सहारनपुर मस्जिद प्रकरण में नया मोड़: मलबे के नीचे मिले 250 साल पुराने कुएं की रिपोर्ट निदेशक को सौंपी, अब इतिहास के तहखाने में छिपे सवालों की बारी, प्रशासन ने की बैरिकेडिंग, पुलिस की कड़ी निगरानी

बी के झा

NSK news Ind

सहारनपुर, 29 सितंबर

सहारनपुर कलक्ट्रेट परिसर में मस्जिद ध्वस्तीकरण के बाद मलबे के नीचे से सामने आई करीब 20 फीट गहरी कुएंनुमा संरचना ने पूरे प्रकरण को एक नया ऐतिहासिक और पुरातात्विक आयाम दे दिया है।

जिस स्थान पर कभी मस्जिद का ढांचा मौजूद था, उसी के नीचे भारी-भरकम स्लैब हटाए जाने के बाद मिली इस संरचना की प्रारंभिक जांच में पुरातत्व विभाग ने इसे उत्तर-मध्यकालीन निर्माण शैली से जुड़ा बताया है।पुरातत्व विभाग के सहायक अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव द्वारा मौके पर निरीक्षण किए जाने के बाद तैयार रिपोर्ट अब उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग की निदेशक को सौंप दी गई है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार संरचना करीब 200 से 250 वर्ष पुरानी हो सकती है और इसमें लखौरी ईंटों के इस्तेमाल के संकेत मिले हैं। हालांकि अंतिम ऐतिहासिक निष्कर्ष विस्तृत जांच और ठोस पुरातात्विक साक्ष्यों के बाद ही सामने आएगा।यही वह बिंदु है जहां सहारनपुर का यह विवाद अब केवल एक ध्वस्त मस्जिद का मामला नहीं रह गया है।

सवाल अब यह भी है कि मलबे के नीचे मिली संरचना आखिर थी क्या,

उसका निर्माण किस काल में हुआ,

उसका उपयोग किस उद्देश्य से होता था और क्या उसके आसपास की जमीन के इतिहास से जुड़ी कोई अतिरिक्त परत अभी जमीन के नीचे छिपी हुई है?

भारी स्लैब ने खोला इतिहास का रास्ता

मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद जब प्रशासन ने मलबा हटाना शुरू किया तो एक भारी स्लैब मशीन के सामने आ गया। स्लैब इतना मजबूत था कि उसे हटाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। अंततः मशीन से उसे काटकर हटाया गया तो नीचे एक गहरी संरचना दिखाई दी।करीब 20 फीट गहरी और लगभग डेढ़ मीटर से तीन मीटर के आसपास चौड़ी बताई गई इस संरचना में मलबा भरा था। प्रशासन ने तत्काल क्षेत्र को सुरक्षित किया और पुरातात्विक जांच के लिए विशेषज्ञों को बुलाया।इसके बाद लखनऊ से पुरातत्व विभाग की टीम सहारनपुर पहुंची।

सहायक पुरातत्व अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव ने सीढ़ी के जरिए संरचना के भीतर उतरकर उसकी बनावट, ईंटों और आंतरिक संरचना का निरीक्षण किया। अधिकारी के मुताबिक प्रथम दृष्टया यह कुएं जैसी संरचना दिखाई देती है और इसकी निर्माण शैली उत्तर-मध्यकालीन प्रतीत होती है।

लखौरी ईंटों ने बढ़ाई ऐतिहासिक दिलचस्पी

इस संरचना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में लखौरी ईंटों का होना बताया गया है। पुरातत्व अधिकारियों ने इसी तरह की निर्माण शैली और सामग्री के आधार पर इसकी संभावित आयु 200 से 250 वर्ष के आसपास आंकी है।लेकिन पुरातत्व विज्ञान में अनुमान और प्रमाण के बीच बड़ा अंतर होता है।

यही कारण है कि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि अंतिम निष्कर्ष केवल प्रारंभिक दृश्य निरीक्षण से नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए निर्माण सामग्री, संरचना की परतों, आसपास के भू-भाग, ऐतिहासिक अभिलेखों और यदि उपलब्ध हों तो किसी अभिलेख, सिक्के या अन्य पुरातात्विक सामग्री का अध्ययन महत्वपूर्ण होगा। इसलिए फिलहाल इसे “250 साल पुराना कुआं” कहने के बजाय “200-250 वर्ष पुरानी होने का प्रारंभिक अनुमान वाली कुएंनुमा संरचना” कहना ज्यादा वैज्ञानिक और पत्रकारिता की दृष्टि से सटीक होगा।

रिपोर्ट निदेशक के पास, अब अगली नजर विस्तृत जांच पर

पुरातत्व अधिकारी ने अपनी जांच रिपोर्ट विभाग की निदेशक को सौंप दी है। अब विभागीय स्तर पर रिपोर्ट का अध्ययन होगा और आवश्यकता पड़ने पर स्थल की आगे की जांच का निर्णय लिया जा सकता है।यही अगला चरण सबसे महत्वपूर्ण हो सकता है।यदि संरचना के आसपास वैज्ञानिक तरीके से सीमित खुदाई या दस्तावेजी जांच होती है तो संभव है कि इस स्थल के पुराने उपयोग के बारे में और जानकारी मिले। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि यहां कोई मंदिर, धार्मिक स्थल या अन्य ऐतिहासिक निर्माण रहा होगा।दरअसल, मौके के प्रारंभिक निरीक्षण में अधिकारी ने भी किसी धार्मिक संरचना की पुष्टि नहीं की है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले पुरातात्विक प्रमाणों की प्रतीक्षा जरूरी है।

क्या कुएं से जुड़ेगा मस्जिद के इतिहास का कोई अध्याय?

यही सवाल अब स्थानीय लोगों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा में है।एक पक्ष का कहना है कि पुरानी इमारतों और धार्मिक परिसरों के नीचे या आसपास कुएं होना असामान्य बात नहीं थी। दूसरी ओर, कुछ स्थानीय लोग और शिकायतकर्ता इस संरचना को क्षेत्र के पुराने धार्मिक और सामाजिक इतिहास से जोड़कर देखने की मांग कर रहे हैं।

शिकायतकर्ता विकास त्यागी ने संरचना की पुरातात्विक जांच की मांग की थी और इसके पुराने धार्मिक स्थल से जुड़े होने की संभावना का दावा किया है।लेकिन किसी भी दावे को इतिहास का प्रमाण तभी माना जा सकता है, जब पुरातात्विक या दस्तावेजी साक्ष्य उसे पुष्ट करें।यही वह कसौटी है जिस पर अब इस पूरे मामले को परखा जाना चाहिए।

मस्जिद ध्वस्तीकरण की कानूनी पृष्ठभूमि भी अहम

इस पूरे घटनाक्रम को केवल कुएं की खोज से जोड़कर देखना अधूरा होगा। मस्जिद ध्वस्तीकरण की अपनी अलग कानूनी पृष्ठभूमि है।

सहारनपुर कलक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को लेकर विवाद सरकारी जमीन पर निर्माण और उसके वैध अधिकार से जुड़ा था। जिला अदालत ने अपील खारिज करते हुए पूर्व में दिए गए बेदखली आदेश को बरकरार रखा था। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार संबंधित आदेश में करीब 315 वर्गमीटर सरकारी भूमि पर संरचना होने का उल्लेख था।हालांकि एक कानूनी पेच यह भी सामने आया कि अदालत के आदेश में सीधे “ध्वस्तीकरण” शब्द नहीं था, जबकि प्रशासन ने बेदखली के आदेश के अनुपालन में संरचना हटाई।

मस्जिद प्रबंधन ने इसी आधार पर कानूनी सवाल उठाए हैं।यानी इस प्रकरण के दो अलग-अलग कानूनी-ऐतिहासिक पहलू हैं—मस्जिद की भूमि और वैधता का विवाद तथा उसके नीचे मिली पुरातात्विक संरचना की प्राचीनता का सवाल।

दोनों को एक-दूसरे का स्वतः प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।

विपक्ष ने उठाए सवाल, स्थानीय स्तर पर भी बेचैनी

मस्जिद ध्वस्तीकरण के बाद विपक्षी दलों ने सरकार और जिला प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने ध्वस्तीकरण को लेकर सरकार पर गंभीर आरोप लगाए और इसे कानून-व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा बताया। स्थानीय लोगों के एक वर्ग ने भी लंबे समय से वहां मस्जिद होने का दावा करते हुए कार्रवाई पर आपत्ति जताई है।

समाजवादी पार्टी ने भी मामले को लेकर प्रतिनिधिमंडल के जरिए प्रशासन से संपर्क करने की कोशिश की थी। रिपोर्टों के अनुसार पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की गतिविधियों को लेकर पुलिस-प्रशासन ने सतर्कता बढ़ाई थी।

विपक्ष का मूल सवाल है कि धार्मिक स्थल से जुड़ी कार्रवाई में प्रशासन ने पर्याप्त पारदर्शिता और प्रक्रिया का पालन किया या नहीं। वहीं प्रशासन का पक्ष अदालत के आदेश और सरकारी भूमि पर अनधिकृत कब्जे से जुड़े निष्कर्षों पर आधारित है।इसलिए इस विवाद में दोनों पक्षों के दावों को न्यायिक रिकॉर्ड और आधिकारिक दस्तावेजों के संदर्भ में देखना जरूरी होगा।

स्थानीय नागरिकों के सामने अब नया सवाल

सहारनपुर के स्थानीय नागरिकों के लिए यह केवल राजनीति का विषय नहीं है। कलक्ट्रेट जैसे संवेदनशील सरकारी परिसर में किसी प्राचीन संरचना का मिलना अपने आप में ऐतिहासिक महत्व रखता है।

शिक्षाविदों और सामाजिक संस्थाओं के बीच भी यह सवाल उठ रहा है कि यदि संरचना वास्तव में दो से ढाई शताब्दी पुरानी है तो क्या इसके आसपास के पुराने राजस्व रिकॉर्ड, नक्शे, गजेटियर, नगर अभिलेख या अन्य दस्तावेजों की भी जांच की जानी चाहिए?

इतिहास केवल ईंटों से नहीं लिखा जाता।ईंट, निर्माण शैली, अभिलेख, राजस्व रिकॉर्ड, पुराने नक्शे और स्थानीय इतिहास—इन सबको जोड़कर ही किसी स्थल की वास्तविक कहानी सामने आती है।

इतिहासकारों और कानूनविदों के लिए भी खुला है सवाल

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह मामला आने वाले दिनों में राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन सकता है, लेकिन इसका वास्तविक समाधान राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि तथ्य और दस्तावेज से निकलेगा।

कानूनविदों के लिए सवाल यह है कि यदि किसी विवादित स्थल से पुरातात्विक महत्व की संरचना सामने आती है तो प्रशासन को उसकी सुरक्षा और जांच के लिए कौन-कौन से वैधानिक कदम उठाने चाहिए।

वहीं शिक्षाविदों और इतिहास शोधकर्ताओं के लिए यह अवसर है कि वे सहारनपुर के पुराने शहरी विस्तार, धार्मिक परिसरों और जल-संरचनाओं के इतिहास को दस्तावेजों के आधार पर सामने लाएं।सामाजिक संगठनों का एक वर्ग भी मांग कर सकता है कि जांच पूरी होने तक स्थल को सुरक्षित रखा जाए और किसी भी तरह की अफवाह या राजनीतिक दावे के बजाय विशेषज्ञों की रिपोर्ट को आधार बनाया जाए।

प्रशासन ने बढ़ाई सुरक्षा, पुलिस की पैनी नजर

कुएंनुमा संरचना मिलने के बाद प्रशासन ने मौके पर बैरिकेडिंग कर दी है। पुलिसकर्मी स्थल और उसके आसपास निगरानी कर रहे हैं।यह सुरक्षा व्यवस्था केवल कानून-व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि संभावित पुरातात्विक साक्ष्यों की सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।

यदि संरचना के भीतर या आसपास कोई पुरानी सामग्री मौजूद है तो अनधिकृत प्रवेश या छेड़छाड़ से जांच प्रभावित हो सकती है।इसीलिए अब प्रशासन के सामने दोहरी जिम्मेदारी है—कानून-व्यवस्था बनाए रखना और संभावित ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखना।

‘कुआं’ मिला है, लेकिन कहानी अभी अधूरी है

सहारनपुर के कलक्ट्रेट परिसर में मलबे के नीचे से निकली यह संरचना फिलहाल कई सवालों का जवाब देने के बजाय नए सवाल पैदा कर रही है।

क्या यह वास्तव में कुआं था?

किस काल में बनाया गया?

किस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल होता था?

क्या इसके आसपास कोई पुरानी बस्ती या निर्माण था?

क्या इसके बारे में पुराने राजस्व या ऐतिहासिक रिकॉर्ड उपलब्ध हैं?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या इस संरचना का उस मस्जिद के इतिहास से कोई प्रत्यक्ष संबंध था या यह उससे भी पुराने समय की स्वतंत्र संरचना थी?

इनमें से किसी सवाल का अंतिम उत्तर अभी उपलब्ध नहीं है।

एनएसके का विश्लेषण

सहारनपुर का यह मामला एक बात साफ करता है—इतिहास को नारे से नहीं, साक्ष्य से पढ़ना चाहिए।यदि 200-250 वर्ष पुरानी संरचना होने का प्रारंभिक अनुमान सामने आया है तो उसकी वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए।

यदि आगे कोई ऐतिहासिक साक्ष्य मिलता है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। और यदि जांच में किसी धार्मिक दावे की पुष्टि नहीं होती है तो उस दावे को भी तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।

क्योंकि इतिहास की सबसे बड़ी ताकत उसकी निष्पक्षता है।आज मलबे के नीचे से एक कुएंनुमा संरचना निकली है। कल हो सकता है कि अभिलेखों से कोई नया अध्याय सामने आए।

लेकिन तब तक न तो इसे मंदिर का प्रमाण कहा जा सकता है और न ही किसी दूसरे धार्मिक दावे का।

इतिहास को अपना फैसला करने दीजिए—ईंटों को बोलने दीजिए, दस्तावेजों को गवाही देने दीजिए और पुरातत्व को निष्कर्ष तक पहुंचने दीजिए।

सहारनपुर में अब सिर्फ पुलिस की निगाह उस जगह पर नहीं है।इतिहास की नजर भी उसी जमीन पर टिक गई है।

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