बी के झा
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नई दिल्ली, 24 सितंबर
चुनाव आयोग सिर्फ चुनाव कराने वाली सरकारी संस्था नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की चुनावी व्यवस्था का संवैधानिक प्रहरी है। संविधान के अनुच्छेद 324 ने उसे चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की व्यापक जिम्मेदारी दी है। दिलचस्प बात यह है कि आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्तों के बीच अधिकारों तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर टकराव की कहानी नई नहीं है। इसकी जड़ें करीब 37 साल पीछे 1989 तक जाती हैं।
आज CEC ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त एसएस संधू तथा विवेक जोशी से जुड़े कथित मतभेदों ने फिर वही पुराना सवाल सामने ला दिया है—बहुसदस्यीय चुनाव आयोग में अंतिम अधिकार किसका है और असहमति की संवैधानिक सीमा क्या है?
1989: पहली बार तीन सदस्य हुए, लेकिन प्रयोग ज्यादा दिन नहीं चला अक्टूबर 1989 में एसएस धनाओआ और वीएस सीगल को चुनाव आयुक्त बनाया गया। उस समय आरवीएस पेरी शास्त्री मुख्य चुनाव आयुक्त थे। चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार दोनों की नियुक्ति 16 अक्टूबर 1989 से हुई और 2 जनवरी 1990 तक ही चली। इसके बाद आयोग फिर एक सदस्यीय हो गया।उस समय व्यापक रूप से यह माना गया कि बहुसदस्यीय व्यवस्था से CEC की भूमिका और अधिकारों को लेकर असहजता पैदा हुई थी।
हालांकि इस दौर की कई व्याख्याएं बाद के स्रोतों और राजनीतिक विमर्श पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें निर्विवाद तथ्य के बजाय ऐतिहासिक संदर्भ के रूप में देखना उचित है।लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
1993: में शेषन आए और आयोग के भीतर टकराव खुलकर सामने आया1993 में टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे। इसी वर्ष एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त बनाया गया और बहुसदस्यीय आयोग की व्यवस्था फिर कायम हुई। इसके बाद शेषन और दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच अधिकारों को लेकर खुला विवाद सामने आया।विवाद इतना तीखा हुआ कि शेषन ने अपने दोनों सहयोगियों के लिए बेहद अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया और उन्हें अपने कार्यालय के “दो गधे” तक कह दिया। यह टिप्पणी आज भी चुनाव आयोग के इतिहास में आंतरिक टकराव के सबसे चर्चित उदाहरणों में गिनी जाती है।
लेकिन असली महत्व उस टिप्पणी का नहीं था। असली सवाल था—क्या CEC अकेले चुनाव आयोग है या आयोग एक सामूहिक संवैधानिक संस्था है?
1995: सुप्रीम कोर्ट ने तय की शक्ति की संवैधानिक तस्वीर
शेषन ने बहुसदस्यीय आयोग बनाए जाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 1995 के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 324 बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की कल्पना करता है और CEC उसका चेयरमैन होता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयुक्तों को महज सलाहकार या सजावटी सदस्य नहीं माना जा सकता।अदालत की व्याख्या का केंद्रीय सिद्धांत था कि CEC संस्था से ऊपर नहीं है। बहुसदस्यीय आयोग में चुनाव आयुक्तों की निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भूमिका है और आयोग के निर्णय सामूहिक संस्था के निर्णय होते हैं।यहीं से भारतीय चुनाव आयोग के भीतर सत्ता-संतुलन की संवैधानिक रेखा काफी हद तक स्पष्ट हुई।
यानी CEC ‘बॉस’ नहीं, चेयरमैन है?
यही इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक बात है।अनुच्छेद 324(3) के तहत बहुसदस्यीय आयोग में CEC चेयरमैन होता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में यह स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि CEC अपने सहयोगी चुनाव आयुक्तों की राय को दरकिनार करके अकेले संस्था का निर्णय कर सकता है।आज चुनाव आयोग आधिकारिक तौर पर कहता है कि सभी चुनाव आयुक्तों की निर्णय प्रक्रिया में बराबर भूमिका है और आयोग बहुमत के आधार पर निर्णय ले सकता है।यानी संवैधानिक ढांचा व्यक्ति-केंद्रित आयोग की बजाय संस्थागत निर्णय प्रक्रिया को महत्व देता है।
शेषन के बाद भी खत्म नहीं हुई अंदरूनी खींचतान
1993-95 का विवाद कोई अकेला अध्याय नहीं था।गोपालस्वामी बनाम नवीन चावला2006 से 2009 के बीच तत्कालीन CEC एन. गोपालस्वामी और चुनाव आयुक्त नवीन चावला के बीच मतभेद सार्वजनिक हुए। गोपालस्वामी ने चावला को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति से की थी। यह प्रकरण भी आयोग के भीतर अधिकार और निष्पक्षता को लेकर गंभीर राजनीतिक बहस का कारण बना।
2019: लवासा बनाम अरोड़ा
2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयुक्त अशोक लवासा और तत्कालीन CEC सुनील अरोड़ा के बीच मतभेद की खबरें सामने आईं। बाद में लवासा ने अगस्त 2020 में चुनाव आयोग से इस्तीफा दे दिया।इसलिए मौजूदा विवाद को केवल किसी एक व्यक्ति या सरकार से जोड़कर देखना अधूरा होगा। इतिहास बताता है कि बहुसदस्यीय आयोग में अधिकारों, प्रक्रियाओं और असहमति को लेकर तनाव अलग-अलग दौर में सामने आता रहा है।
2026: ज्ञानेश कुमार के दौर में फिर क्यों गरमाया मामला?
अब विवाद का केंद्र CEC ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त एसएस संधू तथा विवेक जोशी से जुड़ी कथित आपत्तियां हैं।इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने करीब 10 महीने की अवधि में कम से कम 14 मौकों पर मतदाता सूची, नाम जोड़ने-हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव और चुनावी डेटा के प्रबंधन जैसे विषयों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट ने इसे आयोग के भीतर महत्वपूर्ण मतभेद के रूप में प्रस्तुत किया।इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद विवाद इसलिए बड़ा हो गया क्योंकि मामला केवल अधिकारियों के बीच प्रशासनिक मतभेद का नहीं, बल्कि मतदाता सूची और चुनावी डेटा की प्रक्रिया से जुड़ा है।
चुनाव आयोग का जवाब क्या है?
आयोग ने अंदरूनी मतभेद की व्याख्या को खारिज करते हुए कहा है कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग सदस्यों द्वारा विचार, सुझाव और आपत्तियां रखना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।ECI के मुताबिक अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं और SIR से संबंधित फैसले भी आयोग के तीनों सदस्यों की स्वीकृति से हुए हैं। आयोग ने आंतरिक विचार-विमर्श को संस्थागत “checks and balances” का हिस्सा बताया है।
यानी यहां दो अलग दावे हैं—एक ओर रिपोर्टों में दर्ज आपत्तियां हैं, दूसरी ओर आयोग का कहना है कि आपत्तियां deliberation का हिस्सा थीं और अंतिम निर्णय सर्वसम्मत रहे।दोनों को एक ही चीज मानना संवैधानिक रूप से सही नहीं होगा।
विपक्ष का सवाल: अगर आपत्ति थी तो फैसले सर्वसम्मत कैसे?
विपक्षी दलों ने कथित लिखित आपत्तियों को आधार बनाकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई और स्वतंत्र जांच की मांग की है। कुछ विपक्षी नेताओं ने SIR को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं।
विपक्ष की दलील का मूल प्रश्न यह है कि अगर दो आयुक्तों ने किसी निर्णय या प्रक्रिया पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की, तो उस पूरे घटनाक्रम और अंतिम निर्णय प्रक्रिया को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों न किया जाए?
यह सवाल राजनीतिक है, लेकिन इसके भीतर एक संस्थागत प्रश्न भी छिपा है—चुनाव आयोग के भीतर असहमति दर्ज होने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होनी चाहिए?
BJP का पलटवार: असहमति लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा
BJP ने विपक्ष के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि चुनाव आयोग के सदस्यों के बीच विचारों का अलग होना लोकतांत्रिक और संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है। उन्होंने कांग्रेस के शासनकाल में नियुक्त रहे कुछ पूर्व चुनाव आयुक्तों और उनके बाद के राजनीतिक/सार्वजनिक भूमिकाओं के उदाहरण भी गिनाए और विपक्ष की आलोचना पर सवाल उठाए।भाजपा का तर्क मूलतः यह है कि किसी बैठक या फाइल पर अलग राय होना अपने आप में संस्थागत संकट का प्रमाण नहीं है, खासकर तब जब अंतिम निर्णय आयोग की निर्धारित प्रक्रिया से हुआ हो।
कानूनविद क्या सवाल देख रहे हैं?
कानून के नजरिए से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव आयोग कोई सामान्य सरकारी विभाग नहीं है। यह संविधान से पैदा हुई संस्था है। अनुच्छेद 324 चुनावों के संचालन की व्यापक जिम्मेदारी आयोग को देता है।1995 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भी साफ किया कि बहुसदस्यीय आयोग में CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच संबंध को सामान्य सरकारी पदानुक्रम की तरह नहीं देखा जा सकता।
CEC चेयरमैन है, लेकिन दूसरे आयुक्त भी आयोग के पूर्ण सदस्य हैं।2023 के कानून में भी आयोग के कामकाज में सर्वसम्मति को प्राथमिकता दी गई है और मतभेद होने पर बहुमत के आधार पर निर्णय का प्रावधान है। यही प्रावधान मौजूदा विवाद को समझने में महत्वपूर्ण है।
शिक्षाविदों और राजनीतिक विश्लेषकों के लिए असली मुद्दा क्या?
राजनीतिक विज्ञान के नजरिए से यह विवाद केवल “CEC बनाम Election Commissioners” की कहानी नहीं है। यह किसी भी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था में तीन चीजों के संतुलन का सवाल है—पहला—अधिकार।
किस सदस्य के पास कौन-सा निर्णय लेने का अधिकार है?
दूसरा—पारदर्शिता।अंदर हुई असहमति और अंतिम निर्णय के बीच की प्रक्रिया जनता के सामने कितनी स्पष्ट होनी चाहिए?
तीसरा—संस्थागत विश्वसनीयता।जब चुनाव प्रक्रिया पर राजनीतिक दलों का भरोसा ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है, तब आयोग के भीतर होने वाली हर सार्वजनिक खींचतान का असर संस्था की धारणा पर पड़ता है।
यही कारण है कि 1993 में शेषन और उनके सहयोगियों का विवाद हो या 2026 में SIR से जुड़ी कथित आपत्तियां—मुद्दा व्यक्तियों से आगे जाकर संस्था की कार्यप्रणाली का बन जाता है।
1989 से 2026: चेहरों से ज्यादा महत्वपूर्ण है व्यवस्था
तीन दशक से ज्यादा की कहानी में चेहरे बदलते रहे—आरवीएस पेरी शास्त्री, टीएन शेषन, एमएस गिल, कृष्णमूर्ति, गोपालस्वामी, नवीन चावला, अशोक लवासा, सुनील अरोड़ा और अब ज्ञानेश कुमार-संधू-जोशी।
लेकिन सवाल बार-बार वही लौटता रहा—क्या चुनाव आयोग एक व्यक्ति की संस्था है या सामूहिक संवैधानिक संस्था?
सुप्रीम कोर्ट का 1995 का उत्तर इस मामले में महत्वपूर्ण दिशा देता है—संस्था व्यक्ति से ऊपर है।आज की बहस में भी इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कौन किससे नाराज है। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आयोग के भीतर असहमति के लिए पर्याप्त संस्थागत जगह है,
क्या अंतिम निर्णय की प्रक्रिया स्पष्ट है और क्या मतदाता उस प्रक्रिया पर भरोसा कर सकता है?
यही सवाल 1989 में भी था, 1993 में भी था और 2026 में भी भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ा है।
एन एस के विश्लेषण
चुनाव आयोग की ताकत सिर्फ उसके संवैधानिक अधिकारों में नहीं, बल्कि उसकी सार्वजनिक विश्वसनीयता में भी निहित है। असहमति होना किसी संस्था की कमजोरी का स्वतः प्रमाण नहीं; कई बार असहमति ही संस्थागत जांच-पड़ताल का हिस्सा होती है।
लेकिन जब मतदाता सूची, SIR और चुनावी डेटा जैसे मूल चुनावी प्रश्न विवाद के केंद्र में हों, तब असहमति और अंतिम निर्णय के बीच की प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता का महत्व बढ़ जाता है।
1989 से 2026 तक की कहानी यही बताती है कि चुनाव आयोग में सबसे बड़ा संघर्ष अक्सर व्यक्तियों के बीच दिखाई देता है, लेकिन उसकी जड़ में अधिकार, प्रक्रिया और संस्थागत स्वतंत्रता का सवाल होता है।
बी. के. झा
एन एस के
