बी के झा
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पटना, 31 अगस्त
सूरज डूब रहा है… जंगल पर अंधेरा उतरने लगा है… मंदिर के कपाट बंद होने वाले हैं। दिनभर जहां श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है, वहां अब धीरे-धीरे सन्नाटा पसरने लगता है। मंदिर से जुड़े लोग अपने घरों की ओर लौट जाते हैं। यहां तक कि मंदिर के पुजारी भी रात गुजारने के लिए वहां नहीं रुकते।
क्यों?
इस सवाल का कोई ऐसा जवाब नहीं है जिसे इतिहास की किताब में अंतिम सत्य की तरह दर्ज किया जा सके। लेकिन सदियों से चली आ रही एक लोकमान्यता इसका जवाब देती है—सूर्यास्त के बाद इस जंगल और मंदिर के आसपास कुछ ऐसी शक्तियों का प्रभाव माना जाता था, जिनसे लोग दूरी बनाए रखते थे।
पटना से करीब 35 किलोमीटर दूर बिहटा के अमहारा, राघोपुर और कंचनपुर गांवों की सीमा पर स्थित मां वन देवी मंदिर आज इसी रहस्य, आस्था और लोकविश्वास का केंद्र है।और अब इसी मंदिर से जुड़ी कहानी ने बॉलीवुड में दस्तक दे दी है।
सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की आने वाली फिल्म ‘द वन-फोर्स ऑफ फॉरेस्ट’ की दुनिया की प्रेरणा इसी प्राचीन मंदिर और उससे जुड़ी लोककथाओं से मिली है।
यानी जिस कहानी को बिहार के गांवों में लोग पीढ़ियों से सुनते आए हैं, वही अब बड़े पर्दे पर अलौकिक शक्तियों, रहस्यमयी जंगल और फैंटेसी की दुनिया बनकर सामने आने वाली है।
बिहार के एक मंदिर ने फिल्मकार को क्यों रोक लिया?
‘द वन’ की कहानी का जन्म किसी फिल्मी पटकथा से नहीं, बल्कि एक जिज्ञासा से हुआ।फिल्म के लेखक और निर्माता अरुणाभ कुमार को जब वन देवी मंदिर और उससे जुड़ी लोककथाओं के बारे में जानकारी मिली, तो उन्होंने इसे सिर्फ एक धार्मिक स्थल की कहानी मानकर नजरअंदाज नहीं किया।उन्होंने स्थानीय लोगों से बात की।
ग्रामीणों से मंदिर की मान्यताओं के बारे में जाना।
पुजारियों से बातचीत की।
जंगल और मंदिर से जुड़ी पुरानी कहानियों को समझने की कोशिश की।
और जितना वह इस कहानी के भीतर जाते गए, उतना ही उन्हें लगा कि इसके अंदर एक ऐसी दुनिया छिपी है जिसे बड़े पर्दे पर उतारा जा सकता है। करीब दो साल पहले उन्होंने यह कहानी निर्देशक दीपक मिश्रा को सुनाई।कहानी ने दीपक मिश्रा को भी आकर्षित किया।फिर दोनों एकता कपूर के पास पहुंचे।और यहीं से बिहार की एक स्थानीय लोककथा के बॉलीवुड तक पहुंचने की कहानी शुरू हुई।
350-400 साल पुराना मंदिर, लेकिन रहस्य आज भी जिंदा
वन देवी मंदिर को स्थानीय लोग करीब 350 से 400 साल पुराना मानते हैं। इसकी स्थापना की मान्यताएं इसे 16वीं सदी से जोड़ती हैं।मंदिर की बनावट और पूजा की परंपरा भी इसे खास बनाती है।यहां देवी की कोई पारंपरिक प्रतिमा नहीं है। इसके बजाय एक पवित्र पिंड की पूजा होती है।
मंदिर चारों ओर से हरियाली और प्राकृतिक वातावरण से घिरा है। लेकिन इस शांत वातावरण के पीछे लोकविश्वास की एक ऐसी परत है, जिसने इस स्थान को वर्षों से रहस्य का केंद्र बनाए रखा है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, कभी मंदिर के आसपास घना जंगल हुआ करता था। जंगल को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित थीं। कहा जाता था कि वहां ऐसी शक्तियां मौजूद थीं, जिनसे लोगों को नुकसान पहुंच सकता था।इसी वजह से शाम ढलने के बाद जंगल में जाना लोगों ने छोड़ दिया।धीरे-धीरे यह सिर्फ सावधानी नहीं रही, बल्कि लोकपरंपरा बन गई।
सूर्यास्त के बाद मंदिर में कोई क्यों नहीं रुकता?
यही इस मंदिर की कहानी का सबसे रहस्यमयी हिस्सा है।स्थानीय मान्यता के अनुसार, सूर्यास्त के बाद मंदिर परिसर और उसके आसपास के जंगल में रुकना मना है।मंदिर के कपाट बंद होने के बाद पुजारी भी वहां रात नहीं गुजारते।यह परंपरा आज भी लोगों की बातचीत में सुनाई देती है।
अब सवाल यह है कि यह डर कब पैदा हुआ?
किस घटना ने इसे जन्म दिया?
क्या यह सिर्फ जंगल और अंधेरे से जुड़ा पुराना भय था, या इसके पीछे कोई ऐसी घटना थी जिसे समय के साथ लोककथा ने रहस्य में बदल दिया?
इन सवालों के निश्चित जवाब शायद किसी दस्तावेज में नहीं मिलते।लेकिन लोककथाओं की दुनिया में हर कहानी का सच सिर्फ दस्तावेजों से तय नहीं होता।कभी-कभी किसी जगह की पहचान उसके बारे में कही जाने वाली कहानी से बनती है।वन देवी मंदिर भी शायद ऐसी ही जगह है।
‘पंचायत’ वाले दीपक मिश्रा अब रचेंगे रहस्य की दुनिया‘द वन’ का निर्देशन दीपक मिश्रा ने किया है, जिन्हें दर्शक ‘पंचायत’ जैसी लोकप्रिय सीरीज के लिए जानते हैं।लेकिन इस बार उनकी दुनिया गांव की सहज जिंदगी से बिल्कुल अलग है।यहां जंगल है, रहस्य है, अलौकिक शक्तियों की कल्पना है और सदियों पुराने लोकविश्वास की पृष्ठभूमि है।
दीपक मिश्रा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि इस कहानी को सिर्फ संवादों और सामान्य शूटिंग से पर्दे पर कैसे उतारा जाए।इसके लिए फिल्म की दुनिया तैयार करने में स्पेशल इफेक्ट्स और एनिमेशन का इस्तेमाल किया गया है।
यानी बिहार के एक वास्तविक मंदिर से जन्मी कहानी को तकनीक के सहारे एक ऐसी काल्पनिक दुनिया दी गई है, जिसमें दर्शक सिर्फ कहानी देखेंगे नहीं, बल्कि उसके भीतर प्रवेश करने का अनुभव करेंगे।
सिद्धार्थ मल्होत्रा की नई दुनिया, तमन्ना के साथ रहस्य का सफर
फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया मुख्य भूमिकाओं में हैं।टीजर में दिखाई गई दुनिया साधारण फिल्मी कहानी से अलग नजर आती है। रहस्यमयी वातावरण, जंगल, अलौकिक शक्तियों के संकेत और लोककथा की छाया फिल्म को एक अलग पहचान देते हैं।
सुनील ग्रोवर, मनीष पॉल, अजय राजू और अनूप सोनी भी फिल्म का हिस्सा हैं।फिल्म 25 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है।
असल कहानी मंदिर की है या उस डर की, जो सदियों से जिंदा है?
‘द वन’ की सबसे दिलचस्प बात शायद यह नहीं कि यह एक फैंटेसी फिल्म है।दिलचस्प बात यह है कि इसकी जड़ें एक ऐसी जगह में हैं, जहां इतिहास और लोकविश्वास एक-दूसरे में घुल जाते हैं।एक तरफ करीब चार सौ साल पुराना मंदिर है।दूसरी तरफ जंगल से जुड़ी सदियों पुरानी मान्यताएं हैं।
एक तरफ श्रद्धा है।दूसरी तरफ रहस्य।और इन दोनों के बीच खड़ा है एक सवाल—
सूरज डूबने के बाद आखिर ऐसा क्या है, जिसके कारण आज भी लोग उस जगह से दूर रहना पसंद करते हैं?
शायद इस सवाल का जवाब कभी न मिले।लेकिन सिनेमा ने इस सवाल को एक नई जिंदगी जरूर दे दी है।बिहार के गांवों में कही जाने वाली एक लोककथा अब करोड़ों दर्शकों के सामने होगी। जिस जंगल को स्थानीय लोग सूर्यास्त के बाद सुनसान छोड़ देते हैं, उसी जंगल की कल्पना अब बड़े पर्दे पर अलौकिक शक्तियों और रहस्यों की दुनिया के रूप में दिखाई जाएगी।
यही ‘द वन’ की सबसे बड़ी खासियत है—इसकी कहानी पूरी तरह काल्पनिक होकर भी उस लोकविश्वास से जुड़ी है, जिसे बिहार की मिट्टी ने सदियों से अपने भीतर संभालकर रखा है।
एक प्राचीन मंदिर… एक रहस्यमयी जंगल…
सूर्यास्त के बाद पसरा सन्नाटा… और सदियों पुरानी एक लोककथा।
अब देखना यह है कि ‘द वन’ इस रहस्य को कितना डरावना, कितना रोमांचक और कितना विश्वसनीय बनाकर दर्शकों के सामने पेश करती है।
