बी के झा
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नई दिल्ली, 27 अगस्त
भारत की युवा शक्ति को सिर्फ रोजगार की तलाश करने वाली पीढ़ी नहीं, बल्कि देश का भविष्य गढ़ने वाली ताकत बनाने पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवां को Gen-Z के साथ ‘खेलो इंडिया संवाद’ में सीधा संवाद किया। वर्चुअल माध्यम से जुड़े प्रधानमंत्री ने युवाओं से कहा कि उनके मन में नए विचार और नए आइडिया आने चाहिए। उन्होंने खेल को केवल मैदान पर जीत-हार का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन की चुनौतियों से मुकाबला करने का प्रशिक्षण बताया।
प्रधानमंत्री का संदेश साफ था—जिस देश की युवा पीढ़ी मैदान में पसीना बहाती है, वही देश भविष्य की चुनौतियों के सामने मजबूती से खड़ा होता है।
खेल सिर्फ मेडल नहीं, विकसित भारत का आधार
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस वर्ष 15 अगस्त को लाल किले से उन्होंने देश के सामने भारत का स्पोर्ट्स विजन रखा था। उनके मुताबिक खेलों को केवल पदक जीतने तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि खेलों के माध्यम से भारत की खेल क्षमता और युवा शक्ति को एकजुट करना विकसित भारत के निर्माण के व्यापक अभियान का हिस्सा है।यह सोच भारतीय खेल नीति में एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करती है।
लंबे समय तक खेलों को शिक्षा और रोजगार से अलग एक गतिविधि के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन अब सरकार खेलों को युवा विकास, फिटनेस, अनुशासन, रोजगार और राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जोड़ने पर जोर दे रही है।
‘जो खेलते हैं, वे खिलते हैं’
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा, “जो खेलते हैं, वे खिलते हैं।” लेकिन उन्होंने ‘खिलने’ का अर्थ सिर्फ प्रतियोगिता जीतने या मेडल हासिल करने तक सीमित नहीं रखा।उनके मुताबिक किसी खिलाड़ी की सफलता उसके परिवार, स्कूल, कॉलेज, जिले और राज्य की पहचान को भी मजबूत करती है। एक सफल खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने शहर और प्रदेश को पहचान दिलाने का माध्यम बन सकता है।
यानी खेल मैदान में खिलाड़ी अकेला नहीं खेलता—उसके साथ उसके परिवार, संस्थान और पूरे समाज की उम्मीदें भी मैदान में उतरती हैं।
Gen-Z को संदेश—नौकरी खोजने वाली नहीं, अवसर बनाने वाली पीढ़ी बनें
प्रधानमंत्री का युवाओं से नए आइडिया का आह्वान उनके व्यापक युवा दृष्टिकोण से जुड़ा दिखाई देता है। आज की Gen-Z डिजिटल तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्टार्टअप, सोशल मीडिया और नए प्रकार के रोजगार की दुनिया में प्रवेश कर रही है।ऐसे में चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि युवाओं को कितनी नौकरियां मिलेंगी। बड़ा सवाल यह है कि क्या युवा स्वयं नए अवसर पैदा करने की क्षमता विकसित करेंगे?
प्रधानमंत्री का जोर इसी मानसिकता पर दिखाई दिया—युवा केवल व्यवस्था से अवसर की उम्मीद न करें, बल्कि अपने विचार, प्रतिभा और नवाचार के जरिए नए रास्ते भी बनाएं।
खेल सिखाता है हार के बाद खड़े होना
खेलों की सबसे बड़ी ताकत शायद यही है कि वह युवाओं को हार से डरना नहीं, बल्कि हार के बाद फिर मैदान में उतरना सिखाता है।मैदान पर एक खिलाड़ी को जीत के साथ हार भी स्वीकार करनी पड़ती है। उसे अनुशासन, टीमवर्क, समय प्रबंधन, धैर्य और दबाव में निर्णय लेना सीखना पड़ता है। यही गुण जीवन और करियर में भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।इसलिए खेलों को केवल शारीरिक गतिविधि मानना उसके व्यापक प्रभाव को सीमित करना होगा।
मंडाविया बोले—खेल अब राष्ट्रीय प्राथमिकता
केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री मनसुख मंडाविया ने भी कार्यक्रम में युवाओं और खेलों को दी जा रही प्राथमिकता का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में खेलों को पहली बार केवल गतिविधि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में देखने पर जोर दिया गया है।मंडाविया ने युवाओं को भारत का उज्ज्वल वर्तमान और भविष्य बताते हुए कहा कि उन्हें विकसित भारत के संकल्प से जोड़ा गया है।
असली चुनौती अब मैदान से आगे है
सरकार की ओर से खेलों को प्राथमिकता देने की बात निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इस विजन की असली परीक्षा मैदान पर होगी।
क्या छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों की प्रतिभाओं को पर्याप्त सुविधाएं मिलेंगी?
क्या सरकारी और निजी खेल संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण उपलब्ध होगा?
क्या खिलाड़ियों को बेहतर कोचिंग, पोषण और खेल विज्ञान की सुविधा मिलेगी?
क्या प्रतिभाशाली खिलाड़ी आर्थिक मजबूरियों के कारण खेल छोड़ने के लिए मजबूर नहीं होंगे?
भारत में खेल प्रतिभा की कमी नहीं है। चुनौती है प्रतिभा को पहचानने, तराशने और उसे अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने की मजबूत व्यवस्था तैयार करने की।
युवा शक्ति और खेल शक्ति का मेल
‘खेलो इंडिया संवाद’ का संदेश केवल खिलाड़ियों तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक अर्थ यह है कि भारत की युवा आबादी को देश की विकास यात्रा में सक्रिय भागीदार बनाया जाए।
प्रधानमंत्री का Gen-Z से संवाद इसी दिशा में एक राजनीतिक और सामाजिक संदेश भी है—
भारत की अगली छलांग केवल आर्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि उसके युवाओं के विचार, ऊर्जा, अनुशासन और नवाचार से तय होगी।
और इस पूरी सोच को प्रधानमंत्री के एक वाक्य में समेटा जा सकता है—“जो खेलते हैं, वे खिलते हैं।
”अब जरूरत इस बात की है कि भारत के हर बच्चे और युवा को खेलने का मैदान, आगे बढ़ने का अवसर और अपने आइडिया को हकीकत में बदलने का मंच मिले।
तभी खेलों का विजन वास्तव में विकसित भारत के विजन में बदल सकेगा।
