अगर राजनीति ही करनी है तो वर्दी छोड़िए…’ : पटना SSP पर प्रशांत किशोर का सीधा हमला, बांकीपुर उपचुनाव में पुलिस की भूमिका पर गरमाई सियासत

बी के झा

NSK news Ind

‘ पटना, 2 अगस्त

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर बिहार की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने पटना पुलिस और विशेष रूप से पटना के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशासन निष्पक्ष कानून-व्यवस्था बनाए रखने के बजाय चुनाव को प्रभावित करने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने यहां तक कहा कि यदि पटना एसएसपी को राजनीति ही करनी है तो उन्हें वर्दी छोड़कर खुले तौर पर राजनीति करनी चाहिए।

प्रशांत किशोर ने प्रेस वार्ता में दावा किया कि चुनाव के दौरान पुलिस ने जिन लोगों को धारा-163 (पूर्व में धारा-144 जैसी निषेधाज्ञा व्यवस्था) के उल्लंघन के आरोप में हिरासत में लिया, उनमें अधिकांश स्थानीय निवासी थे और कई लोग अपने घरों में सो रहे थे। उन्होंने सवाल उठाया कि “जो व्यक्ति अपने घर में सो रहा हो, वह निषेधाज्ञा का उल्लंघन कैसे कर सकता है?

“उन्होंने आरोप लगाया कि देर रात दो से तीन बजे के बीच पुलिस टीमों ने कई घरों में दबिश देकर लोगों को उठाया तथा वार्ड संख्या-22 सहित कुछ इलाकों में मतदाताओं को भयभीत करने का प्रयास किया गया। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

‘प्रशासन का नंगा नाच’—प्रशांत किशोर का तीखा हमला

जन सुराज प्रमुख ने कहा कि यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक स्थिति है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस निष्पक्ष एजेंसी की तरह नहीं बल्कि राजनीतिक दबाव में कार्य करती हुई दिखाई दे रही है। उन्होंने पटना एसएसपी को “अनप्रोफेशनल” बताते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की सबसे बड़ी जिम्मेदारी निष्पक्षता होती है।उन्होंने घोषणा की कि उनकी पार्टी चुनाव आयोग के समक्ष विस्तृत शिकायत दर्ज कराएगी। आवश्यकता पड़ने पर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट तक जाने की बात भी कही।

पटना पुलिस मुख्यालय का पक्ष

पटना पुलिस की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी में कहा गया कि चुनाव के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने तथा निषेधाज्ञा के उल्लंघन की आशंका को देखते हुए एहतियाती कार्रवाई की गई। पुलिस का कहना है कि किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई उपलब्ध सूचनाओं और विधिक प्रावधानों के आधार पर की गई तथा पूरी प्रक्रिया कानून के अनुरूप अपनाई गई। पुलिस ने किसी भी प्रकार के राजनीतिक पक्षपात के आरोपों से स्वयं को अलग बताया है।

बिहार सरकार की प्रतिक्रिया

राज्य सरकार के सूत्रों का कहना है कि चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुरूप शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करना प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी है। सरकार का दावा है कि यदि किसी दल या प्रत्याशी को कार्रवाई पर आपत्ति है तो वह चुनाव आयोग के समक्ष अपना पक्ष रख सकता है और सरकार किसी भी निष्पक्ष जांच में सहयोग करेगी।

विपक्षी दलों ने उठाए सवाल

महागठबंधन के कई नेताओं ने कहा कि यदि वास्तव में निर्दोष लोगों को घरों से उठाया गया है तो यह लोकतांत्रिक अधिकारों का गंभीर प्रश्न है। विपक्ष ने मांग की कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि किसी अधिकारी ने अधिकारों का दुरुपयोग किया है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो।

वहीं सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं का कहना है कि चुनाव के दौरान अफवाहें फैलाना और प्रशासन पर बेबुनियाद आरोप लगाना विपक्ष की पुरानी रणनीति रही है। उनके अनुसार सुरक्षा एजेंसियां केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने का कार्य कर रही थीं।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांकीपुर उपचुनाव केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक निष्पक्षता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता की परीक्षा बनता जा रहा है। उनका कहना है कि जब किसी चुनाव में पुलिस की भूमिका स्वयं राजनीतिक बहस का विषय बन जाए तो चुनाव आयोग को तथ्यों की निष्पक्ष समीक्षा कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।विश्लेषकों के अनुसार बिहार की राजनीति में प्रशासनिक निष्पक्षता का मुद्दा पहले भी कई बार उठता रहा है। ऐसे में प्रत्येक आरोप की पारदर्शी जांच लोकतांत्रिक विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

कानूनविदों की टिप्पणी

संवैधानिक मामलों के जानकार वरिष्ठ अधिवक्ता राममोहन झा का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को केवल आशंका के आधार पर हिरासत में लिया जाता है तो उसका विधिक परीक्षण होना चाहिए। वहीं यदि पुलिस के पास पर्याप्त खुफिया सूचना या शांति भंग होने की आशंका के ठोस आधार थे, तो कानून उसे एहतियाती कार्रवाई का अधिकार भी देता है। ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा और चुनाव आयोग की निगरानी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया

शिक्षाविदों का कहना है कि लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, प्रशासनिक निष्पक्षता और संस्थागत विश्वास का भी नाम है। उनका मत है कि चुनाव के दौरान पुलिस और राजनीतिक दल दोनों को संयमित भाषा तथा संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करना चाहिए ताकि जनता का लोकतंत्र पर भरोसा मजबूत बना रहे।

समाजसेवी संगठनों की चिंता

कई सामाजिक संगठनों ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया में मतदाता स्वयं को सुरक्षित और स्वतंत्र महसूस करें, यह सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने प्रशासन तथा राजनीतिक दलों दोनों से अपील की कि आरोप-प्रत्यारोप के बजाय तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए और यदि कहीं अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए।

स्थानीय जनता की मिली-जुली प्रतिक्रिया

बांकीपुर क्षेत्र के कुछ मतदाताओं का कहना है कि चुनाव के दौरान पुलिस की मौजूदगी से सुरक्षा का माहौल बना, जबकि कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि अत्यधिक पुलिस गतिविधियों से सामान्य मतदाता असहज महसूस कर रहे थे। कई नागरिकों ने मांग की कि पूरे मामले की पारदर्शी जांच कर सच्चाई जनता के सामने लाई जाए।

जनप्रतिनिधियों की राय

स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि लोकतंत्र में निष्पक्ष प्रशासन ही चुनाव की सबसे बड़ी ताकत है। उनका मानना है कि यदि किसी पक्ष के आरोप सही हैं तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए और यदि आरोप निराधार हैं तो उन्हें भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए ताकि प्रशासन की विश्वसनीयता बनी रहे।

लोकतंत्र की कसौटी पर प्रशासन

बांकीपुर उपचुनाव अब केवल राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता, संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता की भी परीक्षा बन गया है। एक ओर प्रशांत किशोर गंभीर आरोप लगाकर चुनाव आयोग और न्यायपालिका तक जाने की बात कर रहे हैं, वहीं प्रशासन अपनी कार्रवाई को कानूनसम्मत बता रहा है।

अब सबकी निगाहें चुनाव आयोग की संभावित जांच, आधिकारिक रिपोर्ट और आगे की कार्रवाई पर टिकी हैं। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि हर आरोप की निष्पक्ष जांच हो, हर कार्रवाई कानून के दायरे में हो और जनता का विश्वास सर्वोपरि बना रहे।

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