भागलपुर में जीवंत हुआ संघ का इतिहास: डॉ. हेडगेवार और श्री गुरुजी के किरदारों ने छुआ दिल, नागपुर के 40 कलाकारों ने बिखेरा अभिनय का जादू; खचाखच भरा हॉल, महानाट्य के अंतिम दृश्य में नम हुईं आंखें

बी. के. झा, एन एस के

NSK news India

भागलपुर,(बिहार )- 28 अक्टूबर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष पर भागलपुर का ऐतिहासिक टाउन हॉल एक ऐसी नाट्य प्रस्तुति का साक्षी बना, जिसमें इतिहास के पन्ने मंच पर जीवंत होते नजर आए। कहीं राष्ट्रभक्ति का ओज था, कहीं संगठन निर्माण का संघर्ष और कहीं गुरु-शिष्य परंपरा की भावुक तस्वीर।

संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन, विचारों और संघ की स्थापना की यात्रा पर आधारित महानाट्य ‘युग प्रवर्तक डॉ. हेडगेवार’ ने दर्शकों को 1925 के दौर की स्मृतियों से रूबरू कराया। नाटक के अंतिम दृश्यों में डॉ. हेडगेवार की अस्वस्थता और श्री गुरुजी को दायित्व सौंपने के प्रसंग ने माहौल को भावुक कर दिया। दर्शक देर रात तक मंच की ओर टकटकी लगाए रहे।

बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत वंदे मातरम् के संपूर्ण गायन से हुई। नागपुर की प्रतिष्ठित सांस्कृतिक संस्था ‘नादब्रह्म’ के 40 सदस्यीय कलाकार दल ने अपने प्रभावशाली अभिनय, संवाद और मंचीय प्रस्तुति से दर्शकों को बांधे रखा। देशभर में इस महानाट्य का यह 68वां विशेष मंचन था। डॉ. हेडगेवार की भूमिका में सतीश खेकाळे और माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर यानी श्री गुरुजी के किरदार में अमोल तेलपांडे ने अपने अभिनय से पात्रों को सजीव बना दिया।

मंच पर लौटा 1925 का वह ऐतिहासिक दौर

महानाट्य की सबसे खास बात यह रही कि इसने केवल डॉ. हेडगेवार के जीवन की घटनाओं को प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उन वैचारिक मंथनों और संगठनात्मक प्रयासों को भी मंच पर उतारा, जिनसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की पृष्ठभूमि तैयार हुई। कांग्रेस अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य को लेकर डॉ. हेडगेवार के विचारों से लेकर विजयदशमी, 1925 को संघ की स्थापना तक की यात्रा को प्रभावशाली ढंग से दर्शाया गया।

संघ का नामकरण, शाखा पद्धति की शुरुआत, संघ स्थान की सफाई, प्रथम गुरु पूर्णिमा उत्सव, सरसंघचालक की घोषणा और संघ शिक्षा वर्ग जैसे प्रसंगों ने दर्शकों को संगठन के शुरुआती दौर से परिचित कराया। मंच पर उभरते दृश्य और ओजस्वी संवाद उस समय के संघर्ष, संकल्प और विचारधारा की झलक पेश करते रहे।नाटक में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के कर्मयोग, महर्षि अरविंद के आध्यात्मिक राष्ट्रवाद, वीर सावरकर की राष्ट्रभक्ति और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ सशस्त्र क्रांति से जुड़े विचार-विमर्श को भी स्थान दिया गया। इन प्रसंगों के जरिए उस ऐतिहासिक कालखंड की वैचारिक विविधता और स्वतंत्रता की आकांक्षा को रेखांकित किया गया।

जब डॉ. हेडगेवार और श्री गुरुजी के प्रसंग ने दर्शकों को भावुक किया

महानाट्य का उत्तरार्ध दर्शकों के लिए सबसे भावुक क्षण लेकर आया। डॉ. हेडगेवार की अस्वस्थता और संघ शिक्षा वर्ग के दौरान श्री गुरुजी को दायित्व सौंपने का दृश्य मंच पर आया तो टाउन हॉल में सन्नाटा छा गया। राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित जीवन और संगठन की निरंतरता के इस प्रसंग ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया।सतीश खेकाळे ने डॉ. हेडगेवार के संघर्ष और संकल्प को अभिनय के जरिए उकेरा, जबकि अमोल तेलपांडे ने श्री गुरुजी की भूमिका में प्रभाव छोड़ा।

अंतिम दृश्यों के दौरान भावुक दर्शकों के बीच भारत माता की जय और वंदे मातरम् के उद्घोष गूंजते रहे। मंच और दर्शक दीर्घा के बीच का फासला मानो मिट गया और पूरा परिसर राष्ट्रभक्ति के नारों से गूंज उठा।

स्वामी आगमानंद ने किया उद्घाटन, राष्ट्रसेवा के भाव पर दिया जोर

कार्यक्रम का उद्घाटन नवगछिया स्थित श्री शिवशक्ति योग पीठ के पीठाधीश्वर तथा अयोध्या के श्री उत्तरतोताद्रि मठ, विभीषणकुंड के उत्तराधिकारी जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी आगमानंद जी महाराज ने दीप प्रज्वलित कर किया।अपने आशीर्वचन में स्वामी आगमानंद जी ने स्वामी विवेकानंद के ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ के आह्वान का उल्लेख करते हुए हिंदू समाज, संस्कृति और राष्ट्रभक्ति के संरक्षण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका की सराहना की।

उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार और श्री गुरुजी ने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित कर दिया।इस अवसर पर बिहार सरकार के पथ निर्माण मंत्री ई. कुमार शैलेंद्र, भागलपुर की महापौर डॉ. वसुंधरा लाल, विधायक रोहित पांडेय, मुरारी पासवान, मिथुन यादव और पूरण लाल टुडू सहित संघ के कई वरिष्ठ पदाधिकारी मंचासीन रहे। इनमें भागलपुर विभाग संघचालक नरेश मोहन झा, विभाग सह संघचालक डॉ. राणा प्रताप सिंह, महानगर संघचालक डॉ. चंद्रशेखर साह और दक्षिण बिहार प्रांत के सह कार्यवाह बालमुकुंद गुप्त शामिल थे।

खचाखच भरा टाउन हॉल, बाहर भी उमड़ा दर्शकों का हुजूम

महानाट्य को लेकर भागलपुर में दर्शकों का उत्साह देखते ही बना। टाउन हॉल की सभी कुर्सियां भर गईं और गैलरी तक दर्शकों से खचाखच नजर आई। कार्यक्रम में लोगों की भारी मौजूदगी को देखते हुए आयोजन समिति ने परिसर के बाहर बड़ी एलईडी स्क्रीन लगाई, जहां सैकड़ों लोगों ने खड़े होकर पूरी प्रस्तुति देखी।कार्यक्रम में बिहार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. दुनिया राम सिंह, जिन्हें डॉ. डी. आर. सिंह के नाम से भी जाना जाता है, तथा तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय और भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के पूर्व कुलपति प्रो. डॉ. अवध किशोर राय सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे।

भजन सम्राट डॉ. हिमांशु मोहन मिश्र ‘दीपक जी’, कुंदन बाबा, डॉ. बिहारी लाल, श्वेता सुमन, स्मार्त परमहंस आचार्य पंकज अथर्व और दिलीप शास्त्री समेत कई विशिष्ट अतिथियों ने कार्यक्रम में भाग लिया।

इतिहास, अभिनय और संगीत का समन्वय

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री रविजी भुसारी के संरक्षण तथा नागपुर की सांस्कृतिक संस्था ‘नादब्रह्म’ की प्रस्तुति में तैयार इस महानाट्य का लेखन डॉ. अजय प्रधान ने किया है। पद्माकर धानोरकर इसके निर्माता और सुबोध सुर्जिकर निर्देशक हैं, जबकि संगीत की जिम्मेदारी शैलेश दाणी ने संभाली है। प्रचार-प्रसार प्रमुख रविंद्र सहस्त्रबुद्धे और तकनीकी एवं व्यवस्थापकीय दायित्व अरविंद उपाध्ये ने निभाया।

कार्यक्रम का मंच संचालन विभाग प्रचार प्रमुख अजीत घोष ने किया और आयोजन समिति प्रमुख नीरज शुक्ला ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। आयोजन को सफल बनाने में विभाग प्रचारक सुरेन्द्र जी सहित समिति के अनेक कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों की सक्रिय भूमिका रही।इस अवसर पर भाजपा, विश्व हिंदू परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और श्री शिवशक्ति योगपीठ से जुड़े सैकड़ों कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित लोगों ने भगवा ध्वज पर श्रद्धापूर्वक पुष्पार्चन किया।

भागलपुर में ‘युग प्रवर्तक डॉ. हेडगेवार’ का यह मंचन केवल एक नाट्य प्रस्तुति तक सीमित नहीं रहा। इसने दर्शकों के सामने संघ के शुरुआती दौर, उसके संस्थापक के जीवन और संगठन के नेतृत्व हस्तांतरण की कहानी को मंचीय भाषा में प्रस्तुत किया।

इतिहास, विचार और भावनाओं के इस संगम ने शताब्दी वर्ष के आयोजन को यादगार बना दिया।

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