बिहार में न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 से बढ़कर 62 साल करने की तैयारी, पटना हाईकोर्ट ने बढ़ाया कदम; अब सरकार की मुहर का इंतजार

बी के झा

NSK news Ind

पटना, 1 सितंबर

बिहार की न्यायिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने की राह खुल गई है। राज्य के न्यायिक पदाधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष करने की दिशा में पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण पहल की है। हाईकोर्ट की पूर्ण न्यायालय बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने के बाद अब गेंद राज्य सरकार के पाले में है। यदि सरकार की ओर से भी इस पर मुहर लग जाती है तो जिला एवं अनुमंडल स्तर की अदालतों में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों को दो वर्ष अतिरिक्त सेवा का अवसर मिल सकेगा।

यह फैसला केवल न्यायिक अधिकारियों की सेवा अवधि बढ़ाने तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे लंबित मुकदमों के बोझ, अनुभवी न्यायिक अधिकारियों की उपलब्धता और जिला न्यायपालिका की कार्यक्षमता से जोड़कर देखा जा रहा है।

पूर्ण न्यायालय की बैठक में हुआ फैसला

पटना हाईकोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश सुधीर सिंह की अध्यक्षता में 18 अगस्त को हुई पूर्ण न्यायालय की बैठक में न्यायिक पदाधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष किए जाने का निर्णय लिया गया। इसके बाद हाईकोर्ट के महानिबंधक ने सोमवार को बिहार सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव को पत्र भेजकर पूर्ण न्यायालय के निर्णय से अवगत कराया है।पत्र में राज्य सरकार से इस संबंध में आवश्यक कार्रवाई करने का अनुरोध किया गया है। यानी फिलहाल यह फैसला प्रस्ताव और प्रशासनिक प्रक्रिया के चरण में है। इसे अंतिम रूप देने के लिए राज्य सरकार की ओर से आगे की कार्रवाई और स्वीकृति जरूरी होगी।

अब सरकार की बारी, जल्द मिल सकती है मंजूरी

पटना हाईकोर्ट की पहल के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण भूमिका बिहार सरकार की होगी। सरकार यदि प्रस्ताव को मंजूरी देती है तो न्यायिक सेवा के अधिकारियों को 60 वर्ष की बजाय 62 वर्ष की उम्र तक सेवा में बने रहने का रास्ता साफ हो जाएगा।इसका सीधा असर जिला एवं सत्र न्यायालयों के साथ-साथ अनुमंडलीय न्यायालयों में काम कर रहे न्यायिक अधिकारियों पर पड़ेगा। हालांकि, प्रस्ताव को लागू करने के लिए आवश्यक प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश ने खोली राह

सेवानिवृत्ति आयु में बदलाव की यह पहल सुप्रीम कोर्ट के ऑल इंडिया जजेज एसोसिएशन बनाम भारत सरकार एवं अन्य मामले में दिए गए निर्देशों की पृष्ठभूमि में हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने जिला न्यायपालिका के न्यायिक पदाधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु में एकरूपता और उससे जुड़े पहलुओं पर राज्यों से विचार-विमर्श करते हुए आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए थे।इसी क्रम में अलग-अलग राज्यों में न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति उम्र को लेकर फैसले सामने आए हैं। बिहार में भी अब उसी दिशा में कदम बढ़ाया गया है।

बिहार से पहले मध्य प्रदेश और तेलंगाना में पहल

बिहार इस दिशा में पहल करने वाला पहला राज्य नहीं है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष करने का निर्णय लिया है, जबकि तेलंगाना में इसे 61 वर्ष किए जाने की पहल हुई है।इन्हीं उदाहरणों और न्यायिक अधिकारियों की सेवा अवधि बढ़ाने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए बिहार राज्य न्यायिक सेवा संघ के सचिव रंजीत कुमार सिंह ने पटना हाईकोर्ट प्रशासन को पत्र लिखकर सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाने का अनुरोध किया था। अब हाईकोर्ट की पूर्ण न्यायालय बैठक में इस पर निर्णय हो चुका है।

लंबित मुकदमों के निपटारे में मिल सकता है फायदा

बिहार में अदालतों पर लंबित मुकदमों का दबाव लगातार एक बड़ी चुनौती रहा है। ऐसे में न्यायिक अधिकारियों की सेवा अवधि में दो वर्ष की बढ़ोतरी को न्याय प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।बिहार राज्य बार काउंसिल के अध्यक्ष एवं वरीय अधिवक्ता रमाकांत शर्मा के अनुसार, इस पहल से लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आ सकती है और अदालतों पर मुकदमों का बोझ कम करने में मदद मिलेगी।दरअसल, अनुभवी न्यायिक अधिकारियों के पास लंबे समय से मामलों की सुनवाई, न्यायिक प्रक्रिया और स्थानीय न्याय व्यवस्था का व्यावहारिक अनुभव होता है। ऐसे अधिकारियों की सेवाएं दो वर्ष और उपलब्ध रहने से न्यायिक संस्थानों को उनके अनुभव और संस्थागत ज्ञान का लाभ मिल सकता है।

दो साल की अतिरिक्त सेवा क्यों अहम?

न्यायिक सेवा में अनुभव का महत्व अन्य सरकारी सेवाओं की तुलना में अलग माना जाता है। जिला अदालतों में जटिल दीवानी और आपराधिक मामलों से लेकर प्रशासनिक एवं पारिवारिक विवादों तक बड़ी संख्या में मुकदमों की सुनवाई होती है। ऐसे में अनुभवी न्यायिक अधिकारियों की उपलब्धता न्यायिक प्रक्रिया की निरंतरता के लिए उपयोगी हो सकती है।सेवानिवृत्ति उम्र बढ़ाने के पीछे प्रमुख संभावित लाभ इस प्रकार हैं—

● अनुभवी न्यायिक अधिकारियों की सेवाएं दो वर्ष और मिलेंगी।

● लंबित मुकदमों के निपटारे की गति बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

● नए अधिकारियों की नियुक्ति और अनुभवहीनता से पैदा होने वाले संक्रमण को कुछ हद तक कम किया जा सकेगा।

● न्यायिक अधिकारियों के लंबे अनुभव और संस्थागत ज्ञान का उपयोग न्याय प्रशासन को मजबूत करने में होगा।

● जिला न्यायपालिका पर बढ़ते काम के दबाव से निपटने में अतिरिक्त मानव संसाधन उपलब्ध रहेगा।

लेकिन अभी फैसला लागू नहीं हुआ

हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में एक बात स्पष्ट रखना जरूरी है कि पटना हाईकोर्ट की पूर्ण न्यायालय बैठक में निर्णय हो जाना और सेवानिवृत्ति आयु का औपचारिक रूप से बढ़ जाना दो अलग-अलग बातें हैं।

हाईकोर्ट ने अपनी ओर से प्रक्रिया आगे बढ़ा दी है और राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग को पत्र भेज दिया गया है। अब सरकार को आवश्यक प्रशासनिक एवं कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होगी। सरकार की अंतिम स्वीकृति के बाद ही इसे प्रभावी रूप से लागू किया जा सकेगा।

न्यायिक व्यवस्था के लिए क्या बदलेगा?

अगर बिहार सरकार इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है तो इसका सबसे बड़ा असर जिला न्यायपालिका के स्तर पर दिखाई दे सकता है।

एक ओर अनुभवी न्यायिक अधिकारियों को अतिरिक्त सेवा मिलेगी, वहीं दूसरी ओर अदालतों में लंबे समय से लंबित मामलों के निपटारे के लिए उपलब्ध न्यायिक क्षमता भी बढ़ेगी।

हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार इसे किस रूप में और किन शर्तों के साथ लागू करती है।

फिलहाल हाईकोर्ट की पहल ने 60 साल की मौजूदा सीमा को 62 साल करने की संभावित राह जरूर खोल दी है।

अब निगाह बिहार सरकार के अगले कदम पर है।

हाईकोर्ट की मुहर के बाद यह प्रस्ताव यदि सरकार की मंजूरी तक पहुंचता है, तो बिहार की जिला न्यायपालिका में न्यायिक अधिकारियों के लिए दो साल की अतिरिक्त सेवा का रास्ता साफ हो सकता है।

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