सपा-कांग्रेस में सीट शेयरिंग की गांठ नहीं खुली, 111 सीटों पर अखिलेश का ‘नो समझौता’! कांग्रेस के लिए क्या है ‘हाथ’ का प्लान? भाजपा की जीती सीटों पर नजर; सपा ने विधायकों को फिर मैदान में उतारने का बनाया मन

बी के झा

NSK news Ind

लखनऊ, 15 सितंबर

उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है और इस रास्ते पर विपक्षी खेमे की पहली परीक्षा चुनाव से पहले ही शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर खींचतान अब केवल सीटों की संख्या का सवाल नहीं रह गई है, बल्कि यह इस बात की लड़ाई बनती दिख रही है कि यूपी में विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा।

2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने जिस ‘पीडीए’ और सामाजिक समीकरण के सहारे भाजपा को चुनौती दी थी, उसे विधानसभा चुनाव में दोहराना आसान नहीं होगा। सपा जहां अपनी संगठनात्मक ताकत और विधानसभा में मौजूद विधायकों को आधार बनाकर अधिक सीटें अपने पास रखना चाहती है, वहीं कांग्रेस 2024 के लोकसभा प्रदर्शन को अपनी बढ़ी हुई राजनीतिक हैसियत का प्रमाण मान रही है। यही टकराव सीट शेयरिंग की मेज पर सबसे बड़ी अड़चन बन गया है।

111 सीटों पर सपा का ‘नो कॉम्प्रोमाइज’

सूत्रों के मुताबिक समाजवादी पार्टी अपनी जीती हुई करीब 111 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस के साथ समझौता करने के मूड में नहीं है। पार्टी इन सीटों पर अपने मौजूदा विधायकों को दोबारा मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है। पार्टी स्तर पर विधायकों की जीत की संभावनाओं और क्षेत्रीय समीकरणों का आकलन भी किया जा रहा है।सपा की रणनीति साफ है—जहां संगठन और मौजूदा विधायक मजबूत हैं, वहां सहयोगी के लिए सीट छोड़कर अपना आधार कमजोर नहीं करना।

हालांकि पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाए रखने के पक्ष में है। इसी कारण कांग्रेस के लिए 75 से 80 सीटों के आसपास का फार्मूला तैयार होने की संभावना जताई जा रही है। यह संख्या 2022 में कांग्रेस को दिए गए सीमित हिस्से की तुलना में काफी अधिक होगी।

कांग्रेस की नजर सिर्फ सीटों पर नहीं, ‘मौजूदगी’ पर भी

कांग्रेस की मांग का एक अहम हिस्सा यह है कि उसे उत्तर प्रदेश के लगभग हर जिले में राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने का अवसर मिले। पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को आधार बनाकर ज्यादा सीटों पर दावा कर रही है।कांग्रेस के भीतर यह तर्क दिया जा रहा है कि अगर पार्टी को लगातार छोटे सहयोगी की भूमिका में रखा गया तो संगठन का विस्तार मुश्किल होगा। इसलिए विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए केवल सीट जीतने का अभियान नहीं, बल्कि यूपी में संगठन को फिर से खड़ा करने का मौका भी है।

यही वह बिंदु है जहां सपा और कांग्रेस की रणनीतियां टकराती हैं।सपा चाहती है कि कांग्रेस ऐसी सीटों पर उतरे जहां उसका संगठन और सामाजिक समीकरण गठबंधन के लिए अतिरिक्त वोट जोड़ सके। कांग्रेस चाहती है कि उसे ऐसे क्षेत्रों में भी अवसर मिले जहां वह भविष्य के लिए अपना संगठन खड़ा कर सके।

सपा के स्थानीय समर्थकों की दलील—‘जीतने वाली सीट क्यों छोड़ें?

’सपा के स्थानीय समर्थकों का तर्क है कि 2024 के लोकसभा चुनाव की सफलता को सीधे विधानसभा सीटों में नहीं बदला जा सकता। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मुद्दे, उम्मीदवार और स्थानीय समीकरण अलग होते हैं।उनका कहना है कि यदि सपा ने अपने मजबूत गढ़ों को केवल गठबंधन धर्म के नाम पर छोड़ दिया तो इसका सीधा नुकसान पार्टी को हो सकता है।सपा समर्थक खेमे में यह भी सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस को अतिरिक्त सीटें देने के बाद क्या वह वास्तव में उतना अतिरिक्त वोट ट्रांसफर करा पाएगी, जितना सपा को सीट छोड़ने की राजनीतिक कीमत के बराबर चाहिए?

कांग्रेस संगठन का अलग हिसाब

दूसरी ओर कांग्रेस संगठन के भीतर यह भावना मजबूत होने की बात कही जा रही है कि 2024 के लोकसभा चुनाव ने पार्टी की यूपी में राजनीतिक जमीन को पहले की तुलना में मजबूत किया है।कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि युवाओं, महिलाओं, बेरोजगारी, संविधान और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों ने पार्टी के लिए नया राजनीतिक स्पेस बनाया है। ऐसे में पार्टी को कम सीटों तक सीमित करना उसके पुनरुत्थान की प्रक्रिया को रोक सकता है।

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह सपा से टकराव भी न बढ़ाए और अपने संगठनात्मक विस्तार का अवसर भी हाथ से न जाने दे।

भाजपा संगठन को गठबंधन में दिख रही है ‘दरार की गुंजाइश’

भाजपा के रणनीतिकार इस पूरे घटनाक्रम को विपक्षी गठबंधन की कमजोरी के रूप में देख रहे हैं। भाजपा संगठन की ओर से लगातार यह संदेश देने की कोशिश होगी कि सपा और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर मतभेद महज संख्या का विवाद नहीं, बल्कि नेतृत्व और राजनीतिक हिस्सेदारी की लड़ाई है।भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य विपक्ष के संभावित वोट ट्रांसफर को रोकना होगा। यदि सपा और कांग्रेस का वोट पूरी तरह एक-दूसरे को स्थानांतरित नहीं हुआ तो गठबंधन की सीटों की गणित कमजोर पड़ सकती है।

यही वजह है कि भाजपा संगठन की नजर केवल सपा-कांग्रेस के सीट फार्मूले पर नहीं, बल्कि दोनों दलों के स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल पर भी होगी।

राजनीतिक विश्लेषक बोले—‘2024 की पटकथा विधानसभा में हूबहू नहीं दोहर सकती’

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक 2024 का चुनाव विपक्ष के लिए एक विशेष परिस्थितियों का परिणाम था। विधानसभा चुनाव में स्थानीय प्रत्याशी, जातीय समीकरण, बूथ संगठन और क्षेत्रीय मुद्दों की भूमिका कहीं अधिक बढ़ जाती है।एक राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक, “सपा के लिए 111 सीटों को अपने पास रखना संगठनात्मक रूप से स्वाभाविक मांग है, लेकिन कांग्रेस के लिए 75-80 सीटों का हिस्सा तभी प्रभावी होगा जब उसे जीतने योग्य सीटों का वास्तविक चयन करने दिया जाए।

असली लड़ाई संख्या नहीं, सीटों की गुणवत्ता पर होगी!

”विश्लेषकों का यह भी मानना है कि गठबंधन की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना यह होगा कि दोनों दल अपने कार्यकर्ताओं को एक-दूसरे के उम्मीदवार के लिए कितनी मजबूती से मैदान में उतार पाते हैं।

शिक्षाविदों की नजर में ‘Gen-Z फैक्टर’ निर्णायक

शिक्षाविदों और युवा राजनीति को समझने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनाव में नई पीढ़ी को साधना दोनों दलों के लिए चुनौती होगी। Gen-Z के मतदाताओं का एक हिस्सा पारंपरिक जातीय और पार्टी पहचान से आगे जाकर रोजगार, शिक्षा, डिजिटल अवसर, प्रतियोगी परीक्षाओं, महंगाई और भविष्य की सुरक्षा जैसे सवालों पर निर्णय ले सकता है।यही कारण है कि राहुल गांधी का युवाओं के बीच संवाद बढ़ाने का प्रयास और अखिलेश यादव का युवाओं तथा महिलाओं पर अलग फोकस महज चुनावी कार्यक्रम नहीं, बल्कि बदलते मतदाता व्यवहार को समझने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

महिलाओं पर भी बढ़ेगा मुकाबला

उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिला मतदाता अब किसी भी गठबंधन की गणित को पलटने की क्षमता रखती हैं। भाजपा लंबे समय से महिला कल्याण योजनाओं और लाभार्थी वर्ग को अपना मजबूत आधार मानती रही है।सपा-कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वे महिलाओं को केवल सामाजिक न्याय के पुराने राजनीतिक विमर्श से नहीं, बल्कि रोजगार, सुरक्षा, शिक्षा, महंगाई और आर्थिक आत्मनिर्भरता जैसे मुद्दों के साथ अपने पक्ष में जोड़ें।

असली सवाल—क्या ‘पीडीए प्लस कांग्रेस’ फिर चलेगा?

2024 में विपक्ष की सफलता ने एक बड़ा राजनीतिक सूत्र दिया था—सपा का पीडीए आधार और कांग्रेस का अतिरिक्त वोट बैंक अगर एक साथ आता है तो भाजपा के मजबूत किले में सेंध लग सकती है।लेकिन विधानसभा चुनाव में यही फार्मूला कितनी दूर जाएगा, यह अभी खुला सवाल है।

सपा का पारंपरिक सामाजिक आधार मजबूत है। कांग्रेस के पास राष्ट्रीय नेतृत्व, कुछ क्षेत्रों में पुनर्जीवित संगठन और 2024 के बाद बढ़ा राजनीतिक आत्मविश्वास है। लेकिन दोनों के बीच सबसे बड़ी परीक्षा वोट ट्रांसफर की होगी।अगर सपा कार्यकर्ता कांग्रेस प्रत्याशी के लिए और कांग्रेस कार्यकर्ता सपा प्रत्याशी के लिए उसी उत्साह से वोट मांगते हैं, तो गठबंधन की ताकत कई गुना बढ़ सकती है। यदि जमीन पर दोनों दलों के कार्यकर्ता एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी मानते रहे, तो कागज पर बना सीट फार्मूला चुनावी नतीजों में कमजोर पड़ सकता है।

‘आखिर बड़ा भाई’ कौन? यही असली लड़ाई

यूपी की राजनीति में सीट शेयरिंग की वर्तमान कशमकश को केवल सीटों की संख्या से समझना अधूरा होगा। इसके पीछे बड़ा सवाल यह है कि गठबंधन में राजनीतिक रूप से बड़ा भाई कौन रहेगा?

सपा अपने विधानसभा संगठन, प्रदेशव्यापी कैडर और पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को अपनी ताकत मानती है।

कांग्रेस 2024 के प्रदर्शन और राहुल गांधी की सक्रियता के बाद अपने लिए बड़ा राजनीतिक स्पेस चाहती है।इसलिए आने वाले दिनों में बातचीत की मेज पर हर सीट के पीछे केवल उम्मीदवार नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल भी मौजूद रहेगा।

एनएसके विश्लेषण

सपा और कांग्रेस के सामने विकल्प साफ है—या तो वे सीटों की संख्या पर लंबी लड़ाई लड़ें और एक-दूसरे की राजनीतिक जमीन काटें, या फिर ऐसी सीट-समझ विकसित करें जिसमें सपा अपने मजबूत किलों को बचाए और कांग्रेस को ऐसी सीटें मिलें जहां उसका संगठन और वोट बैंक वास्तव में गठबंधन को अतिरिक्त ताकत दे सके।

2027 का यूपी चुनाव केवल भाजपा बनाम विपक्ष नहीं होगा। यह सपा-कांग्रेस के बीच भी इस सवाल का फैसला करेगा कि विपक्ष की राजनीति में किसकी पकड़ कितनी है।

और इसीलिए 111 सीटों पर सपा का अपना दावा और कांग्रेस की 75-80 सीटों की संभावित हिस्सेदारी—दोनों संख्या नहीं, बल्कि यूपी की अगली राजनीतिक सत्ता का संकेत हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *