बी के झा
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नई दिल्ली, 1 अक्टूबर
चुनाव आयोग की डिजिटल व्यवस्था और मतदाता सूची को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच अब निर्वाचन आयोग की सूचना प्रौद्योगिकी महानिदेशक डॉ. सीमा खन्ना का नाम भी विपक्ष के निशाने पर आ गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा ने सीमा खन्ना के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग करते हुए दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में शिकायत देने की जानकारी दी है।
महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर बताया कि उन्होंने सीमा खन्ना के खिलाफ FIR दर्ज करने के लिए पुलिस को शिकायत दी है। उनके मुताबिक, थाना प्रभारी ने शिकायत पर FIR दर्ज करने के लिए मामला बनता है या नहीं, यह देखने के लिए 5 अक्टूबर तक का समय मांगा है। महुआ ने कहा कि वह 6 अक्टूबर को फॉलो-अप के लिए दोबारा थाने जाएंगी।
कौन हैं सीमा खन्ना?
डॉ. सीमा खन्ना निर्वाचन आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की महानिदेशक हैं और आयोग की डिजिटल एवं IT व्यवस्था से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालती हैं। वह वर्ष 2025 में नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) से प्रतिनियुक्ति पर निर्वाचन आयोग में आई थीं।चुनाव प्रक्रिया में तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ने के साथ आयोग की डिजिटल प्रणालियां भी बेहद महत्वपूर्ण हो गई हैं। मतदाता संबंधी सेवाओं से लेकर चुनाव प्रबंधन तक कई प्रक्रियाओं में IT सिस्टम का इस्तेमाल होता है। ऐसे में आयोग के डिजिटल ढांचे की निगरानी करने वाले वरिष्ठ अधिकारी की भूमिका स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है।
ECINet को लेकर क्यों उठे सवाल?
विवाद के केंद्र में निर्वाचन आयोग का ECINet डिजिटल प्लेटफॉर्म भी है। आयोग ने इसे विभिन्न डिजिटल सेवाओं और एप्लिकेशन को एकीकृत करने वाली व्यवस्था के तौर पर पेश किया है। इसका उद्देश्य चुनाव संबंधी डिजिटल सेवाओं को एक प्लेटफॉर्म से जोड़ना और प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित बनाना है।लेकिन विपक्षी दलों का आरोप है कि इस डिजिटल ढांचे में मतदाता डेटा और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सिस्टम का नियंत्रण किस स्तर पर और किस तरीके से संचालित होता है, इसे लेकर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं है।कांग्रेस, TMC और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) समेत कुछ विपक्षी समूहों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और सीमा खन्ना पर सवाल उठाए हैं। इन दलों और समूहों की ओर से आरोप लगाया गया है कि डिजिटल सिस्टम के जरिए मतदाता सूची से संबंधित डेटा में कथित तौर पर ऐसी छेड़छाड़ की गई, जिसकी जानकारी जमीनी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों को नहीं थी।
हालांकि, ये राजनीतिक आरोप हैं और इनके सत्य होने का स्वतंत्र रूप से निष्कर्ष निकालना अभी उचित नहीं होगा। किसी भी कथित सॉफ्टवेयर छेड़छाड़ या मतदाता सूची में हेरफेर की पुष्टि के लिए तकनीकी साक्ष्य, जांच और संबंधित अधिकारियों का पक्ष जरूरी होगा।
ERO और BLO को लेकर भी सवाल
विपक्ष की ओर से यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि यदि मतदाता सूची में किसी प्रकार का डिजिटल परिवर्तन हुआ, तो उसकी जानकारी Electoral Registration Officers (ERO) और Booth Level Officers (BLO) जैसे जमीनी स्तर के अधिकारियों तक किस प्रक्रिया से पहुंची।यही वजह है कि अब विवाद सिर्फ मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं रह गया है। बहस का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर केंद्रित है कि डिजिटल सिस्टम में डेटा के प्रवेश, संशोधन, सत्यापन और निगरानी की पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है।
विपक्षी दलों की मांग है कि इन सवालों का स्पष्ट और दस्तावेजी जवाब सामने आना चाहिए।
FIR की मांग से बढ़ा राजनीतिक तापमान
महुआ मोइत्रा की पुलिस शिकायत ने इस पूरे मामले को राजनीतिक बहस से आगे बढ़ाकर कानूनी जांच के सवाल तक पहुंचा दिया है। अब पुलिस के सामने यह तय करने का सवाल है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर प्राथमिकी दर्ज करने योग्य संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं।महुआ के मुताबिक SHO ने इस संबंध में 5 अक्टूबर तक का समय मांगा है। उन्होंने कहा है कि वह 6 अक्टूबर को मामले की स्थिति जानने के लिए फिर थाने पहुंचेंगी।
अगर FIR दर्ज होती है तो मामला जांच के अगले चरण में जाएगा। वहीं FIR दर्ज नहीं होने की स्थिति में शिकायतकर्ता के पास उपलब्ध कानूनी विकल्पों का सवाल सामने आ सकता है।
चुनावी प्रक्रिया में डिजिटल सिस्टम पर बड़ी बहस
ECINet और चुनाव आयोग की IT व्यवस्था को लेकर उठा विवाद एक बड़े सवाल की ओर भी इशारा करता है—जब चुनावी प्रक्रिया का बड़ा हिस्सा डिजिटल हो रहा है, तो डेटा की सुरक्षा, ऑडिट और जवाबदेही की व्यवस्था कितनी स्पष्ट होनी चाहिए?
मतदाता सूची लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी कड़ी है। इसलिए उसमें किसी भी तरह के बदलाव को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि रिकॉर्ड, तकनीकी ऑडिट और पारदर्शी प्रक्रिया के जरिए दिया जाना महत्वपूर्ण है।
विपक्ष आरोप लगा रहा है, जबकि चुनाव आयोग को इन आरोपों पर अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा। यही इस विवाद का सबसे अहम पहलू है—आरोप और तथ्य के बीच की दूरी जांच और प्रमाण से ही तय होगी।
एन एस के की नजर
चुनाव अब सिर्फ बूथ, बैलेट और मतदाता सूची तक सीमित नहीं रहा। डिजिटल दौर में चुनावी व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा सॉफ्टवेयर, सर्वर और डेटा के भीतर संचालित होता है। ऐसे में सिस्टम पर उठने वाला हर सवाल लोकतांत्रिक भरोसे से जुड़ जाता है।
सीमा खन्ना के खिलाफ FIR की मांग ने इसी भरोसे की बहस को एक नया मोड़ दिया है।
अब निगाहें दिल्ली पुलिस की कार्रवाई, निर्वाचन आयोग के स्पष्टीकरण और उन तकनीकी तथ्यों पर रहेंगी, जो यह स्पष्ट कर सकते हैं कि लगाए गए आरोपों में कितना तथ्य है और कितना राजनीतिक दावा।
