वाहन को निशाना बनाकर की गई फायरिंग थी, तो मामला और भी गंभीर हो जाता है।

‘अपराधी बिहार छोड़ें या जेल जाएं’ वाले संदेश की जमीन पर परीक्षा

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पिछले महीनों में अपराधियों के खिलाफ कड़े तेवर दिखाए हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपराधियों को बिहार छोड़ने या कानून का सामना करने की चेतावनी दी है। सरकार की ओर से पुलिस को अपराध पर सख्ती बरतने के संदेश भी दिए गए हैं।लेकिन लोकतंत्र में सरकार के दावों की असली परीक्षा बयान से नहीं, जमीन पर कानून-व्यवस्था की स्थिति से होती है।सुपौल की यह घटना इसी अंतर पर सवाल खड़ा करती है।

एक तरफ सरकार अपराध के खिलाफ सख्त नीति की बात कर रही है, दूसरी तरफ राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक व्यवसायी की चलती कार पर गोलियां चल जाती हैं। इसलिए अब असली सवाल यह नहीं है कि सरकार अपराधियों के खिलाफ क्या कह रही है, बल्कि यह है कि इस मामले में अपराधियों तक पुलिस कितनी जल्दी पहुंचती है और उन्हें कानून के कटघरे तक कैसे लाया जाता है।

राजनीतिक गलियारों में भी उठेगा कानून-व्यवस्था का मुद्दा

बिहार में कानून-व्यवस्था हमेशा से राजनीतिक बहस का केंद्रीय मुद्दा रही है। सत्ता पक्ष जहां अपराध नियंत्रण के लिए पुलिस कार्रवाई और सख्त नीति को सामने रखता है, वहीं विपक्ष आमतौर पर आपराधिक घटनाओं को लेकर सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाता रहा है।सुपौल की घटना के बाद भी राजनीतिक बहस का केंद्र यही रहने की संभावना है कि अपराधियों में कानून का कितना भय है और आम कारोबारी तथा नागरिक अपने आपको कितना सुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

हालांकि, किसी एक घटना के आधार पर पूरे बिहार की कानून-व्यवस्था पर अंतिम निष्कर्ष निकालना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन ऐसी घटनाएं निश्चित रूप से सरकार और पुलिस के लिए चेतावनी का काम करती हैं—विशेषकर तब, जब वारदात किसी सुनसान गली में नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजमार्ग पर सामने आए।

कानूनविदों की नजर में जांच के कई पहलू महत्वपूर्ण

कानून के जानकारों के नजरिए से इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस घटना की कड़ियों को वैज्ञानिक तरीके से जोड़े। फायरिंग की सटीक जगह, गोली के निशान, वाहन पर हुए नुकसान, घटनास्थल के आसपास की गतिविधियां, संभावित सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन और व्यवसायी की हालिया गतिविधियों की जांच अपराधियों तक पहुंचने में अहम भूमिका निभा सकती है।इसके साथ यह भी पता लगाना जरूरी होगा कि व्यवसायी को पहले किसी तरह की धमकी, रंगदारी की मांग या विवाद का सामना तो नहीं करना पड़ा था।

समाजसेवी संगठनों के लिए भी बड़ा सवाल

व्यापारियों की सुरक्षा केवल पुलिस का विषय नहीं है। यह स्थानीय प्रशासन, कारोबारी संगठनों और नागरिक समाज से भी जुड़ा सवाल है। राष्ट्रीय राजमार्गों और प्रमुख बाजारों के आसपास प्रभावी गश्त, सीसीटीवी निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों पर तत्काल कार्रवाई और व्यापारियों से पुलिस का नियमित संवाद अपराध की रोकथाम में महत्वपूर्ण हो सकता है।

स्थानीय लोगों में घटना के बाद पैदा हुई चिंता

इसी बात का संकेत है कि सड़क पर निकलने वाले आम नागरिकों के लिए सुरक्षा का भरोसा कितना महत्वपूर्ण है।अब पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती

सुपौल की इस घटना में सबसे बड़ी चुनौती अपराधियों की गिरफ्तारी है। तीन राउंड फायरिंग के बावजूद कोई व्यक्ति घायल नहीं हुआ, लेकिन यह तथ्य घटना की गंभीरता को कम नहीं करता।

अब निगाह इस बात पर है कि पुलिस इस मामले को महज अज्ञात अपराधियों के खिलाफ प्राथमिकी तक सीमित रखती है या फिर फायरिंग के पीछे की पूरी कहानी सामने लाती है।

क्योंकि सवाल सिर्फ महेश आनंद की कार पर चली तीन गोलियों का नहीं है।सवाल उस भरोसे का है, जिसके सहारे बिहार का व्यापारी रात में अपना कारोबार खत्म करके सड़क पर घर लौटता है।

और अगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलती कार भी अपराधियों के निशाने से सुरक्षित नहीं है, तो कानून-व्यवस्था के सरकारी दावों की असली कसौटी अब कार्रवाई के नतीजे होंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *