बी के झा
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नई दिल्ली, 12 सितंबर
दुनिया की बदलती शक्ति-संरचना में अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया है कि किस देश के पास कितनी बड़ी अर्थव्यवस्था है या उसकी करेंसी का कितना दबदबा है। आने वाले दौर में असली ताकत उस देश और समूह की होगी, जिसके पास कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम टेक्नोलॉजी, डिजिटल भुगतान और अत्याधुनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर मजबूत पकड़ होगी।
नई दिल्ली में चल रहे BRICS सम्मेलन 2026 ने इसी बदलते वैश्विक समीकरण की ओर संकेत किया है।
BRICS का एजेंडा अब पारंपरिक आर्थिक सहयोग से आगे निकलकर तकनीकी और डिजिटल क्षेत्र तक पहुंच चुका है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लेकर क्वांटम टेक्नोलॉजी, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और सीमा-पार डिजिटल भुगतान तक—ये सभी विषय भविष्य की आर्थिक और रणनीतिक ताकत से सीधे जुड़े हैं। यानी BRICS की ताकत का पैमाना अब केवल डॉलर, व्यापार और बाजार नहीं, बल्कि डेटा, डिजिटल नेटवर्क और टेक्नोलॉजी की क्षमता भी बनने जा रहा है।
डॉलर को हटाना नहीं, निर्भरता घटाना है लक्ष्य
BRICS देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों की बैठकों में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने को लेकर चर्चा हुई है। हालांकि संयुक्त बयान में डॉलर को वैश्विक व्यवस्था से हटाने जैसी कोई बात नहीं कही गई है। इसके बजाय स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और निवेश तथा सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया गया है।यही अंतर BRICS की मौजूदा रणनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। मकसद तत्काल डॉलर को खत्म करना नहीं, बल्कि ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करना है जिसमें सदस्य देशों के बीच व्यापार के लिए हर बार डॉलर के रास्ते से गुजरना जरूरी न हो।
कॉमन पेमेंट सिस्टम बना तो बदल सकता है खेल
मौजूदा अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में एक देश से दूसरे देश तक पैसा पहुंचने के लिए कई बार कॉरेस्पोंडेंट बैंकों और अलग-अलग वित्तीय प्रणालियों की जरूरत पड़ती है। इसमें करेंसी कन्वर्जन शुल्क, मध्यस्थ बैंक की फीस, अलग-अलग नियामकीय प्रक्रियाएं और सेटलमेंट में देरी जैसी समस्याएं सामने आती हैं।ऐसे में BRICS देशों के बीच एक अधिक प्रभावी सीमा-पार भुगतान नेटवर्क विकसित होता है तो व्यापार की लागत और समय दोनों कम किए जा सकते हैं।
रूस, ईरान और भारत समेत कई BRICS देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर कनेक्टिविटी की वकालत कर चुके हैं। इसका अर्थ यह है कि भविष्य में दो देशों के बीच व्यापार का एक बड़ा हिस्सा सीधे उनकी राष्ट्रीय मुद्राओं में सेटल हो सके, बिना हर लेनदेन को पहले डॉलर में बदलने की जरूरत पड़े।
UPI ने भारत को दिया रणनीतिक बढ़त का मौका
यहीं भारत की भूमिका सबसे दिलचस्प हो जाती है। भारत ने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के जरिए दुनिया को बड़े पैमाने पर तत्काल डिजिटल भुगतान का एक सफल मॉडल दिखाया है। भारत पहले से कई देशों के साथ डिजिटल पेमेंट सिस्टम की इंटरऑपरेबिलिटी और UPI आधारित भुगतान को बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।
BRICS के संदर्भ में इसका महत्व केवल सुविधा तक सीमित नहीं है। यदि सदस्य देशों के डिजिटल भुगतान नेटवर्क आपस में जुड़ते हैं, तो यह भविष्य में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान को अधिक व्यावहारिक बना सकता है।यानी भारत के लिए UPI केवल घरेलू भुगतान प्रणाली नहीं, बल्कि डिजिटल कूटनीति और आर्थिक रणनीति का एक महत्वपूर्ण औजार भी बन सकता है।
भारत को क्या मिलेगा?
इस पूरी कवायद में भारत के लिए सबसे बड़ा संभावित लाभ रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल में वृद्धि हो सकता है। यदि भारतीय आयातक और निर्यातक अधिक संख्या में सीधे रुपये में व्यापार का सेटलमेंट कर पाते हैं तो रुपये की अंतरराष्ट्रीय मांग बढ़ सकती है।इसके साथ ही व्यापारियों को डॉलर के मुकाबले विनिमय दर में होने वाले उतार-चढ़ाव के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है। कम ट्रांजैक्शन कॉस्ट और तेज सेटलमेंट का फायदा खास तौर पर छोटे निर्यातकों, सेवा क्षेत्र और पर्यटन कारोबार को मिल सकता है।
हालांकि यह प्रक्रिया आसान नहीं होगी। अलग-अलग BRICS देशों की मुद्राओं, बैंकिंग प्रणालियों, वित्तीय नियमों और आर्थिक नीतियों में बड़ा अंतर है। इसलिए एक साझा भुगतान व्यवस्था तैयार करना केवल तकनीकी परियोजना नहीं, बल्कि वित्तीय और राजनीतिक समन्वय की भी बड़ी परीक्षा होगी।
असली मुकाबला अब टेक्नोलॉजी की ताकत का
BRICS की उभरती रणनीति का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि भविष्य की वैश्विक शक्ति केवल मुद्रा भंडार या सैन्य क्षमता से तय नहीं होगी। AI किसके नियंत्रण में है, क्वांटम कंप्यूटिंग में कौन आगे है, डिजिटल भुगतान का नेटवर्क किसके पास है और डेटा आधारित अर्थव्यवस्था को कौन दिशा देता है—ये सवाल भी उतने ही निर्णायक होंगे।
भारत के पास यहां एक महत्वपूर्ण अवसर है। UPI और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का अनुभव, तेजी से बढ़ता AI इकोसिस्टम और क्वांटम टेक्नोलॉजी पर बढ़ता निवेश भारत को BRICS के भीतर तकनीकी सहयोग का महत्वपूर्ण केंद्र बना सकता है।
BRICS के सामने सबसे बड़ी चुनौती
लेकिन किसी भी वैकल्पिक वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की सफलता केवल घोषणा से नहीं होगी। उसके लिए भरोसा, साइबर सुरक्षा, तकनीकी मानक, डेटा सुरक्षा, करेंसी कन्वर्टिबिलिटी और सदस्य देशों के बीच मजबूत संस्थागत सहयोग जरूरी होगा।
अगर BRICS इन चुनौतियों को पार कर लेता है, तो उसका महत्व सिर्फ एक आर्थिक समूह तक सीमित नहीं रहेगा। यह धीरे-धीरे एक ऐसे बहुध्रुवीय डिजिटल और आर्थिक नेटवर्क का रूप ले सकता है, जहां व्यापार, भुगतान और तकनीकी सहयोग के लिए पश्चिमी वित्तीय ढांचे पर निर्भरता कुछ हद तक कम हो।
नई दिल्ली में जुटे BRICS के 11 देशों के प्रतिनिधियों के बीच चल रही चर्चा इसलिए महज एक सम्मेलन की कवायद नहीं है।
इसके पीछे भविष्य की उस दुनिया की रूपरेखा दिखाई दे रही है, जहां डॉलर के साथ-साथ डेटा, डिजिटल नेटवर्क, AI और क्वांटम टेक्नोलॉजी भी वैश्विक प्रभाव का पैमाना तय करेंगे।
यही BRICS की अगली शक्ति-कहानी हो सकती है—मुद्रा से डिजिटल संप्रभुता तक और व्यापार से टेक्नोलॉजी की महाशक्ति बनने तक।
