बी के झा
NSK news India

मुजफ्फरपुर/पटना, 30 अगस्त
बिहार की राजनीति में जमीन और रसूख का गठजोड़ एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार आरोप केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान के खेमे से जुड़े बेलसंड विधायक अमित कुमार रानू पर लगा है। एक सेवानिवृत्त अवर सचिव ने विधायक, उनके भाई, मुशहरी के अंचलाधिकारी समेत आठ लोगों के खिलाफ करीब 15 करोड़ रुपये मूल्य की जमीन को कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के जरिए हड़पने की साजिश का आरोप लगाते हुए अहियापुर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई है।
मामला इसलिए और गंभीर हो गया है क्योंकि शिकायतकर्ता का कहना है कि जिस जमीन को लेकर विवाद खड़ा हुआ, वह उनके परिवार की खतियानी जमीन है और कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर उसका दाखिल-खारिज कराया गया। शिकायतकर्ता ने प्रशासनिक अधिकारियों पर भी भू-माफिया को मदद पहुंचाने का आरोप लगाया है। सबसे अहम बात यह है कि यह मामला केवल पुलिस की प्राथमिकी तक सीमित नहीं रहा।
शिकायत के बाद जिलाधिकारी स्तर पर जांच कराई गई और एडीएम की जांच में कथित दस्तावेजी गड़बड़ी सामने आने का दावा किया गया है। सीओ से स्पष्टीकरण भी मांगा गया है।हालांकि, एफआईआर में लगाए गए आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं। अब पुलिस जांच, दस्तावेजों की फोरेंसिक पड़ताल और अदालत की प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि आरोपों में कितनी सच्चाई है।
जिस जमीन पर विवाद, उसकी कीमत करीब 15 करोड़ बताई गई
शहबाजपुर सलेम गांव निवासी और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सेवानिवृत्त अवर सचिव विजय कुमार ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि उनके दादा योगेंद्र शाही के नाम दर्ज खतियानी जमीन के संबंध में फर्जी केवाला और अन्य दस्तावेज तैयार किए गए।
शिकायत के मुताबिक इन्हीं कथित दस्तावेजों के आधार पर जमीन का दाखिल-खारिज दूसरे लोगों के नाम करा दिया गया।आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में बेलसंड विधायक अमित कुमार रानू, उनके भाई अभिनव कुमार तथा राजस्व विभाग से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका रही।
शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि जमीन पर दावा मजबूत करने के बाद भू-माफिया गिरोह के लोग उनके घर पहुंचकर धमकी देने लगे।अगर जांच में ये आरोप सही साबित होते हैं तो मामला केवल जमीन के स्वामित्व विवाद का नहीं रहेगा, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड, प्रशासनिक प्रक्रिया और राजनीतिक प्रभाव के कथित दुरुपयोग का गंभीर मामला बन जाएगा।
विधायक के साथ सरकारी अधिकारी भी आरोपी
इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्राथमिकी में केवल राजनीतिक व्यक्ति का नाम नहीं है।मुशहरी सीओ महेंद्र शुक्ला, राजस्व अधिकारी और राजस्व कर्मचारियों पर भी कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दाखिल-खारिज कराने में सहयोग करने के आरोप लगाए गए हैं।
यानी शिकायतकर्ता के आरोपों का केंद्र केवल यह नहीं है कि किसी ने जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की, बल्कि यह भी है कि सरकारी रिकॉर्ड में कथित हेरफेर के लिए प्रशासनिक तंत्र का इस्तेमाल किया गया।यहीं से यह मामला और गंभीर हो जाता है।क्योंकि आम आदमी की जमीन पर कब्जे की कोशिश और सरकारी राजस्व व्यवस्था के कथित इस्तेमाल के बीच बड़ा अंतर है।
पहले मामले में अपराधी जमीन पर कब्जा करने की कोशिश करता है, लेकिन दूसरे मामले में अगर आरोप सही साबित हों तो पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में आ जाती है।
डीएम की जांच के बाद कहानी ने लिया नया मोड़
विजय कुमार ने पहले जिलाधिकारी से शिकायत की थी। इसके बाद मामले की जांच एडीएम को सौंपी गई।शिकायतकर्ता के अनुसार, जांच में दस्तावेजी गड़बड़ी सामने आई और संबंधित अंचलाधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा गया। भूमि सुधार एवं राजस्व विभाग को कार्रवाई की अनुशंसा किए जाने की चेतावनी भी दी गई।यही प्रशासनिक जांच इस प्रकरण का महत्वपूर्ण पहलू है।
अब पुलिस के सामने केवल शिकायतकर्ता का बयान नहीं, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड, कथित केवाला, दाखिल-खारिज की प्रक्रिया, संबंधित अधिकारियों की भूमिका और जमीन के वास्तविक स्वामित्व से जुड़े दस्तावेजों की जांच का सवाल है।
अगर रिकॉर्ड में हेरफेर हुई है तो वह किस स्तर पर हुई?
किसने दस्तावेज तैयार किए?दाखिल-खारिज किस आधार पर हुआ?
अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच कैसे की?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या किसी राजनीतिक रसूख का प्रशासनिक प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ा?
इन सवालों के जवाब जांच से ही सामने आ सकते हैं।
SSP से शिकायत के बाद दर्ज हुई FIR
विजय कुमार ने पुलिस अधिकारियों से भी शिकायत की। उन्होंने सिटी एसपी मोहिबुल्लाह अंसारी से मुलाकात कर कार्रवाई की मांग की।पुलिस के मुताबिक शिकायत के आधार पर बेलसंड विधायक, उनके भाई, मुशहरी सीओ समेत आठ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। पुलिस ने मामले की जांच कर आगे की कार्रवाई का भरोसा दिया है।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य समझना जरूरी है—
FIR किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं करती। यह जांच की शुरुआत होती है।इसलिए विधायक या अन्य आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की सत्यता जांच के बाद ही तय होगी।लेकिन FIR दर्ज होने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल जरूर खड़ा हो चुका है।
अब सवाल चिराग पासवान से भी पूछा जाएगा
अमित कुमार रानू का राजनीतिक संबंध चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) से है। इसलिए इस पूरे विवाद का राजनीतिक असर स्वाभाविक है।चिराग पासवान के सामने अब चुनौती यह है कि वह अपने विधायक के खिलाफ लगे आरोपों को किस तरह देखते हैं।किसी पार्टी के लिए अपने विधायक का बचाव करना राजनीतिक रूप से स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन जनता के बीच सवाल इससे बड़ा है—
क्या पार्टी नेतृत्व जांच पूरी होने तक निष्पक्ष जांच का समर्थन करेगा?
यदि आरोप गलत हैं तो जांच विधायक को बेदाग साबित कर सकती है।
यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो पार्टी नेतृत्व को भी राजनीतिक और नैतिक स्तर पर निर्णय लेना पड़ेगा।
यही वह जगह है जहां राजनीतिक दलों की असली परीक्षा होती है।
सेवानिवृत्त शिक्षक की टिप्पणी ने उठाया बड़ा सवाल
एक स्थानीय सेवानिवृत्त शिक्षक ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर इस पूरे मामले को बिहार की राजनीति और प्रशासन में बढ़ते कथित प्रभाव के संदर्भ में गंभीर बताया।उन्होंने कहा कि यदि एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी की जमीन से जुड़े मामले में निर्वाचित विधायक और राजस्व अधिकारियों के नाम प्राथमिकी में आते हैं, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
उनका कहना था कि यह अच्छी बात है कि प्रशासन और पुलिस ने शिकायत को दबाने के बजाय जांच और FIR की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। उन्होंने पुलिस-प्रशासन की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि किसी भी राजनीतिक प्रभाव से ऊपर कानून को खड़ा करना ही लोकतंत्र की असली ताकत है।
सेवानिवृत्त शिक्षक ने हालांकि राजनीतिक स्तर पर बेहद तीखी टिप्पणी भी की। उनका आरोप था कि बिहार में राजनीतिक प्रभाव के कारण जमीन से जुड़े विवादों को कई बार सामान्य नागरिक की पहुंच से बाहर कर दिया जाता है।
उन्होंने कहा कि इस मामले में विधायक का नाम सामने आने के कारण मामला चर्चा में आया है, लेकिन अगर निष्पक्ष जांच हो तो इससे यह भी पता चल सकता है कि जमीन से जुड़े ऐसे विवादों में राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव की भूमिका कितनी बड़ी है।
उन्होंने चिराग पासवान के संदर्भ में कहा कि उनके राजनीतिक कद के कारण उनके दल के नेताओं और समर्थकों से जुड़े मामलों की जांच को लेकर जनता की निगाह और ज्यादा रहती है।
हालांकि, शिक्षक द्वारा लगाए गए व्यापक राजनीतिक आरोप उनकी व्यक्तिगत राय हैं और उनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
‘राजनीतिक कवच’ वाली टिप्पणी कितनी गंभीर?
सेवानिवृत्त शिक्षक ने चिराग पासवान के राजनीतिक प्रभाव को लेकर ‘राजनीतिक कवच’ जैसी तीखी टिप्पणी की।उनका कहना था कि चिराग को एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और NDA के मजबूत राजनीतिक सहयोगी के रूप में देखा जाता है,
वहीं दूसरी ओर वे दिवंगत रामविलास पासवान के पुत्र होने के कारण बिहार में एक अलग राजनीतिक विरासत रखते हैं।इसी आधार पर शिक्षक ने सवाल उठाया कि क्या किसी राजनीतिक दल के प्रभावशाली नेताओं से जुड़े मामलों में प्रशासन उतनी ही तेजी से कार्रवाई करता है जितनी आम नागरिक के मामलों में?
यह सवाल राजनीतिक रूप से असहज जरूर है, लेकिन लोकतंत्र में पूछना जरूरी है।क्योंकि कानून की निष्पक्षता केवल तब साबित नहीं होती जब कमजोर व्यक्ति पर कार्रवाई हो; उसकी असली परीक्षा तब होती है जब आरोपी प्रभावशाली हो।
मुजफ्फरपुर में जमीन माफिया का दूसरा मामला भी सामने
इसी बीच मुजफ्फरपुर के आमगोला इलाके में एक अन्य जमीन विवाद ने भी राजस्व व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं।रिपोर्ट के अनुसार चक्कर मैदान रोड निवासी MIT के सहायक प्राध्यापक मनोज कुमार ने प्रमंडलीय आयुक्त से शिकायत की कि आमगोला स्थित उनके चार कट्ठे के प्लॉट में से करीब सवा दो कट्ठा जमीन को कथित फर्जी वसीयतनामा और दस्तावेजों के आधार पर दूसरे व्यक्ति के नाम दाखिल-खारिज कर दिया गया।मामले की जांच भूमि सुधार उप समाहर्ता से कराई गई। जांच में शिकायत सही पाए जाने के बाद प्रमंडलीय आयुक्त ने मुशहरी अंचल के दो कर्मचारियों के खिलाफ FIR दर्ज कराने का आदेश दिया।
दो अलग-अलग मामलों में राजस्व रिकॉर्ड और जमीन के कथित हेरफेर का सामने आना इस बात की ओर इशारा करता है कि मुजफ्फरपुर में जमीन से जुड़े मामलों की प्रशासनिक निगरानी को और मजबूत करने की जरूरत है।
कानूनविदों के लिए असली मुद्दा ‘कागज’ है
कानून के जानकारों की नजर में इस पूरे प्रकरण का फैसला राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि दस्तावेज करेंगे।किसके नाम खतियान है?
कथित केवाला कब बना?
उसके गवाह कौन हैं?
दाखिल-खारिज किस आधार पर हुआ?
राजस्व अधिकारियों ने किन दस्तावेजों को प्रमाणित माना?
क्या दस्तावेजों में कोई जालसाजी या कूटरचना हुई?
और यदि हुई तो उसका लाभ किसे मिला?
इन सभी सवालों का जवाब जांच में महत्वपूर्ण होगा।इसलिए अभी किसी आरोपी को दोषी घोषित करना जल्दबाजी होगी। लेकिन इसी तरह शिकायत को राजनीतिक बताकर जांच से बच निकलना भी उचित नहीं होगा।
विपक्ष के हाथ आया मुद्दा, लेकिन परीक्षा उसकी भी
इस प्रकरण से विपक्ष को सरकार पर हमला करने का राजनीतिक अवसर जरूर मिला है। लेकिन विपक्ष के लिए भी सबसे प्रभावी रणनीति यही होगी कि वह किसी व्यक्ति को बिना जांच दोषी घोषित करने की बजाय निष्पक्ष जांच और प्रशासनिक जवाबदेही की मांग करे।यदि विपक्ष केवल राजनीतिक आरोप लगाएगा तो सत्ता पक्ष इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बता सकता है।
लेकिन यदि विपक्ष यह कहे कि—‘जिसका नाम FIR में है, उसकी राजनीतिक पहचान चाहे जो हो, दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच हो और दोषी मिलने पर कार्रवाई हो’तो बहस व्यक्ति से निकलकर व्यवस्था पर आ जाएगी।
असली लड़ाई जमीन की नहीं, सिस्टम की विश्वसनीयता की है
मुजफ्फरपुर और बिहार में जमीन विवाद नए नहीं हैं। लेकिन जब किसी जमीन विवाद में राजनीतिक व्यक्ति, प्रशासनिक अधिकारी और राजस्व रिकॉर्ड एक साथ चर्चा में आ जाएं, तो मामला सिर्फ दो पक्षों के बीच संपत्ति विवाद नहीं रह जाता।यह प्रशासन की विश्वसनीयता का सवाल बन जाता है।क्योंकि जमीन का मालिक अगर अदालत और अंचल कार्यालय के चक्कर लगाता रहे और दूसरी तरफ कथित फर्जी दस्तावेज के आधार पर कोई व्यक्ति रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा ले, तो सबसे बड़ा नुकसान उस नागरिक का नहीं बल्कि राजस्व व्यवस्था पर भरोसे का होता है।
अब चिराग के सामने तीन रास्ते
इस विवाद के बाद LJP (रामविलास) नेतृत्व के सामने मोटे तौर पर तीन राजनीतिक विकल्प हैं।
पहला— आरोपों को पूरी तरह राजनीतिक साजिश बताकर विधायक का बचाव करना।
दूसरा— जांच पूरी होने तक कोई निष्कर्ष नहीं निकालना और कानूनी प्रक्रिया पर भरोसा करना।
तीसरा— खुद निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग कर यह संदेश देना कि पार्टी में राजनीतिक पद किसी को कानून से ऊपर नहीं बनाता।इनमें तीसरा रास्ता राजनीतिक रूप से सबसे कठिन जरूर है, लेकिन सार्वजनिक विश्वास के लिहाज से सबसे मजबूत भी साबित हो सकता है।
निष्कर्ष:
विधायक हों या अधिकारी, जमीन पर कानून का मालिकाना हक होना चाहिए
बेलसंड विधायक अमित कुमार रानू पर लगे आरोपों की सच्चाई अब पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया तय करेगी। फिलहाल FIR दर्ज होना आरोपों की पुष्टि नहीं है।लेकिन इस मामले ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—
क्या बिहार में जमीन के कागज कानून तय करेंगे या राजनीतिक रसूख?
अगर किसी नागरिक की जमीन वास्तव में फर्जी दस्तावेज के जरिए हड़पने की कोशिश हुई है तो दोषी कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
अगर आरोप गलत हैं तो जांच के बाद आरोपी को भी पूरी तरह अपनी प्रतिष्ठा वापस पाने का अधिकार है।
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि न आरोप किसी को अपराधी बनाते हैं और न राजनीतिक पद किसी को कानून से ऊपर।
अब नजर इस बात पर है कि पुलिस जांच कितनी निष्पक्ष होती है, राजस्व रिकॉर्ड की वास्तविकता क्या निकलती है और राजनीतिक नेतृत्व इस पूरे मामले में कानून के साथ खड़ा होता है या अपने विधायक के साथ।
क्योंकि अंततः सवाल सिर्फ अमित कुमार रानू का नहीं है।सवाल यह है कि बिहार में जमीन के कागज की ताकत बड़ी है या सत्ता के गलियारे की?
