पीएनबी के करेंसी चेस्ट में 17 करोड़ की जाली करेंसी से हड़कंप,तीन बैंक अधिकारियों पर कार्रवाई, आरोपियों के खाते सीज, बैंकिंग सिस्टम की निगरानी पर बड़ा सवाल

बी के झा

NSK news Ind

सहारनपुर, यूपी, 2 सितंबर

पंजाब नेशनल बैंक के सहारनपुर स्थित करेंसी चेस्ट में करीब 17 करोड़ रुपये की नकली करेंसी मिलने से बैंकिंग व्यवस्था में हड़कंप मच गया है। मामला सिर्फ करोड़ों के जाली नोट मिलने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में संदिग्ध करेंसी बैंकिंग सिस्टम की गिनती, छंटाई, सत्यापन और निगरानी की कई परतों को पार कर करेंसी चेस्ट तक कैसे पहुंचती रही।मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आरबीआई और पीएनबी की 21 सदस्यीय संयुक्त टीम सहारनपुर पहुंचकर करीब आठ घंटे तक जांच में जुटी रही।

टीम ने नकदी के पूरे ट्रेल की पड़ताल शुरू कर दी है। पुलिस और बैंक की आंतरिक जांच के साथ आरबीआई की जांच आगे बढ़ने से अब यह मामला बैंकिंग सुरक्षा के साथ-साथ वित्तीय अपराध की बड़ी जांच का रूप लेता दिखाई दे रहा है।

4.30 लाख की कमी से खुला करोड़ों के नकली नोटों का मामला

पूरे मामले की शुरुआत करीब 11.50 करोड़ रुपये की करेंसी आरबीआई के जयपुर कार्यालय भेजे जाने के बाद सामने आई करीब 4.30 लाख रुपये की कमी से हुई। शुरुआती तौर पर यह एक सीमित वित्तीय गड़बड़ी जैसी दिखाई दी, लेकिन जांच आगे बढ़ी तो करेंसी चेस्ट के भीतर करीब 7.40 करोड़ रुपये के नकली नोट मिलने का मामला सामने आया।इसके बाद जांच का दायरा बढ़ता गया और संदिग्ध करेंसी की कुल राशि करीब 17 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।

यहीं से जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया—अगर नोट इतने बड़े पैमाने पर नकली थे तो वे बैंक के कैश सिस्टम में पहुंचे कैसे?

चेस्ट तक नकदी पहुंचने की हर कड़ी की जांच

करेंसी चेस्ट में आने वाली नकदी के लिए निर्धारित प्रक्रिया होती है। नोट प्राप्त किए जाते हैं, उनकी गिनती और सत्यापन किया जाता है, फिर उन्हें बंडल बनाकर रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता है। ऐसे में करोड़ों रुपये के नकली नोटों का लंबे समय तक सिस्टम में बने रहना सामान्य घटना नहीं माना जा सकता।जांच टीम अब यह पता लगाने में जुटी है कि संदिग्ध नोट—- किस तारीख को बैंक में पहुंचे?

किस शाखा या करेंसी चेस्ट से आए?

किस कर्मचारी ने नकदी प्राप्त की?

किस अधिकारी ने उसका सत्यापन किया?

किस बंडल नंबर में नोट दर्ज किए गए?

नोटों पर लगी सील और रिकॉर्ड में क्या समानता है?

कैश रजिस्टर और डिजिटल रिकॉर्ड में क्या दर्ज है?

नकली नोट पहचानने वाली मशीनों से जांच में क्या सामने आया?

इन सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि मामला सिर्फ लापरवाही का है या इसके पीछे सुनियोजित नेटवर्क की भी कोई भूमिका रही है।

दूसरी शाखा या चेस्ट से आया कैश तो बढ़ेगा जांच का दायरा

जांच का एक अहम पहलू यह भी है कि संदिग्ध करेंसी सीधे सहारनपुर के करेंसी चेस्ट में पहुंची या फिर किसी दूसरी शाखा अथवा करेंसी चेस्ट के जरिए यहां आई।अगर जांच में यह सामने आता है कि नकली नोट किसी अन्य बैंकिंग केंद्र से आए थे तो जांच का दायरा सहारनपुर से बाहर जाकर संबंधित शाखाओं और चेस्ट तक पहुंच सकता है। इसके साथ ही यह भी जांचा जाएगा कि नोटों की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाली मशीनों और निर्धारित सत्यापन प्रक्रिया में कहीं कोई चूक, तकनीकी खामी या मानवीय लापरवाही तो नहीं हुई।

तीन बैंक अधिकारियों पर कार्रवाई, लेकिन असली सवाल अभी बाकी

करेंसी चेस्ट से जुड़े तीन बैंक अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाए जाने के बाद उनके खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है। हालांकि जांच पूरी होने से पहले किसी अधिकारी को नकली नोटों के स्रोत से सीधे जोड़ना जल्दबाजी होगी।असल जांच यह पता लगाने की है कि संदिग्ध करेंसी बैंकिंग सिस्टम की किस-किस परत से होकर करेंसी चेस्ट तक पहुंची और इस पूरी प्रक्रिया में किस स्तर पर निगरानी कमजोर पड़ी।

आरोपियों के खाते सीज, हरियाणा तक पहुंची जांच

जांच एजेंसियों ने मामले में सामने आए आरोपियों के बैंक खाते सीज करा दिए हैं। अब उनके खातों में हुए लेनदेन और पुराने वित्तीय रिकॉर्ड की पड़ताल की जा रही है। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि कहीं संदिग्ध धनराशि का लेनदेन, किसी व्यक्ति या नेटवर्क से आर्थिक संबंध अथवा असामान्य बैंकिंग गतिविधि तो नहीं हुई।

जांच एजेंसियों की कार्रवाई का दायरा हरियाणा तक दबिश तक पहुंच चुका है। इससे संकेत मिलता है कि एजेंसियां मामले को केवल बैंक के अंदर हुई गड़बड़ी मानकर नहीं चल रही हैं, बल्कि इसके संभावित बाहरी कनेक्शन की भी पड़ताल कर रही हैं।

राजनीतिक सवाल: करोड़ों के नकली नोट बैंकिंग सिस्टम तक पहुंचे कैसे?

मामले ने राजनीतिक गलियारों में भी सवाल खड़े करने की जमीन तैयार कर दी है। हालांकि अभी तक किसी प्रमुख विपक्षी दल की ओर से इस प्रकरण पर आधिकारिक विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में बिना पुष्टि के किसी दल या नेता के नाम से बयान जोड़ना उचित नहीं होगा।

लेकिन विपक्ष की ओर से यदि मामला उठाया जाता है तो उसके केंद्र में स्वाभाविक रूप से यही सवाल होंगे कि बैंकिंग सिस्टम में करोड़ों रुपये के नकली नोट पहुंचने की जिम्मेदारी किसकी है और निगरानी की व्यवस्था कहां विफल हुई?

सत्ता पक्ष की ओर से भी जांच पूरी होने और दोषियों पर कार्रवाई की बात सामने आ सकती है। ऐसे मामलों में राजनीतिक बहस का सबसे बड़ा मुद्दा यही होगा कि इसे महज कुछ अधिकारियों की लापरवाही मानकर खत्म किया जाए या बैंकिंग निगरानी व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की जाए।

राजनीतिक विश्लेषक: मामला सिर्फ नकली नोटों का नहीं

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इतने बड़े मूल्य की नकली करेंसी का करेंसी चेस्ट तक पहुंचना केवल आपराधिक जांच का विषय नहीं है। यह संस्थागत जवाबदेही का भी मामला है।उनका मानना है कि अगर जांच में यह साबित होता है कि नोट अलग-अलग समय में बैंकिंग चैनल के जरिए आते रहे और फिर भी समय रहते उनकी पहचान नहीं हो सकी, तो सवाल किसी एक कर्मचारी या अधिकारी से आगे बढ़कर पूरी निगरानी प्रणाली पर जाएगा।

कानूनविदों की नजर में जांच की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी ‘मनी ट्रेल’

कानूनविदों के मुताबिक मामले में सिर्फ नकली नोट बरामद होना पर्याप्त नहीं होगा। जांच एजेंसियों को यह स्थापित करना होगा कि संदिग्ध नोटों का स्रोत क्या था, वे किन लोगों के कब्जे में रहे और बैंकिंग सिस्टम तक पहुंचने के दौरान किन-किन लोगों की भूमिका रही।खातों को सीज करने के बाद लेनदेन की जांच इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि इससे संभावित मनी ट्रेल और आपसी आर्थिक संबंधों की कड़ियां सामने आ सकती हैं।

हालांकि किसी व्यक्ति की आपराधिक भूमिका जांच और कानूनी प्रक्रिया के निष्कर्ष के बाद ही तय होगी।

शिक्षाविद और समाजसेवी संस्थाएं उठाएंगी वित्तीय साक्षरता और निगरानी का सवाल

शिक्षाविदों का मानना है कि बैंकिंग प्रणाली में तकनीक और मानव संसाधन दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। मशीनों पर निर्भरता के साथ कर्मचारियों की जवाबदेही और नियमित ऑडिट भी उतना ही जरूरी है।

वहीं समाजसेवी संगठनों की ओर से यह सवाल उठाया जा सकता है कि आम नागरिक के पास पहुंचने से पहले नकली नोटों की पहचान के लिए बैंकिंग व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी तथा मजबूत कैसे बनाया जाए।

21 सदस्यीय टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती

आरबीआई और पीएनबी की संयुक्त टीम के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती कैश का पूरा ट्रेल जोड़ना है। नोटों के सीरियल नंबर, बंडल, सील, रजिस्टर, शाखाओं के रिकॉर्ड, कैश मूवमेंट और सत्यापन से जुड़े दस्तावेजों को आपस में मिलाया जा रहा है।

यानी जांच अब इस सवाल से आगे निकल चुकी है कि ‘नकली नोट कितने मिले?

’असल सवाल है—‘17 करोड़ रुपये की नकली करेंसी बैंकिंग सिस्टम में आई कहां से, कितने समय तक घूमती रही और इतने बड़े पैमाने पर होने के बावजूद पकड़ में क्यों नहीं आई?

’इस सवाल का जवाब ही सहारनपुर के पीएनबी करेंसी चेस्ट प्रकरण की असली तस्वीर सामने लाएगा।

यदि जांच में किसी संगठित नेटवर्क, सुनियोजित धोखाधड़ी या बैंकिंग प्रक्रिया के दुरुपयोग के प्रमाण मिलते हैं तो मामला बेहद गंभीर वित्तीय अपराध के रूप में सामने आ सकता है।

फिलहाल निगाहें जांच रिपोर्ट और कैश ट्रेल पर टिकी हैं।

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